
हम धनवान
होंगे या
नहीं, यशस्वी
होंगे या नहीं,
चुनाव
जीतेंगे या
नहीं इसमें
शंका हो सकती
है परन्तु
भैया ! हम
मरेंगे या
नहीं इसमें
कोई शंका है?
विमान उड़ने
का समय
निश्चित होता
है, बस चलने का
समय निश्चित
होता है,
गाड़ी छूटने
का समय निश्चित
होता है
परन्तु इस
जीवन की गाड़ी
के छूटने का
कोई निश्चित
समय है?
आज तक आपने
जगत का जो कुछ
जाना है, जो
कुछ प्राप्त
किया है.... आज के
बाद जो जानोगे
और प्राप्त करोगे,
प्यारे भैया ! वह
सब मृत्यु के
एक ही झटके
में छूट
जायेगा, जाना
अनजाना हो
जायेगा,
प्राप्ति
अप्राप्ति
में बदल
जायेगी |
अतः सावधान
हो जाओ |
अन्तर्मुख
होकर अपने
अविचल आत्मा
को, निजस्वरूप
के अगाध आनन्द
को, शाश्वत
शांति को
प्राप्त कर लो | फिर तो आप ही
अविनाशी
आत्मा हो |
जागो.... उठो.....
अपने भीतर
सोये हुए
निश्चयबल को
जगाओ |
सर्वदेश,
सर्वकाल में
सर्वोत्तम
आत्मबल को अर्जित
करो | आत्मा
में अथाह
सामर्थ्य है | अपने को
दीन-हीन मान
बैठे तो विश्व
में ऐसी कोई
सत्ता नहीं जो
तुम्हे ऊपर
उठा सके |
अपने
आत्मस्वरूप
में
प्रतिष्ठित
हो गये तो त्रिलोकी
में ऐसी कोई
हस्ती नहीं जो
तुम्हे दबा
सके |
सदा स्मरण
रहे कि
इधर-उधर
वृत्तियों के
साथ तुम्हारी
शक्ति भी
बिखरती रहती
है | अतः
वृत्तियों को
बहकाओ नहीं | तमाम
वृत्तियों को
एकत्रित करके
साधना-काल में
आत्मचिन्तन
में लगाओ और
व्यवहार काल
में जो कार्य
करते हो उसमें
लगाओ |
दत्तचित्त
होकर हर कोई
कार्य करो | सदा शान्त
वृत्ति धारण
करने का
अभ्यास करो | विचारवन्त
और प्रसन्न
रहो |
जीवमात्र को
अपना स्वरूप
समझो | सबसे
स्नेह रखो | दिल को
व्यापक रखो | आत्मनिष्ठा
में जगे हुए
महापुरुषों
के सत्संग तथा
सत्साहित्य
से जीवन की
भक्ति और
वेदान्त से
पुष्ट तथा
पुलकित करो |
श्रीमद् भगवदगीता के विषय में जानने योग्य विचार
गीता में श्रीकृष्ण भगवान के नामों के अर्थ
अध्याय चौथाः ज्ञानकर्मसन्यासयोग
पाँचवाँ अध्यायः कर्मसंन्यासयोग
तेरहवाँ अध्यायः क्षेत्रक्षत्रज्ञविभागयोग
चौदहवाँ अध्यायः गुणत्रयविभागयोग
पंद्रहवाँ अध्यायः पुरुषोत्तमयोग
सोलहवाँ अध्यायः दैवासुरसंपद्विभागयोग
सत्रहवाँ अध्यायः श्रद्धात्रयविभागयोग
अठारहवाँ अध्यायः मोक्षसंन्यासयोग
गीता
मे हृदयं
पार्थ गीता मे
सारमुत्तमम्।
गीता
मे
ज्ञानमत्युग्रं
गीता मे
ज्ञानमव्ययम्।।
गीता
मे चोत्तमं
स्थानं गीता
मे परमं पदम्।
गीता
मे परमं
गुह्यं गीता
मे परमो
गुरुः।।
गीता मेरा
हृदय है |
गीता मेरा
उत्तम सार है | गीता मेरा
अति उग्र
ज्ञान है | गीता मेरा
अविनाशी
ज्ञान है | गीता मेरा
श्रेष्ठ
निवासस्थान
है | गीता
मेरा परम पद
है | गीता
मेरा परम
रहस्य है | गीता मेरा
परम गुरु है |
भगवान
श्री कृष्ण
गीता
सुगीता
कर्तव्या
किमन्यैः
शास्त्रविस्तरैः।
या
स्वयं
पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता।।
जो अपने आप
श्रीविष्णु
भगवान के
मुखकमल से निकली
हुई है वह
गीता अच्छी
तरह कण्ठस्थ
करना चाहिए | अन्य
शास्त्रों के
विस्तार से
क्या लाभ?
महर्षि
व्यास
गेयं
गीतानामसहस्रं
ध्येयं
श्रीपतिरूपमजस्रम्
।
नेयं
सज्जनसंगे
चित्तं देयं
दीनजनाय च
वित्तम ।।
गाने योग्य
गीता तो श्री
गीता का और
श्री विष्णुसहस्रनाम
का गान है | धरने योग्य
तो श्री
विष्णु भगवान
का ध्यान है | चित्त तो
सज्जनों के
संग पिरोने
योग्य है और वित्त
तो दीन-दुखियों
को देने योग्य
है |
श्रीमद्
आद्य
शंकराचार्य
गीता में
वेदों के
तीनों काण्ड
स्पष्ट किये
गये हैं अतः
वह मूर्तिमान
वेदरूप हैं और
उदारता में तो
वह वेद से भी
अधिक है |
अगर कोई
दूसरों को
गीताग्रंथ
देता है तो
जानो कि उसने
लोगों के लिए
मोक्षसुख का
सदाव्रत खोला
है |
गीतारूपी
माता से
मनुष्यरूपी
बच्चे वियुक्त
होकर भटक रहे
हैं | अतः
उनका मिलन कराना
यह तो सर्व
सज्जनों का
मुख्य धर्म है |
संत
ज्ञानेश्वर
'श्रीमद्
भगवदगीता'
उपनिषदरूपी
बगीचों में से
चुने हुए
आध्यात्मिक
सत्यरूपी
पुष्पों से
गुँथा हुआ
पुष्पगुच्छ
है |
स्वामी
विवेकानन्द
इस अदभुत
ग्रन्थ के 18
छोटे
अध्यायों में
इतना सारा
सत्य, इतना
सारा ज्ञान और
इतने सारे
उच्च, गम्भीर
और सात्त्विक
विचार भरे हुए
हैं कि वे
मनुष्य को
निम्न-से-निम्न
दशा में से
उठा कर देवता
के स्थान पर
बिठाने की
शक्ति रखते
हैं | वे
पुरुष तथा
स्त्रियाँ
बहुत
भाग्यशाली हैं
जिनको इस
संसार के
अन्धकार से
भरे हुए सँकरे
मार्गों में
प्रकाश देने
वाला यह
छोटा-सा लेकिन
अखूट तेल से
भरा हुआ
धर्मप्रदीप
प्राप्त हुआ
है |
महामना
मालवीय जी
एक बार
मैंने अपना
अंतिम समय
नजदीक आया हुआ
महसूस किया तब
गीता मेरे लिए
अत्यन्त
आश्वासनरूप
बनी थी |
मैं जब-जब
बहुत भारी
मुसीबतों से
घिर जाता हूँ
तब-तब मैं
गीता माता के
पास दौड़कर
पहुँच जाता
हूँ और गीता
माता में से
मुझे समाधान न
मिला हो ऐसा
कभी नहीं हुआ है |
महात्मा
गाँधी
जीवन के
सर्वांगीण
विकास के लिए
गीता ग्रंथ अदभुत
है | विश्व
की 578 भाषाओं
में गीता का
अनुवाद हो
चुका है | हर
भाषा में कई
चिन्तकों,
विद्वानों और
भक्तों ने
मीमांसाएँ की
हैं और अभी भी
हो रही हैं, होती
रहेंगी |
क्योंकि इस
ग्रन्थ में सब
देशों,
जातियों, पंथों
के तमाम
मनुष्यों के
कल्याण की
अलौकिक सामग्री
भरी हुई है | अतः हम सबको
गीताज्ञान
में अवगाहन
करना चाहिए | भोग, मोक्ष,
निर्लेपता,
निर्भयता आदि
तमाम दिव्य गुणों
का विकास करने
वाला यह गीता
ग्रन्थ विश्व
में अद्वितिय
है |
पूज्यपाद
स्वामी श्री
लीलाशाहजी
महाराज
प्राचीन युग
की सर्व रमणीय
वस्तुओं में
गीता से
श्रेष्ठ कोई
वस्तु नहीं है | गीता में
ऐसा उत्तम और
सर्वव्यापी
ज्ञान है कि
उसके रचयिता
देवता को
असंख्य वर्ष
हो गये फिर भी
ऐसा दूसरा एक
भी ग्रन्थ
नहीं लिखा गया
है |
अमेरिकन
महात्मा थॉरो
थॉरो के
शिष्य,
अमेरिका के
सुप्रसिद्ध
साहित्यकार
एमर्सन को भी
गीता के लिए,
अदभुत आदर था | 'सर्वभुतेषु
चात्मानं
सर्वभूतानि
चात्मनि' यह
श्लोक पढ़ते
समय वह नाच
उठता था |
बाईबल का
मैंने यथार्थ
अभ्यास किया
है | उसमें
जो
दिव्यज्ञान
लिखा है वह
केवल गीता के
उद्धरण के रूप
में है |
मैं ईसाई होते
हुए भी गीता
के प्रति इतना
सारा आदरभाव
इसलिए रखता
हूँ कि जिन
गूढ़ प्रश्नों
का समाधान
पाश्चात्य
लोग अभी तक
नहीं खोज पाये
हैं, उनका
समाधान गीता
ग्रंथ ने शुद्ध
और सरल रीति
से दिया है | उसमें कई
सूत्र अलौकिक
उपदेशों से
भरूपूर लगे
इसीलिए गीता
जी मेरे लिए
साक्षात्
योगेश्वरी
माता बन रही
हैं | वह तो
विश्व के तमाम
धन से भी नहीं
खरीदा जा सके
ऐसा भारतवर्ष
का अमूल्य
खजाना है |
एफ.एच.मोलेम
(इंग्लैन्ड)
भगवदगीता
ऐसे दिव्य
ज्ञान से
भरपूर है कि
उसके अमृतपान
से मनुष्य के
जीवन में
साहस, हिम्मत,
समता, सहजता,
स्नेह, शान्ति
और धर्म आदि
दैवी गुण
विकसित हो उठते
हैं, अधर्म और
शोषण का
मुकाबला करने
का सामर्थ्य आ
जाता है |
अतः प्रत्येक
युवक-युवती को
गीता के श्लोक
कण्ठस्थ करने
चाहिए और उनके
अर्थ में गोता
लगा कर अपने
जीवन को तेजस्वी
बनाना चाहिए |
पूज्यपाद
संत श्री
आसारामजी
बापू
श्री
गणेशाय नमः
धरोवाच
भगवन्परमेशान
भक्तिरव्यभिचारिणी
।
प्रारब्धं
भुज्यमानस्य
कथं भवति हे प्रभो
।।1।।
श्री पृथ्वी
देवी ने पूछाः
हे भगवन ! हे परमेश्वर ! हे प्रभो ! प्रारब्धकर्म को भोगते हुए मनुष्य को एकनिष्ठ भक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है?(1)
श्रीविष्णुरुवाच
प्रारब्धं
भुज्यमानो हि
गीताभ्यासरतः
सदा ।
स
मुक्तः स सुखी
लोके कर्मणा
नोपलिप्यते ।।2।।
श्री विष्णु
भगवान बोलेः
प्रारब्ध को
भोगता हुआ जो
मनुष्य सदा
श्रीगीता के
अभ्यास में
आसक्त हो वही
इस लोक में
मुक्त और सुखी
होता है तथा
कर्म में
लेपायमान नहीं
होता |(2)
महापापादिपापानि
गीताध्यानं
करोति चेत् ।
क्वचित्स्पर्शं
न कुर्वन्ति
नलिनीदलमम्बुवत्
।।3।।
जिस प्रकार
कमल के पत्ते
को जल स्पर्श
नहीं करता उसी
प्रकार जो
मनुष्य
श्रीगीता का
ध्यान करता है
उसे
महापापादि
पाप कभी
स्पर्श नहीं
करते |(3)
गीतायाः
पुस्तकं यत्र
पाठः
प्रवर्तते।
तत्र
सर्वाणि
तीर्थानि
प्रयागादीनि
तत्र वै।।4।।
जहाँ
श्रीगीता की
पुस्तक होती
है और जहाँ
श्रीगीता का
पाठ होता है
वहाँ
प्रयागादि
सर्व तीर्थ
निवास करते
हैं |(4)
सर्वे
देवाश्च ऋषयो
योगिनः
पन्नगाश्च
ये।
गोपालबालकृष्णोsपि
नारदध्रुवपार्षदैः
।।
सहायो
जायते शीघ्रं
यत्र गीता
प्रवर्तते ।।5।।
जहाँ
श्रीगीता
प्रवर्तमान
है वहाँ सभी
देवों,
ऋषियों, योगियों,
नागों और
गोपालबाल
श्रीकृष्ण भी
नारद, ध्रुव
आदि सभी
पार्षदों
सहित जल्दी ही
सहायक होते
हैं |(5)
यत्रगीताविचारश्च
पठनं पाठनं
श्रुतम् ।
तत्राहं
निश्चितं
पृथ्वि
निवसामि सदैव
हि ।।6।।
जहाँ श्री
गीता का
विचार, पठन,
पाठन तथा
श्रवण होता है
वहाँ
हे पृथ्वी ! मैं
अवश्य निवास
करता हूँ | (6)
गीताश्रयेऽहं
तिष्ठामि
गीता मे
चोत्तमं
गृहम्।
गीताज्ञानमुपाश्रित्य
त्रींल्लोकान्पालयाम्यहंम्।।7।।
मैं
श्रीगीता के
आश्रय में
रहता हूँ,
श्रीगीता
मेरा उत्तम घर
है और
श्रीगीता के
ज्ञान का आश्रय
करके मैं
तीनों लोकों
का पालन करता
हूँ |(7)
गीता
मे परमा
विद्या
ब्रह्मरूपा न
संशयः।
अर्धमात्राक्षरा
नित्या
स्वनिर्वाच्यपदात्मिका।।8।।
श्रीगीता
अति अवर्णनीय
पदोंवाली,
अविनाशी, अर्धमात्रा
तथा
अक्षरस्वरूप,
नित्य,
ब्रह्मरूपिणी
और परम
श्रेष्ठ मेरी
विद्या है
इसमें सन्देह
नहीं है |(8)
चिदानन्देन
कृष्णेन
प्रोक्ता
स्वमुखतोऽर्जुनम्।
वेदत्रयी
परानन्दा
तत्त्वार्थज्ञानसंयुता।।9।।
वह श्रीगीता
चिदानन्द
श्रीकृष्ण ने
अपने मुख से
अर्जुन को कही
हुई तथा तीनों
वेदस्वरूप, परमानन्दस्वरूप
तथा
तत्त्वरूप
पदार्थ के ज्ञान
से युक्त है |(9)
योऽष्टादशजपो
नित्यं नरो
निश्चलमानसः।
ज्ञानसिद्धिं
स लभते ततो
याति परं
पदम्।।10।।
जो मनुष्य
स्थिर मन वाला
होकर नित्य
श्री गीता के 18
अध्यायों का
जप-पाठ करता
है वह ज्ञानस्थ
सिद्धि को
प्राप्त होता
है और फिर परम
पद को पाता है |(10)
पाठेऽसमर्थः
संपूर्णे
ततोऽर्धं
पाठमाचरेत्।
तदा
गोदानजं
पुण्यं लभते
नात्र
संशयः।।11।।
संपूर्ण पाठ
करने में
असमर्थ हो तो
आधा पाठ करे,
तो भी गाय के
दान से होने
वाले पुण्य को
प्राप्त करता
है, इसमें
सन्देह नहीं |(11)
त्रिभागं
पठमानस्तु
गंगास्नानफलं
लभेत्।
षडंशं
जपमानस्तु
सोमयागफलं
लभेत्।।12।।
तीसरे भाग
का पाठ करे तो
गंगास्नान का
फल प्राप्त
करता है और
छठवें भाग का
पाठ करे तो
सोमयाग का फल
पाता है |(12)
एकाध्यायं
तु यो नित्यं
पठते
भक्तिसंयुतः।
रूद्रलोकमवाप्नोति
गणो भूत्वा
वसेच्चिरम।।13।।
जो मनुष्य
भक्तियुक्त
होकर नित्य एक
अध्याय का भी
पाठ करता है,
वह रुद्रलोक
को प्राप्त होता
है और वहाँ
शिवजी का गण
बनकर चिरकाल
तक निवास करता
है |(13)
अध्याये
श्लोकपादं वा
नित्यं यः
पठते नरः।
स
याति नरतां
यावन्मन्वन्तरं
वसुन्धरे।।14।।
हे पृथ्वी ! जो
मनुष्य नित्य
एक अध्याय एक
श्लोक अथवा
श्लोक के एक
चरण का पाठ
करता है वह
मन्वंतर तक
मनुष्यता को प्राप्त
करता है |(14)
गीताया
श्लोकदशकं
सप्त पंच
चतुष्टयम्।
द्वौ
त्रीनेकं
तदर्धं वा
श्लोकानां यः
पठेन्नरः।।15।।
चन्द्रलोकमवाप्नोति
वर्षाणामयुतं
ध्रुवम्।
गीतापाठसमायुक्तो
मृतो
मानुषतां
व्रजेत्।।16।।
जो मनुष्य
गीता के दस,
सात, पाँच, चार,
तीन, दो, एक या
आधे श्लोक का
पाठ करता है
वह अवश्य दस
हजार वर्ष तक चन्द्रलोक
को प्राप्त
होता है |
गीता के पाठ
में लगे हुए
मनुष्य की अगर
मृत्यु होती
है तो वह (पशु
आदि की अधम
योनियों में न
जाकर) पुनः
मनुष्य जन्म
पाता है |(15,16)
गीताभ्यासं
पुनः कृत्वा
लभते
मुक्तिमुत्तमाम्।
गीतेत्युच्चारसंयुक्तो
म्रियमाणो
गतिं लभेत्।।17।।
(और वहाँ)
गीता का पुनः
अभ्यास करके
उत्तम मुक्ति
को पाता है | 'गीता' ऐसे
उच्चार के साथ
जो मरता है वह
सदगति को पाता
है |
गीतार्थश्रवणासक्तो
महापापयुतोऽपि
वा।
वैकुण्ठं
समवाप्नोति
विष्णुना सह
मोदते।।18।।
गीता का अर्थ
तत्पर सुनने
में तत्पर बना
हुआ मनुष्य
महापापी हो तो
भी वह वैकुण्ठ
को प्राप्त
होता है और
विष्णु के साथ
आनन्द करता है |(18)
गीतार्थं
ध्यायते
नित्यं
कृत्वा
कर्माणि भूरिशः।
जीवन्मुक्तः
स विज्ञेयो
देहांते परमं
पदम्।।19।।
अनेक कर्म
करके नित्य
श्री गीता के
अर्थ का जो
विचार करता है
उसे
जीवन्मुक्त
जानो | मृत्यु
के बाद वह परम
पद को पाता है |(19)
गीतामाश्रित्य
बहवो भूभुजो
जनकादयः।
निर्धूतकल्मषा
लोके गीता
याताः परं
पदम्।।20।।
गीता का
आश्रय करके
जनक आदि कई
राजा पाप रहित
होकर लोक में
यशस्वी बने
हैं और परम पद
को प्राप्त
हुए हैं |(20)
गीतायाः
पठनं कृत्वा
माहात्म्यं
नैव यः पठेत्।
वृथा
पाठो
भवेत्तस्य
श्रम एव
ह्युदाहृतः।।21।।
श्रीगीता का
पाठ करके जो
माहात्म्य का
पाठ नहीं करता
है उसका पाठ
निष्फल होता
है और ऐसे पाठ
को श्रमरूप
कहा है |(21)
एतन्माहात्म्यसंयुक्तं
गीताभ्यासं
करोति यः।
स
तत्फलमवाप्नोति
दुर्लभां
गतिमाप्नुयात्।।22।।
इस
माहात्म्यसहित
श्रीगीता का
जो अभ्यास करता
है वह उसका फल
पाता है और
दुर्लभ गति को
प्राप्त होता
है |(22)
सूत
उवाच
माहात्म्यमेतद्
गीताया मया
प्रोक्तं
सनातनम्।
गीतान्ते
पठेद्यस्तु
यदुक्तं
तत्फलं लभेत्।।23।।
सूत जी
बोलेः
गीता का यह
सनातन
माहात्म्य
मैंने कहा | गीता पाठ के
अन्त में जो
इसका पाठ करता
है वह उपर्युक्त
फल प्राप्त
करता है |(23)
इति
श्रीवाराहपुराणे
श्रीमद्
गीतामाहात्म्यं
संपूर्णम्।
इति
श्रीवाराहपुराण
में श्रीमद्
गीता
माहात्म्य
संपूर्ण।।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
श्रीगीतामाहात्म्य
का अनुसंधान
शौनक
उवाच
गीतायाश्चैव
माहात्म्यं
यथावत्सूत मे
वद।
पुराणमुनिना
प्रोक्तं
व्यासेन
श्रुतिनोदितम्।।1।।
शौनक ऋषि
बोलेः हे सूत
जी ! अति
पूर्वकाल के
मुनि श्री
व्यासजी के
द्वारा कहा
हुआ तथा
श्रुतियों
में वर्णित
श्रीगीताजी
का माहात्म्य
मुझे भली
प्रकार कहिए |(1)
सूत
उवाच
पृष्टं
वै भवता
यत्तन्महद्
गोप्यं
पुरातनम्।
न केन
शक्यते
वक्तुं
गीतामाहात्म्यमुत्तमम्।।2।।
सूत जी
बोलेः आपने जो
पुरातन और
उत्तम गीतामाहात्म्य
पूछा, वह
अतिशय गुप्त है | अतः वह कहने
के लिए कोई
समर्थ नहीं है |(2)
कृष्णो
जानाति वै
सम्यक्
क्वचित्कौन्तेय
एव च।
व्यासो
वा
व्यासपुत्रो
वा
याज्ञवल्क्योऽथ
मैथिलः।।3।।
गीता
माहात्म्य को
श्रीकृष्ण ही
भली प्रकार जानते
हैं, कुछ
अर्जुन जानते
हैं तथा
व्यास, शुकदेव,
याज्ञवल्क्य
और जनक आदि
थोड़ा-बहुत
जानते हैं |(3)
अन्ये
श्रवणतः
श्रृत्वा
लोके
संकीर्तयन्ति
च।
तस्मात्किंचिद्वदाम्यद्य
व्यासस्यास्यान्मया
श्रुतम्।।4।।
दूसरे लोग
कर्णोपकर्ण
सुनकर लोक में
वर्णन करते
हैं | अतः
श्रीव्यासजी
के मुख से
मैंने जो कुछ
सुना है वह आज
कहता हूँ |(4)
गीता
सुगीता
कर्तव्या
किमन्यैः
शास्त्रसंग्रहैः।
या
स्वयं
पद्मनाभस्य
मुखपद्माद्विनिःसृता।।5।।
जो अपने आप
श्रीविष्णु
भगवान के
मुखकमल से निकली
हुई है गीता
अच्छी तरह
कण्ठस्थ करना
चाहिए |
अन्य
शास्त्रों के
संग्रह से
क्या लाभ?(5)
यस्माद्धर्ममयी
गीता
सर्वज्ञानप्रयोजिका।
सर्वशास्त्रमयी
गीता तस्माद्
गीता विशिष्यते।।6।।
गीता
धर्ममय,
सर्वज्ञान की
प्रयोजक तथा
सर्व शास्त्रमय
है, अतः गीता
श्रेष्ठ है |(6)
संसारसागरं
घोरं
तर्तुमिच्छति
यो जनः।
गीतानावं
समारूह्य
पारं यातु
सुखेन सः।।7।।
जो मनुष्य
घोर
संसार-सागर को
तैरना चाहता
है उसे
गीतारूपी
नौका पर चढ़कर
सुखपूर्वक पार
होना चाहिए |(7)
गीताशास्त्रमिदं
पुण्यं यः
पठेत् प्रयतः
पुमान्।
विष्णोः
पदमवाप्नोति
भयशोकादिवर्जितः।।8।।
जो पुरुष इस
पवित्र
गीताशास्त्र
को सावधान होकर
पढ़ता है वह
भय, शोक आदि से
रहित होकर
श्रीविष्णुपद
को प्राप्त
होता है |(8)
गीताज्ञानं
श्रुतं नैव
सदैवाभ्यासयोगतः।
मोक्षमिच्छति
मूढात्मा
याति
बालकहास्यताम्।।9।।
जिसने सदैव
अभ्यासयोग से
गीता का ज्ञान
सुना नहीं है
फिर भी जो
मोक्ष की
इच्छा करता है
वह मूढात्मा,
बालक की तरह
हँसी का पात्र
होता है |(9)
ये
श्रृण्वन्ति
पठन्त्येव
गीताशास्त्रमहर्निशम्।
न ते
वै मानुषा
ज्ञेया देवा
एव न
संशयः।।10।।
जो रात-दिन
गीताशास्त्र
पढ़ते हैं
अथवा इसका पाठ
करते हैं या
सुनते हैं
उन्हें
मनुष्य नहीं
अपितु
निःसन्देह
देव ही जानें |(10)
मलनिर्मोचनं
पुंसां
जलस्नानं
दिने दिने।
सकृद्
गीताम्भसि स्नानं
संसारमलनाशनम्।।11।।
हर रोज जल से
किया हुआ
स्नान
मनुष्यों का
मैल दूर करता
है किन्तु
गीतारूपी जल
में एक बार किया
हुआ स्नान भी
संसाररूपी
मैल का नाश
करता है |(11)
गीताशास्त्रस्य
जानाति पठनं
नैव पाठनम्।
परस्मान्न
श्रुतं
ज्ञानं
श्रद्धा न
भावना।।12।।
स एव
मानुषे लोके
पुरुषो विड्वराहकः।
यस्माद्
गीतां न
जानाति
नाधमस्तत्परो
जनः।।13।।
जो मनुष्य
स्वयं गीता
शास्त्र का
पठन-पाठन नहीं
जानता है,
जिसने अन्य
लोगों से वह
नहीं सुना है,
स्वयं को उसका
ज्ञान नहीं
है, जिसको उस
पर श्रद्धा
नहीं है,
भावना भी नहीं
है, वह मनुष्य
लोक में भटकते
हुए शूकर जैसा
ही है
| उससे
अधिक नीच
दूसरा कोई
मनुष्य नहीं
है, क्योंकि
वह गीता को
नहीं जानता है |
धिक्
तस्य
ज्ञानमाचारं
व्रतं
चेष्टां तपो यशः।
गीतार्थपठनं
नास्ति
नाधमस्तत्परो
जन।।14।।
जो गीता के
अर्थ का पठन
नहीं करता
उसके ज्ञान को,
आचार को, व्रत
को, चेष्टा को,
तप को और यश को
धिक्कार है | उससे अधम और
कोई मनुष्य
नहीं है |(14)
गीतागीतं
न यज्ज्ञानं
तद्विद्धयासुरसंज्ञकम्।
तन्मोघं
धर्मरहितं
वेदवेदान्तगर्हितम्।।15।।
जो ज्ञान
गीता में नहीं
गाया गया है
वह वेद और वेदान्त
में निन्दित
होने के कारण
उसे निष्फल,
धर्मरहित और
आसुरी जानें |
योऽधीते
सततं गीतां
दिवारात्रौ
यथार्थतः।
स्वपन्गच्छन्वदंस्तिष्ठञ्छाश्वतं
मोक्षमाप्नुयात्।।16।।
जो मनुष्य
रात-दिन, सोते,
चलते, बोलते
और खड़े रहते
हुए गीता का
यथार्थतः सतत
अध्ययन करता
है वह सनातन
मोक्ष को
प्राप्त होता
है |(16)
योगिस्थाने
सिद्धपीठे
शिष्टाग्रे
सत्सभासु च।
यज्ञे
च
विष्णुभक्ताग्रे
पठन्याति
परां गतिम्।।17।।
योगियों के
स्थान में,
सिद्धों के
स्थान में, श्रेष्ठ
पुरुषों के
आगे, संतसभा
में, यज्ञस्थान
में और
विष्णुभक्तोंके
आगे गीता का
पाठ करने वाला
मनुष्य परम
गति को
प्राप्त होता
है |(17)
गीतापाठं
च श्रवणं यः
करोति दिने
दिने।
क्रतवो
वाजिमेधाद्याः
कृतास्तेन
सदक्षिणाः।।18।।
जो गीता का
पाठ और श्रवण
हर रोज करता
है उसने दक्षिणा
के साथ
अश्वमेध आदि
यज्ञ किये ऐसा
माना जाता है |(18)
गीताऽधीता
च येनापि
भक्तिभावेन
चेतसा।
तेन
वेदाश्च
शास्त्राणि
पुराणानि च
सर्वशः।।19।।
जिसने
भक्तिभाव से
एकाग्र, चित्त
से गीता का अध्ययन
किया है उसने
सर्व वेदों,
शास्त्रों तथा
पुराणों का
अभ्यास किया
है ऐसा माना
जाता है |(19)
यः
श्रृणोति च
गीतार्थं
कीर्तयेच्च
स्वयं
पुमान्।
श्रावयेच्च
परार्थं वै स
प्रयाति परं
पदम्।।20।।
जो मनुष्य
स्वयं गीता का
अर्थ सुनता
है, गाता है और
परोपकार हेतु
सुनाता है वह
परम पद को प्राप्त
होता है |(20)
नोपसर्पन्ति
तत्रैव यत्र
गीतार्चनं
गृहे।
तापत्रयोद्भवाः
पीडा नैव
व्याधिभयं
तथा।।21।।
जिस घर में
गीता का पूजन
होता है वहाँ
(आध्यात्मिक,
आधिदैविक और
आधिभौतिक) तीन
ताप से
उत्पन्न होने
वाली पीड़ा
तथा
व्याधियों का
भय नहीं आता
है | (21)
न
शापो नैव पापं
च दुर्गतिनं च
किंचन।
देहेऽरयः
षडेते वै न
बाधन्ते
कदाचन।।22।।
उसको शाप या
पाप नहीं
लगता, जरा भी
दुर्गति नहीं
होती और छः
शत्रु (काम,
क्रोध, लोभ,
मोह, मद और
मत्सर) देह
में पीड़ा नहीं
करते | (22)
भगवत्परमेशाने
भक्तिरव्यभिचारिणी।
जायते
सततं तत्र
यत्र
गीताभिनन्दनम्।।23।।
जहाँ
निरन्तर गीता
का अभिनंदन
होता है वहाँ
श्री भगवान
परमेश्वर में
एकनिष्ठ
भक्ति उत्पन्न
होती है | (23)
स्नातो
वा यदि
वाऽस्नातः
शुचिर्वा यदि
वाऽशुचिः।
विभूतिं
विश्वरूपं च
संस्मरन्सर्वदा
शुचिः।।24।।
स्नान किया
हो या न किया
हो, पवित्र हो
या अपवित्र हो
फिर भी जो
परमात्म-विभूति
का और विश्वरूप
का स्मरण करता
है वह सदा
पवित्र है | (24)
सर्वत्र
प्रतिभोक्ता
च
प्रतिग्राही
च सर्वशः।
गीतापाठं
प्रकुर्वाणो
न लिप्येत
कदाचन।।25।।
सब जगह भोजन
करने वाला और
सर्व प्रकार
का दान लेने
वाला भी अगर
गीता पाठ करता
हो तो कभी लेपायमान
नहीं होता | (25)
यस्यान्तःकरणं
नित्यं
गीतायां रमते
सदा।
सर्वाग्निकः
सदाजापी
क्रियावान्स
च पण्डितः।।26।।
जिसका चित्त
सदा गीता में
ही रमण करता
है वह संपूर्ण
अग्निहोत्री,
सदा जप
करनेवाला,
क्रियावान तथा
पण्डित है | (26)
दर्शनीयः
स धनवान्स
योगी
ज्ञानवानपि।
स एव
याज्ञिको
ध्यानी
सर्ववेदार्थदर्शकः।।27।।
वह दर्शन
करने योग्य,
धनवान, योगी,
ज्ञानी, याज्ञिक,
ध्यानी तथा
सर्व वेद के
अर्थ को जानने
वाला है | (27)
गीतायाः
पुस्तकं यत्र
नित्यं पाठे
प्रवर्तते।
तत्र
सर्वाणि
तीर्थानि
प्रयागादीनि
भूतले।।28।।
जहाँ गीता
की पुस्तक का
नित्य पाठ
होता रहता है
वहाँ पृथ्वी
पर के
प्रयागादि
सर्व तीर्थ निवास
करते हैं | (28)
निवसन्ति
सदा गेहे देहेदेशे
सदैव हि।
सर्वे
देवाश्च ऋषयो
योगिनः
पन्नगाश्च
ये।।29।।
उस घर में और
देहरूपी देश
में सभी
देवों, ऋषियों,
योगियों और
सर्पों का सदा
निवास होता है |(29)
गीता
गंगा च
गायत्री सीता
सत्या
सरस्वती।
ब्रह्मविद्या
ब्रह्मवल्ली
त्रिसंध्या
मुक्तगेहिनी।।30।।
अर्धमात्रा
चिदानन्दा
भवघ्नी
भयनाशिनी।
वेदत्रयी
पराऽनन्ता
तत्त्वार्थज्ञानमंजरी।।31।।
इत्येतानि
जपेन्नित्यं
नरो
निश्चलमानसः।
ज्ञानसिद्धिं
लभेच्छीघ्रं
तथान्ते परमं
पदम्।।32।।
गीता, गंगा,
गायत्री,
सीता, सत्या,
सरस्वती, ब्रह्मविद्या,
ब्रह्मवल्ली,
त्रिसंध्या,
मुक्तगेहिनी,
अर्धमात्रा,
चिदानन्दा,
भवघ्नी,
भयनाशिनी,
वेदत्रयी,
परा, अनन्ता
और
तत्त्वार्थज्ञानमंजरी
(तत्त्वरूपी
अर्थ के ज्ञान
का भंडार) इस
प्रकार (गीता
के) अठारह
नामों का
स्थिर मन से जो
मनुष्य नित्य
जप करता है वह
शीघ्र
ज्ञानसिद्धि
और अंत में
परम पद को
प्राप्त होता
है | (30,31,32)
यद्यत्कर्म
च सर्वत्र
गीतापाठं
करोति वै।
तत्तत्कर्म
च निर्दोषं
कृत्वा
पूर्णमवाप्नुयात्।।33।।
मनुष्य
जो-जो कर्म
करे उसमें अगर
गीतापाठ चालू
रखता है तो वह
सब कर्म
निर्दोषता से
संपूर्ण करके
उसका फल
प्राप्त करता
है | (33)
पितृनुद्दश्य
यः श्राद्धे
गीतापाठं
करोति वै।
संतुष्टा
पितरस्तस्य
निरयाद्यान्ति
सदगतिम्।।34।।
जो मनुष्य
श्राद्ध में
पितरों को
लक्ष्य करके
गीता का पाठ
करता है उसके
पितृ
सन्तुष्ट होते
हैं और नर्क
से सदगति पाते
हैं | (34)
गीतापाठेन
संतुष्टाः
पितरः
श्राद्धतर्पिताः।
पितृलोकं
प्रयान्त्येव
पुत्राशीर्वादतत्पराः।।35।।
गीतापाठ से
प्रसन्न बने
हुए तथा
श्राद्ध से तृप्त
किये हुए
पितृगण पुत्र
को आशीर्वाद
देने के लिए
तत्पर होकर
पितृलोक में
जाते हैं | (35)
लिखित्वा
धारयेत्कण्ठे
बाहुदण्डे च
मस्तके।
नश्यन्त्युपद्रवाः
सर्वे
विघ्नरूपाश्च
दारूणाः।।36।।
जो मनुष्य
गीता को लिखकर
गले में, हाथ
में या मस्तक
पर धारण करता
है उसके सर्व
विघ्नरूप दारूण
उपद्रवों का
नाश होता है | (36)
देहं
मानुषमाश्रित्य
चातुर्वर्ण्ये
तु भारते।
न
श्रृणोति
पठत्येव
ताममृतस्वरूपिणीम्।।37।।
हस्तात्त्याक्तवाऽमृतं
प्राप्तं
कष्टात्क्ष्वेडं
समश्नुते
पीत्वा
गीतामृतं
लोके लब्ध्वा
मोक्षं सुखी भवेत्।।38।।
भरतखण्ड में
चार वर्णों
में मनुष्य
देह प्राप्त
करके भी जो
अमृतस्वरूप
गीता नहीं
पढ़ता है या
नहीं सुनता है
वह हाथ में
आया हुआ अमृत
छोड़कर कष्ट
से विष खाता
है | किन्तु
जो मनुष्य
गीता सुनता
है, पढ़ता तो वह इस
लोक में
गीतारूपी अमृत
का पान करके
मोक्ष
प्राप्त कर
सुखी होता है | (37, 38)
जनैः
संसारदुःखार्तैर्गीताज्ञानं
च यैः श्रुतम्।
संप्राप्तममृतं
तैश्च
गतास्ते सदनं
हरेः।।39।।
संसार के
दुःखों से
पीड़ित जिन
मनुष्यों ने गीता
का ज्ञान सुना
है उन्होंने
अमृत प्राप्त
किया है और वे
श्री हरि के
धाम को
प्राप्त हो
चुके हैं | (39)
गीतामाश्रित्य
बहवो भूभुजो
जनकादयः।
निर्धूतकल्मषा
लोके गतास्ते
परमं
पदम्।।40।।
इस लोक में
जनकादि की तरह
कई राजा गीता
का आश्रय लेकर
पापरहित होकर
परम पद को
प्राप्त हुए हैं | (40)
गीतासु
न
विशेषोऽस्ति
जनेषूच्चावचेषु
च।
ज्ञानेष्वेव
समग्रेषु समा
ब्रह्मस्वरूपिणी।।41।।
गीता में
उच्च और नीच
मनुष्य विषयक
भेद ही नहीं
हैं, क्योंकि
गीता
ब्रह्मस्वरूप
है अतः उसका
ज्ञान सबके
लिए समान है | (41)
यः
श्रुत्वा नैव
गीतार्थं
मोदते
परमादरात्।
नैवाप्नोति
फलं लोके
प्रमादाच्च
वृथा श्रमम्।।42।।
गीता के
अर्थ को परम
आदर से सुनकर
जो आनन्दवान
नहीं होता वह
मनुष्य
प्रमाद के
कारण इस लोक में
फल नहीं
प्राप्त करता
है किन्तु
व्यर्थ श्रम
ही प्राप्त
करता है | (42)
गीतायाः
पठनं कृत्वा
माहात्म्यं
नैव यः पठेत्।
वृथा
पाठफलं तस्य
श्रम एव ही
केवलम्।।43।।
गीता का पाठ
करे जो
माहात्म्य का
पाठ नहीं करता
है उसके पाठ
का फल व्यर्थ
होता है और
पाठ केवल
श्रमरूप ही रह
जाता है |
एतन्माहात्म्यसंयुक्तं
गीतापाठं
करोति यः।
श्रद्धया
यः
श्रृणोत्येव
दुर्लभां
गतिमाप्नुयात्।।44।।
इस माहात्म्य
के साथ जो
गीता पाठ करता
है तथा जो श्रद्धा
से सुनता है
वह दुर्लभ गति
को प्राप्त होता
है |(44)
माहात्म्यमेतद्
गीताया मया
प्रोक्तं
सनातनम्।
गीतान्ते
च पठेद्यस्तु
यदुक्तं
तत्फलं लभेत्।।45।।
गीता का
सनातन
माहात्म्य
मैंने कहा है | गीता पाठ के
अन्त में जो
इसका पाठ करता
है वह
उपर्युक्त फल
को प्राप्त
होता है | (45)
इति
श्रीवाराहपुराणोद्धृतं
श्रीमदगीतामाहात्म्यानुसंधानं
समाप्तम् |
इति
श्रीवाराहपुराणान्तर्गत
श्रीमदगीतामाहात्म्यानुंसंधान
समाप्त |
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
अनन्तरूपः
जिनके
अनन्त रूप हैं
वह |
अच्युतः
जिनका
कभी क्षय नहीं
होता, कभी
अधोगति नहीं
होती वह |
अरिसूदनः
प्रयत्न
के बिना ही
शत्रु का नाश
करने वाले |
कृष्णः
'कृष्' सत्तावाचक
है | 'ण' आनन्दवाचक
है | इन
दोनों के एकत्व
का सूचक
परब्रह्म भी
कृष्ण कहलाता
है |
केशवः
क माने
ब्रह्म को और ईश – शिव
को वश में
रखने वाले |
केशिनिषूदनः
घोड़े
का आकार वाले
केशि नामक
दैत्य का नाश
करने वाले |
कमलपत्राक्षः
कमल
के पत्ते जैसी
सुन्दर विशाल
आँखों वाले |
गोविन्दः
गो
माने वेदान्त
वाक्यों के
द्वारा जो
जाने जा सकते
हैं |
जगत्पतिः
जगत
के पति |
जगन्निवासः
जिनमें
जगत का निवास
है अथवा जो
जगत में सर्वत्र
बसे हुए है |
जनार्दनः
दुष्ट
जनों को,
भक्तों के
शत्रुओं को
पीड़ित करने
वाले |
देवदेवः
देवताओं
के पूज्य |
देववरः
देवताओं
में श्रेष्ठ |
पुरुषोत्तमः
क्षर
और अक्षर
दोनों
पुरुषों से
उत्तम अथवा शरीररूपी
पुरों में
रहने वाले
पुरुषों यानी
जीवों से जो
अति उत्तम,
परे और
विलक्षण हैं
वह |
भगवानः
ऐश्वर्य,
धर्म, यश,
लक्ष्मी,
वैराग्य और
मोक्ष... ये छः
पदार्थ देने
वाले अथवा
सर्व भूतों की
उत्पत्ति,
प्रलय, जन्म,
मरण तथा
विद्या और
अविद्या को
जानने वाले |
भूतभावनः
सर्वभूतों
को उत्पन्न
करने वाले |
भूतेशः
भूतों
के ईश्वर, पति |
मधुसूदनः
मधु
नामक दैत्य को
मारने वाले |
महाबाहूः
निग्रह
और अनुग्रह
करने में
जिनके हाथ
समर्थ हैं वह |
माधवः
माया
के, लक्ष्मी
के पति |
यादवः
यदुकुल
में जन्मे हुए |
योगवित्तमः
योग
जानने वालों
में श्रेष्ठ |
वासुदेवः
वासुदेव
के पुत्र |
वार्ष्णेयः
वृष्णि
के ईश, स्वामी |
हरिः
संसाररूपी
दुःख हरने
वाले |
अनघः पापरहित,
निष्पाप |
कपिध्वजः
जिसके
ध्वज पर कपि
माने हनुमान
जी हैं वह |
कुरुश्रेष्ठः
कुरुकुल
में उत्पन्न
होने वालों
में श्रेष्ठ |
कुरुनन्दनः
कुरुवंश
के राजा के
पुत्र |
कुरुप्रवीरः
कुरुकुल
में जन्मे हुए
पुरुषों में
विशेष तेजस्वी |
कौन्तेयः
कुंती
का पुत्र |
गुडाकेशः
निद्रा
को जीतने
वाला, निद्रा
का स्वामी
अथवा गुडाक
माने शिव
जिसके स्वामी
हैं वह |
धनंजयः
दिग्विजय
में सर्व
राजाओं को
जीतने वाला |
धनुर्धरः
धनुष को
धारण करने
वाला |
परंतपः
परम
तपस्वी अथवा
शत्रुओं को
बहुत तपाने
वाला |
पार्थः
पृथा
माने कुंती का
पुत्र |
पुरुषव्याघ्रः
पुरुषों
में व्याघ्र
जैसा |
पुरुषर्षभः
पुरुषों
में ऋषभ माने
श्रेष्ठ |
पाण्डवः
पाण्डु
का पुत्र |
भरतश्रेष्ठः
भरत के
वंशजों में
श्रेष्ठ |
भरतसत्तमः
भरतवंशियों
में श्रेष्ठ |
भरतर्षभः
भरतवंशियों
में श्रेष्ठ |
भारतः
भा माने
ब्रह्मविद्या
में अति प्रेमवाला
अथवा भरत का
वंशज |
महाबाहुः
बड़े
हाथों वाला |
सव्यसाचिन्
बायें
हाथ से भी
सरसन्धान
करने वाला |
श्री
पार्वती जी ने
कहाः भगवन् ! आप सब
तत्त्वों के
ज्ञाता हैं | आपकी कृपा
से मुझे
श्रीविष्णु-सम्बन्धी
नाना प्रकार
के धर्म सुनने
को मिले, जो
समस्त लोक का
उद्धार करने
वाले हैं | देवेश ! अब मैं
गीता का
माहात्म्य
सुनना चाहती
हूँ, जिसका
श्रवण करने से
श्रीहरि की
भक्ति बढ़ती है |
श्री
महादेवजी
बोलेः जिनका
श्रीविग्रह
अलसी के फूल
की भाँति
श्याम वर्ण का
है, पक्षिराज
गरूड़ ही जिनके
वाहन हैं, जो
अपनी महिमा से
कभी च्युत नहीं
होते तथा
शेषनाग की
शय्या पर शयन
करते हैं, उन
भगवान
महाविष्णु की
हम उपासना
करते हैं |
एक समय
की बात है | मुर
दैत्य के नाशक
भगवान विष्णु
शेषनाग के रमणीय
आसन पर
सुखपूर्वक
विराजमान थे | उस समय
समस्त लोकों
को आनन्द देने
वाली भगवती
लक्ष्मी ने
आदरपूर्वक
प्रश्न किया |
श्रीलक्ष्मीजी
ने पूछाः भगवन ! आप
सम्पूर्ण जगत
का पालन करते
हुए भी अपने
ऐश्वर्य के
प्रति उदासीन
से होकर जो इस
क्षीरसागर
में नींद ले
रहे हैं, इसका
क्या कारण है?
श्रीभगवान
बोलेः सुमुखि ! मैं
नींद नहीं
लेता हूँ,
अपितु तत्त्व
का अनुसरण
करने वाली
अन्तर्दृष्टि
के द्वारा
अपने ही
माहेश्वर तेज
का
साक्षात्कार
कर रहा हूँ | यह वही
तेज है, जिसका
योगी पुरुष
कुशाग्र बुद्धि
के द्वारा
अपने
अन्तःकरण में
दर्शन करते हैं
तथा जिसे
मीमांसक
विद्वान
वेदों का
सार-तत्त्व
निश्च्चित करते
हैं | वह
माहेश्वर तेज
एक, अजर,
प्रकाशस्वरूप,
आत्मरूप,
रोग-शोक से
रहित, अखण्ड
आनन्द का
पुंज,
निष्पन्द तथा
द्वैतरहित है | इस जगत
का जीवन उसी
के अधीन है | मैं उसी
का अनुभव करता
हूँ |
देवेश्वरि ! यही
कारण है कि
मैं तुम्हें
नींद लेता सा
प्रतीत हो रहा
हूँ |
श्रीलक्ष्मीजी
ने कहाः हृषिकेश
! आप ही
योगी पुरुषों
के ध्येय हैं | आपके
अतिरिक्त भी
कोई ध्यान
करने योग्य
तत्त्व है, यह
जानकर मुझे
बड़ा कौतूहल
हो रहा है | इस
चराचर जगत की
सृष्टि और
संहार करने
वाले स्वयं आप
ही हैं | आप
सर्वसमर्थ
हैं | इस
प्रकार की
स्थिति में
होकर भी यदि
आप उस परम
तत्त्व से
भिन्न हैं तो
मुझे उसका बोध
कराइये |
श्री
भगवान बोलेः प्रिये ! आत्मा
का स्वरूप
द्वैत और
अद्वैत से
पृथक, भाव और
अभाव से मुक्त
तथा आदि और
अन्त से रहित
है | शुद्ध
ज्ञान के
प्रकाश से
उपलब्ध होने
वाला तथा
परमानन्द
स्वरूप होने
के कारण
एकमात्र
सुन्दर है | वही
मेरा ईश्वरीय
रूप है | आत्मा
का एकत्व ही
सबके द्वारा
जानने योग्य है |
गीताशास्त्र
में इसी का
प्रतिपादन
हुआ है | अमित
तेजस्वी
भगवान विष्णु
के ये वचन
सुनकर लक्ष्मी
देवी ने शंका
उपस्थित करे हुए
कहाः भगवन ! यदि
आपका स्वरूप
स्वयं
परमानंदमय और
मन-वाणी की
पहुँच के बाहर
है तो गीता
कैसे उसका बोध
कराती है? मेरे इस
संदेह का
निवारण कीजिए |
श्री
भगवान बोलेः सुन्दरी
! सुनो,
मैं गीता में
अपनी स्थिति
का वर्णन करता
हूँ | क्रमश
पाँच
अध्यायों को
तुम पाँच मुख
जानो, दस
अध्यायों को
दस भुजाएँ
समझो तथा एक अध्याय
को उदर और दो
अध्यायों को
दोनों चरणकमल जानो | इस
प्रकार यह
अठारह
अध्यायों की
वाङमयी ईश्वरीय
मूर्ति ही
समझनी चाहिए | यह
ज्ञानमात्र
से ही महान
पातकों का नाश
करने वाली है | जो
उत्तम
बुद्धिवाला
पुरुष गीता के
एक या आधे
अध्याय का
अथवा एक, आधे
या चौथाई
श्लोक का भी
प्रतिदिन
अभ्यास करता
है, वह
सुशर्मा के
समान मुक्त हो
जाता है |
श्री
लक्ष्मीजी ने
पूछाः देव !
सुशर्मा कौन
था? किस
जाति का था और
किस कारण से
उसकी मुक्ति
हुई?
श्रीभगवान
बोलेः प्रिय !
सुशर्मा बड़ी
खोटी बुद्धि
का मनुष्य था |
पापियों का तो
वह शिरोमणि ही
था | उसका
जन्म वैदिक
ज्ञान से
शून्य और
क्रूरतापूर्ण
कर्म करने
वाले
ब्राह्मणों
के कुल में
हुआ था | वह न
ध्यान करता
था, न जप, न होम
करता था न
अतिथियों का
सत्कार | वह
लम्पट होने के
कारण सदा
विषयों के
सेवन में ही
लगा रहता था | हल
जोतता और
पत्ते बेचकर
जीविका चलाता
था | उसे
मदिरा पीने का
व्यसन था तथा
वह मांस भी खाया
करता था | इस
प्रकार उसने
अपने जीवन का
दीर्घकाल
व्यतीत कर
दिया | एकदिन
मूढ़बुद्धि
सुशर्मा
पत्ते लाने के
लिए किसी ऋषि
की वाटिका में
घूम रहा था | इसी बीच
मे कालरूपधारी
काले साँप ने
उसे डँस लिया |
सुशर्मा की
मृत्यु हो गयी |
तदनन्तर वह
अनेक नरकों
में जा वहाँ
की यातनाएँ
भोगकर
मृत्युलोक
में लौट आया
और वहाँ बोझ
ढोने वाला बैल
हुआ | उस समय
किसी पंगु ने
अपने जीवन को
आराम से व्यतीत
करने के लिए
उसे खरीद लिया | बैल ने
अपनी पीठ पर
पंगु का भार
ढोते हुए बड़े
कष्ट से सात-आठ
वर्ष बिताए | एक दिन
पंगु ने किसी
ऊँचे स्थान पर
बहुत देर तक
बड़ी तेजी के
साथ उस बैल को
घुमाया | इससे वह
थककर बड़े वेग
से पृथ्वी पर
गिरा और मूर्च्छित
हो गया | उस समय
वहाँ
कुतूहलवश
आकृष्ट हो
बहुत से लोग एकत्रित
हो गये | उस
जनसमुदाय में
से किसी
पुण्यात्मा
व्यक्ति ने उस
बैल का कल्याण
करने के लिए
उसे अपना पुण्य
दान किया |
तत्पश्चात्
कुछ दूसरे
लोगों ने भी
अपने-अपने पुण्यों
को याद करके
उन्हें उसके
लिए दान किया | उस भीड़
में एक वेश्या
भी खड़ी थी | उसे
अपने पुण्य का
पता नहीं था
तो भी उसने
लोगों की
देखा-देखी उस
बैल के लिए
कुछ त्याग
किया |
तदनन्तर
यमराज के दूत
उस मरे हुए
प्राणी को पहले
यमपुरी में ले
गये | वहाँ यह
विचारकर कि यह
वेश्या के
दिये हुए पुण्य
से पुण्यवान
हो गया है, उसे
छोड़ दिया गया
फिर वह भूलोक
में आकर उत्तम
कुल और शील
वाले
ब्राह्मणों
के घर में
उत्पन्न हुआ | उस समय
भी उसे अपने
पूर्वजन्म की
बातों का स्मरण
बना रहा | बहुत
दिनों के बाद
अपने अज्ञान
को दूर करने वाले
कल्याण-तत्त्व
का जिज्ञासु
होकर वह उस वेश्या
के पास गया और
उसके दान की
बात बतलाते हुए
उसने पूछाः 'तुमने कौन
सा पुण्य दान
किया था?' वेश्या
ने उत्तर
दियाः 'वह
पिंजरे में
बैठा हुआ तोता
प्रतिदिन कुछ
पढ़ता है | उससे
मेरा
अन्तःकरण
पवित्र हो गया
है | उसी का
पुण्य मैंने
तुम्हारे लिए
दान किया था |' इसके
बाद उन दोनों
ने तोते से
पूछा | तब उस
तोते ने अपने
पूर्वजन्म का
स्मरण करके
प्राचीन
इतिहास कहना
आरम्भ किया |
शुक
बोलाः पूर्वजन्म
में मैं
विद्वान होकर
भी विद्वता के
अभिमान से
मोहित रहता था | मेरा
राग-द्वेष
इतना बढ़ गया
था कि मैं
गुणवान
विद्वानों के
प्रति भी
ईर्ष्या भाव
रखने लगा | फिर
समयानुसार
मेरी मृत्यु
हो गयी और मैं
अनेकों घृणित
लोकों में
भटकता फिरा | उसके
बाद इस लोक
में आया | सदगुरु
की अत्यन्त
निन्दा करने
के कारण तोते के
कुल में मेरा
जन्म हुआ | पापी
होने के कारण
छोटी अवस्था
में ही मेरा माता-पिता
से वियोग हो
गया | एक दिन
मैं ग्रीष्म
ऋतु में तपे
मार्ग पर पड़ा
था | वहाँ से
कुछ श्रेष्ठ
मुनि मुझे उठा
लाये और
महात्माओं के
आश्रय में
आश्रम के भीतर
एक पिंजरे में
उन्होंने
मुझे डाल दिया | वहीं
मुझे पढ़ाया
गया | ऋषियों
के बालक बड़े
आदर के साथ
गीता के प्रथम
अध्याय की
आवृत्ति करते
थे | उन्हीं
से सुनकर मैं
भी बारंबार
पाठ करने लगा | इसी बीच
में एक चोरी
करने वाले
बहेलिये ने
मुझे वहाँ से
चुरा लिया |
तत्पश्चात्
इस देवी ने
मुझे खरीद
लिया |
पूर्वकाल में
मैंने इस
प्रथम अध्याय
का अभ्यास
किया था,
जिससे मैंने
अपने पापों को
दूर किया है | फिर उसी
से इस वेश्या
का भी
अन्तःकरण
शुद्ध हुआ है
और उसी के पुण्य
से ये
द्विजश्रेष्ठ
सुशर्मा भी
पापमुक्त हुए
हैं |
इस
प्रकार
परस्पर
वार्तालाप और
गीता के प्रथम
अध्याय के
माहात्म्य की
प्रशंसा करके
वे तीनों
निरन्तर
अपने-अपने घर
पर गीता का
अभ्यास करने
लगे, फिर
ज्ञान
प्राप्त करके
वे मुक्त हो गये | इसलिए
जो गीता के
प्रथम अध्याय
को पढ़ता,
सुनता तथा
अभ्यास करता
है, उसे इस
भवसागर को पार
करने में कोई
कठिनाई नहीं
होती |
भगवान
श्रीकृष्ण ने
अर्जुन को
निमित्त बना कर
समस्त विश्व
को गीता के
रूप में जो
महान् उपदेश दिया
है, यह अध्याय
उसकी
प्रस्तावना
रूप है | उसमें
दोनों पक्ष के
प्रमुख
योद्धाओं के
नाम गिनाने के
बाद मुख्यरूप
से अर्जुन को
कुटुंबनाश की
आशंका से
उत्पन्न हुए
मोहजनित
विषाद का
वर्णन है |
।। अथ
प्रथमोऽध्यायः
।।
धृतराष्ट्र
उवाच
धर्मक्षेत्रे
कुरुक्षेत्रे
समवेता
युयुत्सवः।
मामकाः
पाण्डवाश्चैव
किमकुर्वत
संजय।।1।।
धृतराष्ट्र
बोलेः हे संजय
!
धर्मभूमि
कुरुक्षेत्र
में एकत्रित,
युद्ध की
इच्छावाले
मेरे पाण्डु
के पुत्रों ने
क्या किया? (1)
संजय
उवाच
दृष्टवा
तु
पाण्डवानीकं
व्यूढं
दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसंङगम्य
राजा वचनमब्रवीत्।।2।।
संजय
बोलेः उस समय
राजा
दुर्योधन ने
व्यूहरचनायुक्त
पाण्डवों की
सेना को देखकर
और द्रोणाचार्य
के पास जाकर
यह वचन कहाः (2)
पश्यैतां
पाण्डुपुत्राणामाचार्य
महतीं चमूम्।
व्यूढां
द्रुपदपुत्रेण
तव शिष्येण
धीमता।।3।।
हे
आचार्य ! आपके
बुद्धिमान
शिष्य द्रुपदपुत्र
धृष्टद्युम्न
के द्वारा
व्यूहाकार
खड़ी की हुई
पाण्डुपुत्रों
की इस बड़ी भारी
सेना को
देखिये |(3)
अत्र
शूरा
महेष्वासा
भीमार्जुनसमा
युधि।
युयुधानो
विराटश्च
द्रुपदश्च
महारथः।।4।।
धृष्टकेतुश्चेकितानः
काशिराजश्च
वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च
शैब्यश्च
नरपुंङगवः।।5।।
युधामन्युश्च
विक्रान्त
उत्तमौजाश्च
वीर्यवान्।
सौभद्रो
द्रौपदेयाश्च
सर्व एव
महारथाः।।6।।
इस सेना
में बड़े-बड़े
धनुषों वाले
तथा युद्ध में
भीम और अर्जुन
के समान
शूरवीर
सात्यकि और विराट
तथा महारथी
राजा द्रुपद,
धृष्टकेतु और चेकितान
तथा बलवान काशीराज,
पुरुजित,
कुन्तिभोज और
मनुष्यों में
श्रेष्ठ
शैब्य,
पराक्रमी,
युधामन्यु
तथा बलवान उत्तमौजा,
सुभद्रापुत्र
अभिमन्यु और
द्रौपदी के
पाँचों पुत्र
ये सभी महारथी
हैं | (4,5,6)
अस्माकं
तु विशिष्टा
ये तान्निबोध
द्विजोत्तम।
नायका
मम सैन्यस्य
संञ्ज्ञार्थं
तान्ब्रवीमि
ते।।7।।
हे
ब्राह्मणश्रेष्ठ
! अपने
पक्ष में भी
जो प्रधान
हैं, उनको आप
समझ लीजिए | आपकी
जानकारी के
लिए मेरी सेना
के जो-जो सेनापति
हैं, उनको
बतलाता हूँ |
भवान्भीष्मश्च
कर्णश्च
कृपश्च
समितिंञ्जयः।
अश्वत्थामा
विकर्णश्च
सौमदत्तिस्तथैव
च।।8।।
आप, द्रोणाचार्य
और पितामह
भीष्म तथा
कर्ण और संग्रामविजयी
कृपाचार्य
तथा वैसे ही
अश्वत्थामा, विकर्ण
और सोमदत्त का
पुत्र
भूरिश्रवा | (8)
अन्ये
च बहवः शूरा
मदर्थे
त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः
सर्वे
युद्धविशारदाः।।9।।
और भी
मेरे लिए जीवन
की आशा त्याग
देने वाले बहुत
से शूरवीर
अनेक प्रकार
के
अस्त्रों-शस्त्रों
से सुसज्जित
और सब के सब
युद्ध में
चतुर हैं | (9)
अपर्याप्तं
तदस्माकं बलं
भीष्माभिरक्षितम्।
पर्याप्तं
त्विदमेतेषां
बलं
भीमाभिरक्षितम्।।10।।
भीष्म
पितामह
द्वारा
रक्षित हमारी
वह सेना सब
प्रकार से
अजेय है और भीम
द्वारा
रक्षित इन
लोगों की यह
सेना जीतने में
सुगम है | (10)
अयनेषु
च सर्वेषु
यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु
भवन्तः सर्व
एव हि।।11।।
इसलिए
सब मोर्चों पर
अपनी-अपनी जगह
स्थित रहते
हुए आप लोग
सभी निःसंदेह
भीष्म पितामह
की ही सब ओर से
रक्षा करें | (11)
संजय
उवाच
तस्य
संञ्जनयन्हर्षं
कुरुवृद्धः
पितामहः।
सिंहनादं
विनद्योच्चैः
शंख्ङं दध्मौ
प्रतापवान्।।12।।
कौरवों
में वृद्ध
बड़े प्रतापी
पितामह भीष्म
ने उस
दुर्योधन के
हृदय में हर्ष
उत्पन्न करते
हुए उच्च स्वर
से सिंह की
दहाड़ के समान
गरजकर शंख
बजाया | (12)
ततः
शंख्ङाश्च
भेर्यश्च
पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त
स
शब्दस्तुमुलोऽभवत्।।13।।
इसके
पश्चात शंख और
नगारे तथा
ढोल, मृदंग और
नरसिंघे आदि
बाजे एक साथ
ही बज उठे | उनका वह
शब्द बड़ा
भयंकर हुआ | (13)
ततः
श्वेतैर्हयैर्युक्ते
महति
स्यन्दने स्थितौ।
माधवः
पाण्डवश्चैव
दिव्यौ शंख्ङौ
प्रदध्मतुः।।14।।
इसके
अनन्तर सफेद
घोड़ों से
युक्त उत्तम
रथ में बैठे
हुए
श्रीकृष्ण
महाराज और
अर्जुन ने भी
अलौकिक शंख
बजाये |(14)
पाञ्चजन्यं
हृषिकेशो
देवदत्तं
धनञ्जयः।
पौण्ड्रं
दध्मौ महाशंख्ङं
भीमकर्मा
वृकोदरः।।15।।
श्रीकृष्ण
महाराज ने पाञ्चजन्य
नामक, अर्जुन
ने देवदत्त
नामक और भयानक
कर्मवाले
भीमसेन ने
पौण्ड्र नामक
महाशंख बजाया | (15)
अनन्तविजयं
राजा
कुन्तीपुत्रो
युधिष्ठिरः।
नकुलः
सहदेवश्च
सुघोषमणिपुष्पकौ।।16।।
कुन्तीपुत्र
राजा
युधिष्ठिर ने
अनन्तविजय नामक
और नकुल तथा
सहदेव ने
सुघोष और मणिपुष्पकनामक
शंख बजाये | (16)
काश्यश्च
परमेष्वासः
शिखण्डी च
महारथः।
धृष्टद्युम्नो
विराटश्च
सात्यिकश्चापराजितः।।17।।
द्रुपदो
द्रौपदेयाश्च
सर्वशः
पृथिवीपते।
सौभद्रश्च
महाबाहुः शंख्ङान्दध्मुः
पृथक् पृथक्।।18।।
श्रेष्ठ
धनुष वाले
काशिराज और
महारथी शिखण्डी
और धृष्टद्युम्न
तथा राजा
विराट और अजेय
सात्यकि, राजा
द्रुपद और
द्रौपदी के
पाँचों पुत्र
और बड़ी
भुजावाले
सुभद्रापुत्र
अभिमन्यु-इन सभी
ने, हे राजन ! सब ओर
से अलग-अलग
शंख बजाये |
स
घोषो
धार्तराष्ट्राणां
हृदयानि
व्यदारयत्।
नभश्च
पृथिवीं चैव
तुमुलो
व्यनुनादयन्।।19।।
और उस
भयानक शब्द ने
आकाश और
पृथ्वी को भी
गुंजाते हुए
धार्तराष्ट्रों
के अर्थात्
आपके पक्ष
वालों के हृदय
विदीर्ण कर
दिये | (19)
अथ
व्यवस्थितान्दृष्ट्वा
धार्तराष्ट्रान्
कपिध्वजः।
प्रवृत्ते
शस्त्रसम्पाते
धनुरुद्यम्य
पाण्डवः।।20।।
हृषिकेशं
तदा
वाक्यमिदमाह
महीपते।
अर्जुन
उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये
रथं स्थापय
मेऽच्युत।।21।।
हे राजन ! इसके
बाद कपिध्वज
अर्जुन ने
मोर्चा
बाँधकर डटे हए
धृतराष्ट्र
सम्बन्धियों
को देखकर, उस शस्त्र
चलाने की
तैयारी के समय
धनुष उठाकर
हृषिकेश
श्रीकृष्ण
महाराज से यह
वचन कहाः हे
अच्युत ! मेरे रथ
को दोनों
सेनाओं के बीच
में खड़ा
कीजिए |
यावदेतान्निरीक्षेऽहं
योद्ध्रुकामानवस्थितान्।
कैर्मया
सह
योद्धव्यमस्मिन्
रणसमुद्यमे।।22।।
और जब तक
कि मैं
युद्धक्षेत्र
में डटे हुए
युद्ध के
अभिलाषी इन
विपक्षी
योद्धाओं को
भली प्रकार
देख न लूँ कि
इस युद्धरुप
व्यापार में
मुझे किन-किन
के साथ युद्ध
करना योग्य
है, तब तक उसे
खड़ा रखिये | (22)
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं
य एतेऽत्र
समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य
दुर्बुद्धेर्युद्धे
प्रियचिकीर्षवः।।23।।
दुर्बुद्धि
दुर्योधन का
युद्ध में हित
चाहने वाले
जो-जो ये राजा
लोग इस सेना
में आये हैं,
इन युद्ध करने
वालों को मैं
देखूँगा | (23)
संजयउवाच
एवमुक्तो
हृषिकेशो
गुडाकेशेन
भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये
स्थापयित्वा
रथोत्तमम्।।24।।
भीष्मद्रोणप्रमुखतः
सर्वेषां च
महीक्षिताम्।
उवाच
पार्थ
पश्यैतान्
समवेतान्
कुरुनिति।।25।।
संजय
बोलेः हे
धृतराष्ट्र ! अर्जुन
द्वारा इस
प्रकार कहे
हुए महाराज
श्रीकृष्णचन्द्र
ने दोनों
सेनाओं के बीच
में भीष्म और
द्रोणाचार्य
के सामने तथा
सम्पूर्ण राजाओं
के सामने
उत्तम रथ को
खड़ा करके इस
प्रकार कहा कि
हे पार्थ ! युद्ध
के लिए जुटे
हुए इन कौरवों
को देख | (24,25)
तत्रापश्यत्स्थितान्
पार्थः
पितृनथ
पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा।।26।।
श्वशुरान्
सुहृदश्चैव
सेनयोरूभयोरपि।
तान्समीक्ष्य
स कौन्तेय़ः
सर्वान्बन्धूनवस्थितान्।।27।।
कृपया
परयाविष्टो
विषीदन्निमब्रवीत्।
इसके
बाद
पृथापुत्र
अर्जुन ने उन
दोनों सेनाओं
में स्थित
ताऊ-चाचों को,
दादों-परदादों
को, गुरुओं को,
मामाओं को,
भाइयों को,
पुत्रों को, पौत्रों
को तथा
मित्रों को,
ससुरों को और
सुहृदों को भी
देखा | उन
उपस्थित
सम्पूर्ण
बन्धुओं को
देखकर वे कुन्तीपुत्र
अर्जुन
अत्यन्त
करूणा से
युक्त होकर
शोक करते हुए
यह वचन बोले |(26,27)
अर्जुन
उवाच
दृष्ट्वेमं
स्वजनं कृष्ण
युयुत्सुं
समुपस्थितम्।।28।
सीदन्ति
मम गात्राणि
मुखं च
परिशुष्यति।
वेपथुश्च
शरीरे मे
रोमहर्षश्च
जायते।।29।।
अर्जुन
बोलेः हे
कृष्ण !
युद्धक्षेत्र
में डटे हुए
युद्ध के
अभिलाषी इस
स्वजन-समुदाय
को देखकर मेरे
अंग शिथिल हुए
जा रहे हैं और
मुख सूखा जा
रहा है तथा
मेरे शरीर में
कम्प और
रोमांच हो रहा
है |
गाण्डीवं
स्त्रंसते
हस्तात्त्वक्चैव
परिदह्यते।
न च
शक्नोम्यवस्थातुं
भ्रमतीव च मे
मनः।।30।।
हाथ से
गाण्डीव धनुष
गिर रहा है और
त्वचा भी बहुत
जल रही है तथा
मेरा मन भ्रमित
हो रहा है,
इसलिए मैं
खड़ा रहने को
भी समर्थ नहीं
हूँ |(30)
निमित्तानि
च पश्यामि
विपरीतानि
केशव।
न च
श्रेयोऽनुपश्यामि
हत्वा
स्वजनमाहवे।।31।।
हे केशव ! मैं
लक्ष्णों को
भी विपरीत देख
रहा हूँ तथा युद्ध
में
स्वजन-समुदाय
को मारकर
कल्याण भी नहीं
देखता | (31)
न
कांक्षे
विजयं कृष्ण न
च राज्यं
सुखानि च।
किं
नो राज्येन
गोविन्द किं
भोगैर्जीवितेन
वा।।32।।
हे कृष्ण ! मैं
न तो विजय
चाहता हूँ और
न राज्य तथा
सुखों को ही | हे गोविन्द !
हमें ऐसे
राज्य से क्या
प्रयोजन है
अथवा ऐसे भोगों
से और जीवन से
भी क्या लाभ
है? (32)
येषामर्थे
कांक्षितं नो
राज्यं भोगाः
सुखानि च।
त
इमेऽवस्थिता
युद्धे
प्राणांस्त्यक्तवा
धनानि च।।33।।
हमें जिनके
लिए राज्य,
भोग और सुखादि
अभीष्ट हैं,
वे ही ये सब धन
और जीवन की
आशा को
त्यागकर युद्ध
में खड़े हैं | (33)
आचार्याः
पितरः
पुत्रास्तथैव
च पितामहाः।
मातुलाः
श्वशुराः
पौत्राः
श्यालाः
सम्बन्धिनस्तथा।।34।।
गुरुजन,
ताऊ-चाचे,
लड़के और उसी
प्रकार दादे,
मामे, ससुर,
पौत्र, साले
तथा और भी
सम्बन्धी लोग हैं | (34)
एतान्न
हन्तुमिच्छामि
घ्नतोऽपि
मधुसूदन।
अपि
त्रैलोक्यराज्यस्य
हेतोः किं नु
महीकृते।।35।।
हे मधुसूदन !
मुझे मारने पर
भी अथवा तीनों
लोकों के
राज्य के लिए
भी मैं इन
सबको मारना
नहीं चाहता,
फिर पृथ्वी के
लिए तो कहना
ही क्या? (35)
निहत्य
धार्तराष्ट्रान्नः
का प्रीतिः
स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान्
हत्वैतानाततायिनः।।36।।
हे जनार्दन !
धृतराष्ट्र
के पुत्रों को
मारकर हमें
क्या
प्रसन्नता
होगी? इन
आततायियों को
मारकर तो हमें
पाप ही लगेगा | (36)
तस्मान्नार्हा
वयं हन्तुं
धार्तराष्ट्रान्
स्वबान्धवान्।
स्वजनं
हि कथं हत्वा
सुखिनः स्याम
माधव।।37।।
अतएव हे
माधव ! अपने ही
बान्धव
धृतराष्ट्र
के पुत्रों को
मारने के लिए
हम योग्य नहीं
हैं, क्योंकि
अपने ही
कुटुम्ब को
मारकर हम कैसे
सुखी होंगे? (37)
यद्यप्येते
न पश्यन्ति
लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं
दोषं
मित्रद्रोहे
च पातकम्।।38।।
कथं न
ज्ञेयमस्माभिः
पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं
दोषं
प्रपश्यद्भिर्जनार्दन।।39।।
यद्यपि लोभ
से
भ्रष्टचित्त
हुए ये लोग
कुल के नाश से उत्पन्न
दोष को और
मित्रों से
विरोध करने
में पाप को
नहीं देखते,
तो भी हे
जनार्दन ! कुल के
नाश से
उत्पन्न दोष
को जाननेवाले
हम लोगों को
इस पाप से
हटने के लिए
क्यों नहीं
विचार करना
चाहिए?
कुलक्षये
प्रणश्यन्ति
कुलधर्माः
सनातनाः।
धर्मे
नष्टे कुलं
कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत।।40।।
कुल के नाश
से सनातन
कुलधर्म नष्ट
हो जाते हैं,
धर्म के नाश
हो जाने पर
सम्पूर्ण कुल
में पाप भी
बहुत फैल जाता
है |(40)
अधर्माभिभवात्कृष्ण
प्रदुष्यन्ति
कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु
दुष्टासु
वार्ष्णेय
जायते
वर्णसंकरः।।41।।
हे कृष्ण ! पाप
के अधिक बढ़
जाने से कुल
की स्त्रियाँ
अत्यन्त
दूषित हो जाती
हैं और हे
वार्ष्णेय !
स्त्रियों के
दूषित हो जाने
पर वर्णसंकर
उत्पन्न होता
है |(41)
संकरो
नरकायैव
कुलघ्नानां
कुलस्य च।
पतन्ति
पितरो
ह्येषां
लुप्तपिण्डोदकक्रियाः।।42।।
वर्णसंकर
कुलघातियों
को और कुल को
नरक में ले जाने
के लिए ही
होता है |
लुप्त हुई
पिण्ड और जल
की
क्रियावाले
अर्थात्
श्राद्ध और
तर्पण से
वंचित इनके
पितर लोग भी
अधोगति को
प्राप्त होते
हैं |(42)
दोषैरेतैः
कुलघ्नानां
वर्णसंकरकारकैः।
उत्साद्यन्ते
जातिधर्माः
कुलधर्माश्च
शाश्वताः।।43।।
इन
वर्णसंकरकारक
दोषों से
कुलघातियों
के सनातन कुल
धर्म और जाति
धर्म नष्ट हो
जाते हैं | (43)
उत्सन्कुलधर्माणां
मनुष्याणां
जनार्दन।
नरकेऽनियतं
वासो
भवतीत्यनुशुश्रुम।।44।।
हे जनार्दन !
जिनका
कुलधर्म नष्ट
हो गया है, ऐसे
मनुष्यों का
अनिश्चित काल
तक नरक में
वास होता है,
ऐसा हम सुनते
आये हैं |
अहो
बत महत्पापं
कर्तुं
व्यवसिता
वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन
हन्तुं
स्वजनमुद्यताः।।45।।
हा ! शोक ! हम लोग
बुद्धिमान
होकर भी महान
पाप करने को
तैयार हो गये
हैं, जो राज्य
और सुख के लोभ
से स्वजनों को
मारने के लिए
उद्यत हो गये
हैं | (45)
यदि
मामप्रतीकारमशस्त्रं
शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्रा
रणे
हन्युस्तन्मे
क्षेमतरं
भवेत्।।46।।
यदि मुझ
शस्त्ररहित
और सामना न
करने वाले को
शस्त्र हाथ
में लिए हुए
धृतराष्ट्र
के पुत्र रण
में मार डालें
तो वह मारना
भी मेरे लिए
अधिक
कल्याणकारक
होगा | (46)
संजय
उवाच
एवमुक्तवार्जुनः
संख्ये
रथोपस्थ
उपाविशत्।
विसृज्य
सशरं चापं
शोकसंविग्नमानसः।।47।।
संजय बोलेः
रणभूमि में
शोक से
उद्विग्न मन
वाले अर्जुन
इस प्रकार
कहकर, बाणसहित
धनुष को त्यागकर
रथ के पिछले
भाग में बैठ
गये |(47 |
ॐ
तत्सदिति
श्रीमदभगवदगीतासूपनिषत्सु
ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
अर्जुनविषादयोगो
नाम
प्रथमोऽध्यायः | |1 | |
इस
प्रकार
उपनिषद,
ब्रह्मविद्या
तथा योगशास्त्ररूप
श्रीमदभगवदगीता
के
श्रीकृष्ण-अर्जुन
संवाद में 'अर्जुनविषादयोग' नामक
प्रथम अध्याय
संपूर्ण हुआ |
श्री
भगवान कहते
हैं- लक्ष्मी
!
प्रथम अध्याय
के माहात्म्य
का उपाख्यान
मैंने सुना
दिया | अब अन्य
अध्यायों के
माहात्मय
श्रवण करो | दक्षिण
दिशा में
वेदवेत्ता
ब्राह्मणों
के पुरन्दरपुर
नामक नगर में
श्रीमान
देवशर्मा
नामक एक
विद्वान ब्राह्मण
रहते थे | वे
अतिथियों के
पूजक
स्वाध्यायशील,
वेद-शास्त्रों
के विशेषज्ञ,
यज्ञों का
अनुष्ठान
करने वाले और
तपस्वियों के
सदा ही प्रिय
थे |
उन्होंने
उत्तम
द्रव्यों के
द्वारा अग्नि
में हवन करके
दीर्घकाल तक
देवताओं को
तृप्त किया,
किंतु उन
धर्मात्मा
ब्राह्मण को
कभी सदा रहने
वाली शान्ति न
मिली | वे परम
कल्याणमय
तत्त्व का
ज्ञान
प्राप्त करने
की इच्छा से
प्रतिदिन
प्रचुर
सामग्रियों के
द्वारा सत्य
संकल्पवाले
तपस्वियों की
सेवा करने लगे | इस प्रकार
शुभ आचरण करते
हुए उनके समक्ष
एक त्यागी
महात्मा
प्रकट हुए | वे पूर्ण
अनुभवी,
शान्तचित्त
थे |
निरन्तर
परमात्मा के
चिन्तन में
संलग्न हो वे
सदा आनन्द
विभोर रहते थे | देवशर्मा
ने उन नित्य
सन्तुष्ट
तपस्वी को शुद्धभाव
से प्रणाम
किया और पूछाः
'महात्मन
!
मुझे
शान्तिमयी
स्थिती कैसे
प्राप्त होगी?' तब
उन
आत्मज्ञानी
संत ने
देवशर्मा को
सौपुर ग्राम के
निवासी
मित्रवान का,
जो बकरियों का
चरवाहा था,
परिचय दिया और
कहाः 'वही
तुम्हें
उपदेश देगा |'
यह सुनकर
देवशर्मा ने
महात्मा के
चरणों की वन्दना
की और
समृद्धशाली
सौपुर ग्राम
में पहुँचकर
उसके उत्तर
भाग में एक
विशाल वन देखा | उसी वन में
नदी के किनारे
एक शिला पर
मित्रवान
बैठा था |
उसके नेत्र
आनन्दातिरेक
से निश्चल हो
रहे थे, वह
अपलक दृष्टि
से देख रहा था | वह स्थान
आपस का
स्वाभाविक
वैर छोड़कर
एकत्रित हुए
परस्पर
विरोधी
जन्तुओं से
घिरा था |
जहाँ उद्यान
में मन्द-मन्द
वायु चल रही
थी | मृगों
के झुण्ड
शान्तभाव से
बैठे थे और
मित्रवान दया
से भरी हुई
आनन्दमयी
मनोहारिणी
दृष्टि से
पृथ्वी पर
मानो अमृत
छिड़क रहा था | इस रूप में
उसे देखकर
देवशर्मा का
मन प्रसन्न हो
गया | वे
उत्सुक होकर
बड़ी विनय के
साथ मित्रवान
के पास गये | मित्रवान
ने भी अपने
मस्तक को
किंचित्
नवाकर
देवशर्मा का
सत्कार किया | तदनन्तर
विद्वान
देवशर्मा
अनन्य चित्त
से मित्रवान
के समीप गये
और जब उसके
ध्यान का समय समाप्त
हो गया, उस समय
उन्होंने
अपने मन की बात
पूछीः 'महाभाग ! मैं
आत्मा का
ज्ञान
प्राप्त करना
चाहता हूँ |
मेरे इस मनोरथ
की पूर्ति के
लिए मुझे किसी
उपाय का उपदेश
कीजिए, जिसके
द्वारा
सिद्धि प्राप्त
हो चुकी हो |'
देवशर्मा की
बात सुनकरक
मित्रवान ने
एक क्षण तक
कुछ विचार
किया | उसके
बाद इस प्रकार
कहाः 'विद्वन ! एक
समय की बात है | मैं वन के
भीतर बकरियों
की रक्षा कर
रहा था |
इतने में ही
एक भयंकर
व्याघ्र पर
मेरी दृष्टि
पड़ी, जो मानो
सब को ग्रास
लेना चाहता था | मैं मृत्यु
से डरता था,
इसलिए
व्याघ्र को
आते देख
बकरियों के
झुंड को आगे
करके वहाँ से
भाग चला,
किंतु एक बकरी
तुरन्त ही
सारा भय
छोड़कर नदी के
किनारे उस बाघ
के पास बेरोकटोक
चली गयी |
फिर तो
व्याघ्र भी
द्वेष छोड़कर
चुपचाप खड़ा हो
गया | उसे इस
अवस्था में
देखकर बकरी
बोलीः 'व्याघ्र !
तुम्हें तो
अभीष्ट भोजन
प्राप्त हुआ
है | मेरे
शरीर से मांस
निकालकर
प्रेमपूर्वक
खाओ न ! तुम इतनी
देर से खड़े
क्यों हो?
तुम्हारे मन
में मुझे खाने
का विचार
क्यों नहीं हो
रहा है?'
व्याघ्र
बोलाः बकरी ! इस
स्थान पर आते
ही मेरे मन से
द्वेष का भाव
निकल गया | भूख प्यास
भी मिट गयी | इसलिए पास
आने पर भी अब
मैं तुझे खाना
नहीं चाहता |
व्याघ्र के
यों कहने पर
बकरी बोलीः 'न
जाने मैं कैसे
निर्भय हो गयी
हूँ | इसका
क्या कारण हो
सकता है? यदि तुम
जानते हो तो
बताओ |' यह
सुनकर
व्याघ्र ने
कहाः 'मैं भी
नहीं जानता | चलो सामने
खड़े हुए इन
महापुरुष से
पुछें |'
ऐसा निश्चय
करके वे दोनों
वहाँ से चल
दिये | उन
दोनों के
स्वभाव में यह
विचित्र
परिवर्तन देखकर
मैं बहुत
विस्मय में पड़ा
था | इतने
में उन्होंने
मुझसे ही आकर
प्रश्न किया | वहाँ वृक्ष
की शाखा पर एक
वानरराज था | उन दोनों
साथ मैंने भी
वानरराज से
पूछा |
विप्रवर ! मेरे पूछने
पर वानरराज ने
आदरपूर्वक
कहाः 'अजापाल!
सुनो, इस विषय
में मैं
तुम्हें
प्राचीन
वृत्तान्त
सुनाता हूँ | यह सामने वन
के भीतर जो
बहुत बड़ा
मन्दिर है,
उसकी ओर देखो
इसमें
ब्रह्माजी का
स्थापित किया
हुआ एक
शिवलिंग है | पूर्वकाल
में यहाँ
सुकर्मा नामक
एक बुद्धिमान
महात्मा रहते
थे, जो तपस्या
में संलग्न
होकर इस
मन्दिर में
उपासना करते
थे | वे वन
में से फूलों
का संग्रह कर
लाते और नदी
के जल से
पूजनीय भगवान
शंकर को स्नान
कराकर उन्हीं
से उनकी पूजा
किया करते थे | इस प्रकार
आराधना का
कार्य करते
हुए सुकर्मा यहाँ
निवास करते थे | बहुत समय के
बाद उनके समीप
किसी अतिथि का
आगमन हुआ | सुकर्मा ने
भोजन के लिए
फल लाकर अतिथि
को अर्पण किया
और कहाः 'विद्वन ! मैं
केवल
तत्त्वज्ञान
की इच्छा से
भगवान शंकर की
आराधना करता
हूँ | आज इस
आराधना का फल
परिपक्व होकर
मुझे मिल गया
क्योंकि इस
समय आप जैसे
महापुरुष ने
मुझ पर अनुग्रह
किया है |
सुकर्मा के
ये मधुर वचन
सुनकर तपस्या
के धनी महात्मा
अतिथि को बड़ी
प्रसन्नता
हुई |
उन्होंने एक
शिलाखण्ड पर
गीता का दूसरा
अध्याय लिख
दिया और
ब्राह्मण को
उसके पाठ और
अभ्यास के लिए
आज्ञा देते
हुए कहाः 'ब्रह्मन्
! इससे
तुम्हारा
आत्मज्ञान-सम्बन्धी
मनोरथ अपने-आप
सफल हो जायेगा |' यह कहकर
वे बुद्धिमान
तपस्वी
सुकर्मा के
सामने ही उनके
देखते-देखते
अन्तर्धान हो
गये |
सुकर्मा
विस्मित होकर
उनके आदेश के
अनुसार निरन्तर
गीता के
द्वितीय
अध्याय का
अभ्यास करने
लगे |
तदनन्तर
दीर्घकाल के
पश्चात्
अन्तःकरण शुद्ध
होकर उन्हें
आत्मज्ञान की
प्राप्ति हुई
फिर वे
जहाँ-जहाँ
गये,
वहाँ-वहाँ का
तपोवन शान्त
हो गया |
उनमें
शीत-उष्ण और
राग-द्वेष आदि
की बाधाएँ दूर
हो गयीं |
इतना ही नहीं,
उन स्थानों
में भूख-प्यास
का कष्ट भी
जाता रहा तथा
भय का सर्वथा
अभाव हो गया | यह सब
द्वितीय
अध्याय का जप
करने वाले
सुकर्मा
ब्राह्मण की
तपस्या का ही
प्रभाव समझो |
मित्रवान
कहता हैः वानरराज
के यों कहने
पर मैं
प्रसन्नता
पूर्वक बकरी
और व्याघ्र के
साथ उस मन्दिर
की ओर गया | वहाँ जाकर
शिलाखण्ड पर
लिखे हुए गीता
के द्वितीय
अध्याय को
मैंने देखा और
पढ़ा | उसी की
आवृत्ति करने
से मैंने
तपस्या का पार
पा लिया है | अतः
भद्रपुरुष ! तुम
भी सदा
द्वितीय अध्याय
की ही आवृत्ति
किया करो | ऐसा करने पर
मुक्ति तुमसे
दूर नहीं
रहेगी |
श्रीभगवान
कहते हैं- प्रिये !
मित्रवान के
इस प्रकार
आदेश देने पर
देवशर्मा ने
उसका पूजन
किया और उसे
प्रणाम करके
पुरन्दरपुर
की राह ली | वहाँ किसी
देवालय में
पूर्वोक्त
आत्मज्ञानी
महात्मा को
पाकर
उन्होंने यह
सारा
वृत्तान्त
निवेदन किया
और सबसे पहले
उन्हीं से
द्वितीय
अध्याय को
पढ़ा | उनसे
उपदेश पाकर
शुद्ध
अन्तःकरण
वाले देवशर्मा
प्रतिदिन
बड़ी श्रद्धा
के साथ
द्वितीय अध्याय
का पाठ करने
लगे | तबसे
उन्होंने
अनवद्य
(प्रशंसा के
योग्य) परम पद
को प्राप्त कर
लिया |
लक्ष्मी ! यह
द्वितीय
अध्याय का
उपाख्यान कहा
गया |
पहले अध्याय
में गीता में
कहे हुए उपदेश
की प्रस्तावना
रूप दोनों
सेनाओं के
महारथियों की तथा
शंखध्वनिपूर्वक
अर्जुन का रथ
दोनों सेनाओं
के बीच खड़ा
रखने की बात
कही गयी |
बाद में दोनों
सेनाओं में
खड़े अपने
कुटुम्बी और
स्वजनों को
देखकर, शोक और
मोह के कारण
अर्जुन युद्ध
करने से रुक
गया और
अस्त्र-शस्त्र
छोड़कर विषाद
करने बैठ गया | यह बात कहकर
उस अध्याय की
समाप्ति की | बाद में
भगवान
श्रीकृष्ण ने
उन्हें किस
प्रकार फिर से
युद्ध के लिए
तैयार किया,
यह सब बताना
आवश्यक होने
से संजय अर्जुन
की स्थिति का
वर्णन करते
हुए दूसरा
अध्याय
प्रारंभ करता
है |
।।
अथ
द्वितीयोऽध्यायः
।।
संजय
उवाच
तं
तथा
कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
विषीदन्तमिदं
वाक्यमुवाच
मधुसूदनः।।1।।
संजय बोलेः
उस प्रकार
करुणा से
व्याप्त और आँसूओं
से पूर्ण तथा
व्याकुल
नेत्रों वाले
शोकयुक्त उस
अर्जुन के
प्रति भगवान
मधुसूदन ने ये
वचन कहा |(1)
श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा
कश्मलमिदं
विषमे
समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।।2।।
क्लैब्यं
मा स्म गमः
पार्थ
नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं
हृदयदौर्बल्यं
त्यक्तवोत्तिष्ठ
परंतप।।3।।
श्री भगवान
बोलेः हे
अर्जुन ! तुझे इस
असमय में यह
मोह किस हेतु
से प्राप्त हुआ?
क्योंकि न तो
यह श्रेष्ठ
पुरुषों
द्वारा आचरित
है, न स्वर्ग
को देने वाला
है और न
कीर्ति को
करने वाला ही
है | इसलिए
हे अर्जुन !
नपुंसकता को
मत प्राप्त
हो, तुझमें यह
उचित नहीं जान
पड़ती | हे
परंतप ! हृदय की
तुच्छ
दुर्बलता को
त्यागकर
युद्ध के लिए
खड़ा हो जा | (2,3)
अर्जुन
उवाच
कथं
भीष्ममहं
संख्ये द्रोणं
च मधुसूदन।
इषुभिः
प्रतियोत्स्यामि
पूजार्हावरिसूदन।।4।।
अर्जुन
बोलेः हे
मधुसूदन ! मैं
रणभूमि में
किस प्रकार
बाणों से
भीष्म पितामह
और
द्रोणाचार्य
के विरुद्ध
लड़ूँगा?
क्योंकि हे
अरिसूदन ! वे
दोनों ही
पूजनीय हैं |(4)
गुरुनहत्वा
हि महानुभावा-
ञ्छ्रेयो
भोक्तुं
भैक्ष्यमपीह
लोके।
हत्वार्थकामांस्तु
गुरुनिहैव
भुंजीय
भोगान्
रुधिरप्रदिग्धान्।।5।।
इसलिए इन
महानुभाव
गुरुजनों को न
मारकर मैं इस
लोक में
भिक्षा का
अन्न भी खाना
कल्याणकारक समझता
हूँ, क्योंकि
गुरुजनों को
मारकर भी इस लोक
में रुधिर से
सने हुए अर्थ
और कामरूप
भोगों को ही
तो भोगूँगा |(5)
न
चैतद्विद्मः कतरन्नो
गरीयो-
यद्वा
जयेम यदि वा
नो जयेयुः।
यानेव
हत्वा न
जिजीविषाम-
स्तेऽवस्थिताः
प्रमुखे
धार्तराष्ट्राः।।6।।
हम यह भी
नहीं जानते कि
हमारे लिए
युद्ध करना और
न करना – इन
दोनों में से
कौन-सा
श्रेष्ठ है,
अथवा यह भी नहीं
जानते कि
उन्हे हम
जीतेंगे या
हमको वे जीतेंगे
और जिनको
मारकर हम जीना
भी नहीं चाहते,
वे ही हमारे
आत्मीय
धृतराष्ट्र
के पुत्र हमारे
मुकाबले में
खड़े हैं |(6)
कार्पण्दोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि
त्वां
धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छ्रेयः
स्यान्निश्चितं
ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं
शाधि मां
त्वां
प्रपन्नम्।।7।।
इसलिए
कायरतारूप
दोष से उपहत
हुए
स्वभाववाला तथा
धर्म के विषय
में मोहित
चित्त हुआ मैं
आपसे पूछता
हूँ कि जो
साधन निश्चित
कल्याणकारक हो,
वह मेरे लिए
कहिए क्योंकि
मैं आपका
शिष्य हूँ,
इसलिए आपके
शरण हुए मुझको
शिक्षा दीजिए |
न हि
प्रपश्यामि
ममापनुद्या-
द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।
अवाप्य
भूमावसपत्नमृद्धं-
राज्यं
सुराणामपि
चाधिपत्यम्।।8।।
क्योंकि
भूमि में
निष्कण्टक,
धन-धान्यसम्पन्न
राज्य को और
देवताओं के
स्वामीपने को
प्राप्त होकर
भी मैं उस
उपाय को नहीं
देखता हूँ, जो मेरी
इन्द्रियों
को सुखाने
वाले शोक को
दूर कर सके |
संजय
उवाच
एवमुक्तवा
हृषिकेशं
गुडाकेशः
परन्तप।
न
योत्स्य इति
गोविन्दमुक्तवा
तूष्णीं बभूव
ह।।9।।
संजय बोलेः
हे राजन ! निद्रा
को जीतने वाले
अर्जुन
अन्तर्यामी
श्रीकृष्ण
महाराज के
प्रति इस
प्रकार कहकर
फिर श्री
गोविन्द
भगवान से 'युद्ध
नहीं करूँगा' यह
स्पष्ट कहकर
चुप हो गये |(9)
तमुवाच
हृषिकेशः
प्रहसन्निव
भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये
विषीदन्तमिदं
वचः।।10।।
हे भरतवंशी
धृतराष्ट्र !
अन्तर्यामी
श्रीकृष्ण
महाराज ने
दोनों सेनाओं
के बीच में
शोक करते हुए
उस अर्जुन को
हँसते हुए से
यह वचन बोले |(10)
श्री
भगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं
प्रज्ञावादांश्च
भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च
नानुशोचन्ति
पण्डिताः।।11।।
श्री भगवान
बोलेः हे
अर्जुन ! तू न
शोक करने
योग्य
मनुष्यों के
लिए शोक करता
है और
पण्डितों के
जैसे वचनों को
कहता है, परन्तु
जिनके प्राण
चले गये हैं,
उनके लिए और
जिनके प्राण नहीं
गये हैं उनके
लिए भी
पण्डितजन शोक
नहीं करते | (11)
न
त्वेवाहं
जातु नासं न
त्वं नेमे
जनाधिपाः।
न चैव
न भविष्यामः
सर्वे वयमतः
परम्।।12।।
न तो ऐसा ही
है कि मैं
किसी काल में
नहीं था, तू नहीं
था अथवा ये
राजा लोग नहीं
थे और न ऐसा ही
है कि इससे
आगे हम सब नहीं
रहेंगे |(12)
देहिनोऽस्मिन्यथा
देहे कौमारं
यौवनं जरा।
तथा
देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र
न मुह्यति।।13।।
जैसे
जीवात्मा की
इस देह में
बालकपन, जवानी
और
वृद्धावस्था
होती है, वैसे
ही अन्य शरीर
की प्राप्ति
होती है, उस
विषय में धीर
पुरुष मोहित
नहीं होता |
मात्रास्पर्शास्तु
कौन्तेय
शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व
भारत।।14।।
हे
कुन्तीपुत्र !
सर्दी-गर्मी
और सुख-दुःख
देने वाले
इन्द्रिय और
विषयों के
संयोग तो
उत्पत्ति-विनाशशील
और अनित्य
हैं, इसलिए हे
भारत ! उसको तू
सहन कर |(14)
यं हि न
व्यथयन्त्येते
पुरुषं
पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं
धीरं
सोऽमृतत्वाय
कल्पते।।15।।
क्योंकि हे
पुरुषश्रेष्ठ
! दुःख-सुख
को समान समझने
वाले जिस धीर
पुरुष को ये
इन्द्रिय और
विषयों के
संयोग
व्याकुल नहीं
करते, वह
मोक्ष के
योग्य होता है |(15)
नासतो
विद्यते भावो
नाभावो
विद्यते सतः।
उभयोरपि
दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।।16।।
असत् वस्तु
की सत्ता नहीं
है और सत् का
अभाव नहीं है | इस प्रकार
तत्त्वज्ञानी
पुरुषों
द्वारा इन दोनों
का ही तत्त्व
देखा गया है | (16)
अविनाशि
तु तद्विद्धि
येन सर्वमिदं
ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य
न कश्चित्कर्तुमर्हति।।17।।
नाशरहित तो
तू उसको जान,
जिससे यह
सम्पूर्ण जगत
दृश्यवर्ग
व्याप्त है | इस अविनाशी
का विनाश करने
में भी कोई
समर्थ नहीं है | (17)
अन्तवन्त
इमे देहा
नित्यस्योक्ताः
शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य
तस्माद्युध्यस्व
भारत।।18।।
इस नाशरहित,
अप्रमेय, नित्यस्वरूप
जीवात्मा के
ये सब शरीर
नाशवान कहे
गये हैं |
इसलिए हे
भरतवंशी
अर्जुन ! तू
युद्ध कर | (18)
य एनं
वेत्ति
हन्तारं
यश्चैनं
मन्यते हतम्।
उभौ
तौ न विजानीतो
नायं हन्ति न
हन्यते।।19।।
जो उस आत्मा
को मारने वाला
समझता है तथा
जो इसको मरा
मानता है, वे
दोनों ही नहीं
जानते,
क्योंकि यह
आत्मा वास्तव
में न तो किसी
को मारता है
और न किसी के
द्वारा मारा
जाता है |
न
जायते
म्रियते वा
कदाचि-
न्नायं
भूत्वा भविता
वा न भूयः।
अजो
नित्यः
शाश्वतोऽयं
पुराणो
न
हन्यते
हन्यमाने
शरीरे।।20।।
यह आत्मा
किसी काल में
भी न तो
जन्मता है और
न मरता ही है
तथा न यह
उत्पन्न होकर
फिर होने वाला
ही है क्योंकि
यह अजन्मा,
नित्य, सनातन
और पुरातन है | शरीर के
मारे जाने पर
भी यह नहीं
मारा जाता है |
वेदाविनाशिनं
नित्यं य
एनमजमव्ययम्।
कथं स
पुरुषः पार्थ
कं घातयति
हन्ति
कम्।।21।।
हे
पृथापुत्र
अर्जुन ! जो
पुरुष इस
आत्मा को
नाशरहित
नित्य, अजन्मा
और अव्यय
जानता है, वह
पुरुष कैसे
किसको मरवाता
है और कैसे
किसको मारता
है? (21)
वासांसि
जीर्णानि यथा
विहाय
नवानि
गृहणाति नरोऽपराणि।
तथा
शरीराणि
विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि
संयाति नवानि
देही।।22।।
जैसे मनुष्य
पुराने
वस्त्रों को
त्यागकर
दूसरे नये
वस्त्रों को
ग्रहण करता
है, वैसे ही
जीवात्मा
पुराने शरीरों
को त्यागकर
दूसरे नये
शरीरों को
प्राप्त होता
है | (22)
नैनं
छिदन्ति
शस्त्राणि
नैनं दहति
पावकः
न
चैनं
क्लेयन्तयापो
न शोषयति
मारुतः।।23।।
इस आत्मा को
शस्त्र काट
नहीं सकते,
इसको आग जला
नहीं सकती,
इसको जल गला
नहीं सकता और
वायु सुखा
नहीं सकती |
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य
एव च।
नित्यः
सर्वगतः
स्थानुरचलोऽयं
सनातनः।।24।।
क्योंकि यह
आत्मा
अच्छेद्य है,
यह आत्मा अदाह्या,
अक्लेद्य और
निःसंदेह
अशोष्य है तथा
यह आत्मा नित्य,
सर्वव्यापि,
अचल स्थिर
रहने वाला और
सनातन है | (24)
अव्यक्तोऽयमचिन्तयोऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
तस्मादेवं
विदित्वैनं
नानुशोचितुमर्हसि।।25।।
यह आत्मा
अव्यक्त है,
यह आत्मा
अचिन्त्य है
और यह आत्मा
विकाररहित
कहा जाता है | इससे हे
अर्जुन ! इस
आत्मा को
उपर्युक्त
प्रकार से
जानकर तू शोक
करने के योग्य
नहीं है
अर्थात् तुझे
शोक करना उचित
नहीं है | (25)
अथ
चैनं
नित्यजातं
नित्यं वा
मन्यसे
मृतम्।
तथापि
त्वं महाबाहो
नैवं
शोचितुमर्हसि।।26।।
किन्तु यदि
तू इस आत्मा
को सदा
जन्मनेवाला
तथा सदा मरने
वाला मानता
है, तो भी हे महाबाहो
!
तू इस प्रकार
शोक करने को
योग्य नहीं है | (26)
जातस्य
हि ध्रुवो
मृत्युर्ध्रुवं
जन्म मृतस्य
च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे
न त्वं
शोचितुमर्हसि।।27।।
क्योंकि इस
मान्यता के
अनुसार जन्मे
हुए की मृत्यु
निश्चित है और
मरे हुए का
जन्म निश्चित है | इससे भी इस
बिना उपाय
वाले विषम में
तू शोक करने
के योग्य नहीं
है | (27)
अव्यक्तादीनि
भूतानि
व्यक्तमध्यानि
भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव
तत्र का
परिदेवना।।28।।
हे अर्जुन !
सम्पूर्ण
प्राणी जन्म
से पहले
अप्रकट थे और
मरने के बाद
भी अप्रकट हो
जाने वाले
हैं, केवल बीच
में ही प्रकट
है फिर ऐसी
स्थिति में
क्या शोक करना
है? (28)
आश्चर्यवत्पश्यति
कश्चिदेन-
माश्चर्यवद्वदति
तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः
श्रुणोति
श्रुत्वाप्येनं
वेद न चैव
कश्चित्।।29।।
कोई एक
महापुरुष ही
इस आत्मा को
आश्चर्य की भाँति
देखता है और
वैसे ही दूसरा
कोई महापुरुष
ही इसके
तत्त्व का
आश्चर्य की
भाँति वर्णन करता
है तथा दूसरा
कोई अधिकारी
पुरुष ही इसे
आश्चर्य की
भाँति सुनता
है और कोई-कोई
तो सुनकर भी
इसको नहीं
जानता | (29)
देही
नित्यमवध्योऽयं
देहे सर्वस्य
भारत।
तस्मात्सर्वाणि
भूतानि न त्वं
शोचितुमर्हसि।।30।।
हे अर्जुन ! यह
आत्मा सबके
शरीरों में
सदा ही अवध्य
है | इस कारण
सम्पूर्ण
प्राणियों के
लिए तू शोक करने
के योग्य नहीं
है | (30)
स्वधर्ममपि
चावेक्ष्य न
विकम्पितुमर्हसि।
धम्
र्याद्धि
युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य
न
विद्यते।।31।।
तथा अपने
धर्म को देखकर
भी तू भय करने योग्य
नहीं है
अर्थात् तुझे
भय नहीं करना
चाहिए
क्योंकि
क्षत्रिय के
लिए
धर्मयुक्त
युद्ध से
बढ़कर दूसरा
कोई
कल्याणकारी
कर्तव्य नहीं
है | (31)
यदृच्छया
चोपपन्नं
स्वर्गद्वारमपावृतम्।
सुखिनः
क्षत्रियाः
पार्थ लभन्ते
युद्धमीदृशम्।।32।।
हे पार्थ !
अपने आप
प्राप्त हुए
और खुले हुए
स्वर्ग के
द्वाररूप इस
प्रकार के
युद्ध को
भाग्यवान
क्षत्रिय लोग
ही पाते हैं | (32)
अथ
चेत्त्वमिमं
धम् र्यं
संग्रामं न
करिष्यसि।
ततः
स्वधर्मं
कीर्तिं च
हित्वा
पापमवाप्स्यसि।।33।।
किन्तु यदि
तू इस
धर्मयुक्त
युद्ध को नहीं
करेगा तो
स्वधर्म और
कीर्ति को
खोकर पाप को
प्राप्त होगा |(33)
अकीर्तिं
चापि भूतानि
कथयिष्यन्ति
तेऽव्ययाम्।
सम्भावितस्य
चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।।34।।
तथा सब लोग
तेरी बहुत काल
तक रहने वाली
अपकीर्ति भी
कथन करेंगे और
माननीय पुरुष
के लिए अपकीर्ति
मरण से भी
बढ़कर है |(34)
भयाद्रणादुपरतं
मंस्यन्ते
त्वां
महारथाः।
येषां
च त्वं बहुमतो
भूत्वा
यास्यसि
लाघवम्।।35।.
और जिनकी
दृष्टि में तू
पहले बहुत
सम्मानित होकर
अब लघुता को
प्राप्त होगा,
वे महारथी लोग
तुझे भय के
कारण युद्ध
में हटा हुआ
मानेंगे |(35)
अवाच्यवादांश्च
बहून्
वदिष्यन्ति
तवाहिताः।
निन्दन्तस्तव
सामर्थ्यं
ततो दुःखतरं
नु किम्।।36।।
तेरे वैरी
लोग तेरे
सामर्थ्य की
निन्दा करते हुए
तुझे बहुत से
न कहने योग्य
वचन भी कहेंगे | उससे अधिक
दुःख और क्या
होगा?(36)
हतो व
प्राप्स्यसि
स्वर्गं
जित्वा वा
भोक्ष्यसे
महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ
कौन्तेय युद्धाय
कृतनिश्चयः।।37।।
या तो तू
युद्ध में
मारा जाकर
स्वर्ग को
प्राप्त होगा
अथवा संग्राम
में जीतकर
पृथ्वी का राज्य
भोगेगा | इस
कारण हे
अर्जुन ! तू
युद्ध के लिए
निश्चय करके
खड़ा हो जा |(37)
सुखदुःखे
समे कृत्वा
लाभालाभौ
जयाजयौ।
ततो
युद्धाय
युज्यस्व
नैवं पापमवाप्स्यसि।।38।।
जय-पराजय,
लाभ-हानि और
सुख-दुःख को
समान समझकर, उसके
बाद युद्ध के
लिए तैयार हो
जा | इस
प्रकार युद्ध
करने से तू
पाप को नहीं
प्राप्त होगा |(38)
एषा
तेऽभिहिता
सांख्ये
बुद्धिर्योगे
त्विमां
श्रृणु।
बुद्धया
युक्तो यया
पार्थ
कर्मबन्धं
प्रहास्यसि।।39।।
हे पार्थ ! यह
बुद्धि तेरे
लिए ज्ञानयोग
के विषय में
कही गयी और अब
तू इसको
कर्मयोग के
विषय में सुन,
जिस बुद्धि से
युक्त हुआ तू
कर्मों के
बन्धन को भलीभाँति
त्याग देगा
अर्थात्
सर्वथा नष्ट कर
डालेगा |(39)
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति
प्रत्यवायो न
विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य
धर्मस्य
त्रायते महतो
भयात्।।40।।
इस कर्मयोग
में आरम्भ का
अर्थात् बीज
का नाश नहीं
है और उलटा
फलरूप दोष भी
नहीं है,
बल्कि इस कर्मयोगरूप
धर्म का थोड़ा
सा भी साधन
जन्म मृत्युरूप
महान भय से
रक्षा कर लेता
है | (40)
व्यवसायात्मिका
बुद्धिरेकेह
कुरुनन्दन।
बहुशाखा
ह्यनन्ताश्च
बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।।41।।
हे अर्जुन ! इस
कर्मयोग में
निश्चयात्मिका
बुद्धि एक ही होती
है, किन्तु
अस्थिर विचार
वाले
विवेकहीन सकाम
मनुष्यों की
बुद्धियाँ
निश्चय ही
बहुत
भेदोंवाली और
अनन्त होती
हैं |(41)
यामिमां
पुष्पितां
वाचं
प्रवदन्त्यविपश्चितः।
वेदवादरताः
पार्थ
नान्यदस्तीति
वादिनः।।42।।
कामात्मानः
स्वर्गपरा
जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलां
भोगैश्वर्यगतिं
प्रति।।43।।
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां
तयापहृतचेतसाम्।
व्यवसायात्मिका
बुद्धिः
समाधौ न
विधीयते।।44।।
हे अर्जुन ! जो
भोगों में
तन्मय हो रहे
हैं, जो
कर्मफल के
प्रशंसक
वेदवाक्यों में
ही प्रीति
रखते हैं,
जिनकी बुद्धि
में स्वर्ग ही
परम प्राप्य
वस्तु है और
जो स्वर्ग से बढ़कर
दूसरी कोई
वस्तु ही नहीं
है- ऐसा कहने वाले
हैं, वे
अविवेकी जन इस
प्रकार की जिस
पुष्पित
अर्थात्
दिखाऊ
शोभायुक्त
वाणी को कहा
करते हैं जो
कि जन्मरूप
कर्मफल देने
वाली और भोग
तथा ऐश्वर्य
की प्राप्ति
के लिए नाना प्रकार
की बहुत सी
क्रियाओं का
वर्णन करने
वाली है, उस
वाणी द्वारा
जिनका चित्त
हर लिया गया है,
जो भोग और
ऐश्वर्य में
अत्यन्त
आसक्त हैं, उन
पुरुषों की
परमात्मा में
निश्चयात्मिका
बुद्धि नहीं
होती | (42, 43, 44)
त्रैगुण्यविषया
वेदा
निस्त्रैगुण्यो
भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो
नित्यसत्त्वस्थो
निर्योगक्षेम
आत्मवान्।।45।।
हे अर्जुन ! वेद
उपर्युक्त
प्रकार से
तीनों गुणों
के कार्यरूप
समस्त भोगों
और उनके
साधनों का
प्रतिपादन
करने वाले हैं,
इसलिए तू उन
भोगों और उनके
साधनों में
आसक्तिहीन,
हर्ष-शोकादि
द्वन्द्वों
से रहित,
नित्यवस्तु
परमात्मा में
स्थित
योग-क्षेम को
न चाहने वाला
और स्वाधीन
अन्तःकरण
वाला हो |(45)
यावारनर्थ
उदपाने
सर्वतः
सम्प्लुतोदके।
तावान्
सर्वेषु
वेदेषु
ब्राह्मणस्य
विजानतः।।46।।
सब ओर से
परिपूर्ण
जलाशय के
प्राप्त हो
जाने पर छोटे
जलाशय में
मनुष्य का
जितना
प्रयोजन रहता
है, ब्रह्म को
तत्त्व से
जानने वाले
ब्राह्मण का
समस्त वेदों
में उतना ही
प्रयोजन रह
जाता है |(46)
कर्मण्येवाधिकारस्ते
मा फलेषु
कदाचन।
मा
कर्मफलहेतूर्भूर्माते
सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।47।।
तेरा कर्म
करने में ही
अधिकार है,
उनके फलों में
कभी नहीं | इसलिए तू
कर्मों के फल
का हेतु मत हो
तथा तेरी कर्म
न करने में भी
आसक्ति न हो |(47)
योगस्थः
कुरु कर्माणि
सङ्गं
त्यक्तवा
धनंजय।
सिद्धयसिद्धयोः
समो भूत्वा
समत्वं योग
उच्यते।।48।।
हे धनंजय ! तू
आसक्ति को
त्याग कर तथा
सिद्धि और
असिद्धि में
समान
बुद्धिवाला
होकर योग में
स्थित हुआ कर्तव्यकर्मों
को कर,
समत्वभाव ही
योग कहलाता है | (48)
दूरेण
ह्यवरं कर्म
बुद्धियोगाद्धनंजय।
बुद्धौ
शरणमन्विच्छ
कृपणाः
फलहेतवः।।49।।
इस समत्व
बुद्धियोग से
सकाम कर्म
अत्यन्त ही
निम्न श्रेणी
का है
|
इसलिए हे
धनंजय ! तू
समबुद्धि में
ही रक्षा का
उपाय ढूँढ
अर्थात्
बुद्धियोग का
ही आश्रय
ग्रहण कर,
क्योंकि फल के
हेतु बनने
वाले अत्यन्त
दीन हैं |(49)
बुद्धियुक्तो
जहातीह उभे
सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय
युज्यस्व
योगः कर्मसु
कौशलम्।।50।।
समबुद्धियुक्त
पुरुष पुण्य
और पाप दोनों
को इसी लोक
में त्याग
देता है
अर्थात् उनसे
मुक्त हो जाता
है | इससे तू
समत्वरूप योग
में लग जा | यह
समत्वरूप योग
ही कर्मों में
कुशलता है अर्थात्
कर्मबन्धन से
छूटने का उपाय
है |(50)
कर्मजं
बुद्धियुक्ता
हि फलं
त्यक्तवा
मनीषिणः।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः
पदं
गच्छन्त्यनामयम्।।51।।
क्योंकि
समबुद्धि से
युक्त
ज्ञानीजन
कर्मों से
उत्पन्न होने
वाले फल को
त्यागकर
जन्मरूप
बन्धन से
मुक्त हो
निर्विकार
परम पद को
प्राप्त हो
जाते हैं |(51)
यदा
ते मोहकलिलं
बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा
गन्तासि
निर्वेदं
श्रोतव्यस्य
श्रुतस्य
च।।52।।
जिस काल में
तेरी बुद्धि
मोहरूप दलदल
को भली भाँति
पार कर
जायेगी, उस
समय तू सुने
हुए और सुनने
में आने वाले
इस लोक और
परलोकसम्बन्धी
सभी भोगों से
वैराग्य को
प्राप्त हो
जायेगा |(52)
श्रुतिविप्रतिपन्ना
ते यदा
स्थास्यति
निश्चला।
समाधावचला
बुद्धिस्तदा
योगमवाप्स्यसि।।53।।
भाँति-भाँति
के वचनों को
सुनने से
विचलित हुई तेरी
बुद्धि जब
परमात्मा में
अचल और स्थिर
ठहर जायेगी,
तब तू योग को
प्राप्त हो
जायेगा अर्थात्
तेरा
परमात्मा से
नित्य संयोग
हो जायेगा |
अर्जुन
उवाच
स्थितप्रज्ञस्य
का भाषा
समाधिस्थस्य
केशव।
स्थितधीः
किं प्रभाषेत
किमासीत
व्रजेत किम्।।54।।
अर्जुन बोले
हे केशव ! समाधि
में स्थित
परमात्मा को
प्राप्त हुए
स्थिरबुद्धि
पुरुष का क्या
लक्षण है? वह
स्थिरबुद्धि
पुरुष कैसे
बोलता है,
कैसे बैठता है
और कैसे चलता
है?(54)
श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति
यदा
कामान्सर्वान्पार्थ
मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना
तुष्टः
स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।।55।।
श्री भगवान
बोलेः हे
अर्जुन ! जिस काल
में यह पुरुष
मन में स्थित
सम्पूर्ण कामनाओं
को भली भाँति
त्याग देता है
और आत्मा से
आत्मा में ही
संतुष्ट रहता
है, उस काल में
वह
स्थितप्रज्ञ
कहा जाता है |(55)
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः
सुखेषु
विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः
स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।56।।
दुःखों
की प्राप्ति
होने पर जिसके
मन पर उद्वेग
नहीं होता,
सुखों की
प्राप्ति में
जो सर्वथा
निःस्पृह है
तथा जिसके
राग, भय और
क्रोध नष्ट हो
गये हैं, ऐसा
मुनि
स्थिरबुद्धि
कहा जाता है |
यः
सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य
शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति
न द्वेष्टि
तस्य प्रज्ञा
प्रतिष्ठिता।।57।।
जो पुरुष
सर्वत्र
स्नेह रहित
हुआ उस-उस शुभ
या अशुभ वस्तु
को प्राप्त
होकर न प्रसन्न
होता है और न द्वेष
करता है उसकी
बुद्धि स्थिर
है | (57)
यदा
संहरते चायं
कूर्मोऽङ्गनीव
सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य
प्रज्ञा
प्रतिष्ठिता।।58।।
और
जैसे कछुवा सब
ओर से अपने
अंगों को समेट
लेता है, वैसे
ही जब यह
पुरुष
इन्द्रियों
के विषयों से
इन्द्रियों
के सब प्रकार
से हटा लेता
है, तब उसकी
बुद्धि स्थिर
है | (ऐसा
समझना चाहिए) |
विषया
विनिवर्तन्ते
निराहारस्य
देहिनः।
रसवर्जं
रसोऽप्यस्य
परं दृष्ट्वा
निवर्तते।।59।।
इन्द्रियों
के द्वारा
विषयों को
ग्रहण न करने
वाले पुरुष के
भी केवल विषय
तो निवृत्त्
हो जाते हैं,
परन्तु उनमें
रहने वाली
आसक्ति
निवृत्त नहीं
होती |
इस
स्थितप्रज्ञ
पुरुष की तो
आसक्ति भी
परमात्मा का
साक्षात्कार
करके निवृत्त
हो जाती है | (59)
यततो
ह्यपि
कौन्तेय
पुरुषस्य
विपश्चितः।
इन्द्रियाणि
प्रमाथीनि
हरन्ति
प्रसभं मनः।।60।।
हे
अर्जुन ! आसक्ति का
नाश न होने के
कारण ये
प्रमथन
स्वभाव वाली
इन्द्रियाँ
यत्न करते हुए
बुद्धिमान
पुरुष के मन
को भी बलात्
हर लेती हैं |(60)
तानि
सर्वाणि
संयम्य युक्त
आसीत मत्परः।
वशे हि
यस्येन्द्रियाणि
तस्य प्रज्ञा
प्रतिष्ठिता।।61।।
इसलिए
साधक को चाहिए
कि वह उन
सम्पूर्ण
इन्द्रियों
को वश में
करके
समाहितचित्त
हुआ मेरे
परायण होकर ध्यान
में बैठे,
क्योंकि जिस
पुरुष की
इन्द्रियाँ
वश में होती
हैं, उसी की
बुद्धि स्थिर
हो जाती है | (61)
ध्यायतो
विषयान्पुंसः
सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते
कामः
कामात्क्रोधोऽभिजायते।।62।।
विषयों
का चिन्तन
करने वाले पुरुष की उन
विषयों में
आसक्ति हो
जाती है, आसक्ति
से उन विषयों
की कामना
उत्पन्न होती
है और कामना
में विघ्न
पड़ने से
क्रोध
उत्पन्न होता
है |(62)
क्रोधाद्
भवति सम्मोहः
सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्
बुद्धिनाशो
बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।63।।
क्रोध
से अत्यन्त
मूढ़भाव
उत्पन्न हो
जाता है,
मूढ़भाव से
स्मृति में
भ्रम हो जाता
है, स्मृति
में भ्रम हो
जाने से
बुद्धि
अर्थात्
ज्ञानशक्ति का
नाश हो जाता
है और बुद्धि
का नाश हो
जाने से यह
पुरुष अपनी
स्थिति से गिर
जाता है |(63)
रागद्वेषवियुक्तैस्तु
विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा
प्रसादमधिगच्छति।।64।।
परन्तु
अपने अधीन
किये हुए
अन्तः
करणवाला साधक
अपने वश में
की हुई,
राग-द्वेष से
रहित इन्द्रियों
द्वारा
विषयों में
विचरण करता
हुआ अन्तःकरण
की प्रसन्नता
को प्राप्त
होता है |(64)
प्रसादे
सर्वदुःखानां
हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो
ह्याशु
बुद्धिः
पर्यवतिष्ठते।।65।।
अन्तःकरण
की प्रसन्नता
होने पर इसके
सम्पूर्ण
दुःखों का
अभाव हो जाता
है और उस
प्रसन्न चित्तवाले
कर्मयोगी की
बुद्धि शीघ्र
ही सब ओर से
हटकर
परमात्मा में
ही भली भाँति
स्थिर हो जाती
है |(65)
नास्ति
बुद्धिरयुक्तस्य
न चायुक्तस्य
भावना।
न
चाभावयतः
शान्तिरशान्तस्य
कुतः
सुखम्।।66।।
न
जीते हुए मन
और
इन्द्रियों
वाले पुरुष
में निश्चयात्मिका
बुद्धि नहीं
होती और उस
अयुक्त
मनुष्य के
अन्तःकरण में
भावना भी नहीं
होती तथा
भावनाहीन
मनुष्य को
शान्ति नहीं
मिलती और
शान्तिरहित
मनुष्य को सुख
कैसे मिल सकता
है?(66)
इन्द्रियाणां
हि चरतां
यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य
हरति
प्रज्ञां
वायुर्नावमिवाम्भसि।।67।।
क्योंकि
जैसे जल में
चलने वाली नाव
को वायु हर
लेती है, वैसे
ही विषयों में
विचरती हुई
इन्द्रियों
में से मन जिस
इन्द्रिय के
साथ रहता है
वह एक ही
इन्द्रिय इस
अयुक्त पुरुष
की बुद्धि को
हर लेती है |(67)
तस्माद्यस्य
महाबाहो
निगृहीतानि
सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य
प्रज्ञा
प्रतिष्ठिता।।68।।
इसलिए
हे महाबाहो ! जिस
पुरुष की
इन्द्रियाँ
इन्द्रियों
के विषयों से
सब प्रकार
निग्रह की हुई
हैं, उसी की
बुद्धि स्थिर
है |(68)
या निशा
सर्वभूतानां
तस्यां
जागर्ति
संयमी।
यस्यां
जाग्रति
भूतानि सा
निशा पश्यतो
मुनेः।।69।।
सम्पूर्ण
प्राणियों के
लिए जो रात्रि
के समान है, उस
नित्य
ज्ञानस्वरूप
परमानन्द की
प्राप्ति में
स्थितप्रज्ञ
योगी जागता है
और जिस नाशवान
सांसारिक सुख
की प्राप्ति
में सब प्राणी
जागते हैं,
परमात्मा के
तत्त्व को
जानने वाले
मुनि के लिए
वह रात्रि के
समान है |
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः
प्रविशन्ति
यद्वत्।
तद्वत्कामा
यं
प्रविशन्ति
सर्वे
स
शान्तिमाप्नोति
न
कामकामी।।70।।
जैसे
नाना नदियों
के जल सब ओर से
परिपूर्ण अचल
प्रतिष्ठावाले
समुद्र में
उसको विचलित न
करते हुए ही
समा जाते हैं,
वैसे ही सब
भोग जिस
स्थितप्रज्ञ
पुरुष में
किसी प्रकार
का विकार
उत्पन्न किये
बिना ही समा
जाते हैं, वही
पुरुष परम
शान्ति को प्राप्त
होता है,
भोगों को
चाहने वाला नहीं | (70)
विहाय
कामान्यः
सर्वान्पुमांश्चरति
निःस्पृहः।
निर्ममो
निरहंकारः स
शान्तिमधिगच्छति।।71।।
जो
पुरुष
सम्पूर्ण
कामनाओं को
त्यागकर ममतारहित,
अहंकार रहित
और स्पृहा रहित
हुआ विचरता
है, वही
शान्ति को
प्राप्त होता
है अर्थात् वह
शान्ति को
प्राप्त है |(71)
एषा
ब्राह्मी
स्थितिः
पार्थ नैनां
प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि
ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।।72।।
हे
अर्जुन ! यह ब्रह्म
को प्राप्त
हुए पुरुष की
स्थिति है | इसको
प्राप्त होकर
योगी कभी
मोहित नहीं
होता और
अन्तकाल में
भी इस
ब्राह्मी
स्थिति में स्थित
होकर
ब्रह्मानन्द
को प्राप्त हो
जाता है |
ॐ
तत्सदिति
श्रीमदभगवदगीतासूपनिषत्सु
ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
सांख्ययोगो
नाम द्वितीयोऽध्यायः |
|2 | |
इस
प्रकार
उपनिषद,
ब्रह्मविद्या
तथा योगशास्त्र
रूप श्रीमद्
भगवदगीता के
श्रीकृष्ण-अर्जुन
संवाद में 'सांख्ययोग'
नामक द्वितीय
अध्याय
सम्पूर्ण हुआ |
श्री भगवान
कहते हैं- प्रिये ! जनस्थान
में एक जड़
नामक
ब्राह्मण था,
जो कौशिक वंश
में उत्पन्न
हुआ था |
उसने अपना
जातीय धर्म
छोड़कर बनिये की
वृत्ति में मन
लगाया |
उसे परायी
स्त्रियों के
साथ व्यभिचार
करने का व्यसन
पड़ गया था | वह सदा जुआ
खेलता, शराब
पीता और शिकार
खेलकर जीवों
की हिंसा किया
करता था | इसी प्रकार
उसका समय
बीतता था | धन नष्ट हो
जाने पर वह
व्यापार के
लिए बहुत दूर
उत्तर दिशा
में चला गया | वहाँ से धन
कमाकर घर की
ओर लौटा | बहुत दूर तक
का रास्ता
उसने तय कर
लिया था | एक दिन
सूर्यास्त हो
जाने पर जब
दसों दिशाओं में
अन्धकार फैल
गया, तब एक
वृक्ष के नीचे
उसे लुटेरों
ने धर दबाया
और शीघ्र ही
उसके प्राण ले
लिए | उसके
धर्म का लोप
हो गया था,
इसलिए वह बड़ा
भयानक प्रेत
हुआ |
उसका
पुत्र बड़ा ही
धर्मात्मा और
वेदों का विद्वान
था | उसने
अब तक पिता के
लौट आने की
राह देखी | जब वे नहीं
आये, तब उनका
पता लगाने के
लिए वह स्वयं
भी घर छोड़कर
चल दिया | वह
प्रतिदिन खोज
करता, मगर
राहगीरों से
पूछने पर भी
उसे उनका कुछ
समाचार नहीं
मिलता था | तदनन्तर एक
दिन एक मनुष्य
से उसकी भेंट
हुई, जो उसके
पिता का सहायक
था, उससे सारा
हाल जानकर उसने
पिता की
मृत्यु पर
बहुत शोक किया | वह बड़ा
बुद्धिमान था | बहुत कुछ
सोच-विचार कर
पिता का
पारलौकिक
कर्म करने की
इच्छा से
आवश्यक
सामग्री साथ ले
उसने काशी
जाने का विचार
किया |
मार्ग में
सात-आठ मुकाम
डाल कर वह
नौवें दिन उसी
वृक्ष के नीचे
आ पहुँचा जहाँ
उसके पिता मारे
गये थे |
उस स्थान पर
उसने
संध्योपासना
की और गीता के तीसरे
अध्याय का पाठ
किया |
इसी समय आकाश
में बड़ी
भयानक आवाज
हुई | उसने
पिता को भयंकर
आकार में देखा
फिर तुरन्त ही
अपने सामने आकाश
में उसे एक
सुन्दर विमान
दिखाई दिया,
जो तेज से
व्याप्त था | उसमें
अनेकों क्षुद्र
घंटिकाएँ लगी
थीं | उसके
तेज से समस्त
दिशाएँ
आलोकित हो रही
थीं | यह
दृश्य देखकर
उसके चित्त की
व्यग्रता दूर
हो गयी |
उसने विमान पर
अपने पिता को
दिव्य रूप
धारण किये
विराजमान देखा | उनके शरीर
पर पीताम्बर
शोभा पा रहा
था और मुनिजन
उनकी स्तुति
कर रहे थे | उन्हें
देखते ही
पुत्र ने
प्रणाम किया,
तब पिता ने भी
उसे आशीर्वाद
दिया |
तत्पश्चात्
उसने पिता से
यह सारा
वृत्तान्त पूछा | उसके उत्तर
में पिता ने
सब बातें
बताकर इस
प्रकार कहना
आरम्भ कियाः 'बेटा !
दैववश मेरे
निकट गीता के
तृतीय अध्याय
का पाठ करके
तुमने इस शरीर
के द्वारा किए
हुए दुस्त्यज
कर्मबन्धन से
मुझे छुड़ा दिया | अतः अब घर
लौट जाओ
क्योंकि
जिसके लिए तुम
काशी जा रहे
थे, वह
प्रयोजन इस
समय तृतीय
अध्याय के पाठ
से ही सिद्ध
हो गया है |' पिता
के यों कहने
पर पुत्र ने
पूछाः 'तात ! मेरे हित का
उपदेश दीजिए
तथा और कोई
कार्य जो मेरे
लिए करने
योग्य हो
बतलाइये |' तब पिता ने
कहाः 'अनघ ! तुम्हे यही
कार्य फिर
करना है | मैंने जो
कर्म किये
हैं, वही मेरे
भाई ने भी
किये थे | इससे वे घोर
नरक में पड़े
हैं | उनका
भी तुम्हे
उद्धार करना
चाहिए तथा
मेरे कुल के
और भी जितने
लोग नरक में
पड़े हैं, उन
सबका भी
तुम्हारे
द्वारा
उद्धार हो
जाना चाहिए | यही मेरा
मनोरथ है | बेटा ! जिस साधन के
द्वारा तुमने
मुझे संकट से
छुड़ाया है, उसी
का अनुष्ठान
औरों के लिए
भी करना उचित
है | उसका
अनुष्ठान
करके उससे
होने वाला
पुण्य उन नारकी
जीवों को
संकल्प करक दे
दो | इससे
वे समस्त
पूर्वज मेरी
ही तरह यातना
से मुक्त हो
स्वल्पकाल
में ही
श्रीविष्णु
के परम पद को
प्राप्त हो
जायेंगे |'
पिता
का यह संदेश
सुनकर पुत्र
ने कहाः 'तात ! यदि ऐसी बात
है और आपकी भी
ऐसी रूचि है
तो मैं समस्त
नारकी जीवों
का नरक से
उद्धार कर
दूँगा |' यह सुनकर
उसके पिता
बोलेः 'बेटा ! एवमस्तु | तुम्हारा
कल्याण हो | मेरा
अत्यन्त
प्रिय कार्य
सम्पन्न हो
गया |'
इस प्रकार
पुत्र को
आश्वासन देकर उसके
पिता भगवान
विष्णु के परम
धाम को चले
गये |
तत्पश्चात्
वह भी लौटकर
जनस्थान में
आया और परम
सुन्दर भगवान
श्रीकृष्ण के
मन्दिर में उनके
समक्ष बैठकर
पिता के
आदेशानुसार
गीता के तीसरे
अध्याय का पाठ
करने लगा | उसने नारकी
जीवों का
उद्धार करने
की इच्छा से
गीतापाठजनित
सारा पुण्य
संकल्प करके
दे दिया |
इसी
बीच में भगवान
विष्णु के दूत
यातना भोगने वाले
नरक की जीवों
को छुड़ाने के
लिए यमराज के
पास गये | यमराज ने
नाना प्रकार
के सत्कारों
से उनका पूजन
किया और
कुशलता पूछी | वे बोलेः 'धर्मराज
!
हम लोगों के
लिए सब ओर
आनन्द ही आनन्द
है |'
इस प्रकार
सत्कार करके
पितृलोक के
सम्राट परम
बुद्धिमान यम
ने
विष्णुदूतों
से यमलोक में आने
का कारण पूछा |
तब
विष्णुदूतों
ने कहाः यमराज ! शेषशय्या
पर शयन करने
वाले भगवान
विष्णु ने हम
लोगों को आपके
पास कुछ संदेश
देने के लिए
भेजा है | भगवान हम
लोगों के मुख
से आपकी कुशल
पूछते हैं और
यह आज्ञा देते
हैं कि 'आप नरक में
पड़े हुए
समस्त
प्राणियों को
छोड़ दें |'
अमित
तेजस्वी
भगवान विष्णु
का यह आदेश
सुनकर यम ने
मस्तक झुकाकर
उसे स्वीकार
किया और मन ही
मन कुछ सोचा |
तत्पश्चात्
मदोन्मत्त
नारकी जीवों
को नरक से
मुक्त देखकर
उनके साथ ही
वे भगवान
विष्णु के वास
स्थान को चले | यमराज
श्रेष्ठ
विमान के
द्वारा जहाँ
क्षीरसागर
हैं, वहाँ जा
पहुँचे |
उसके भीतर
कोटि-कोटि
सूर्यों के
समान कान्तिमान
नील कमल दल के
समान
श्यामसुन्दर
लोकनाथ जगदगुरु
श्री हरि का
उन्होंने
दर्शन किया | भगवान का
तेज उनकी
शय्या बने हुए
शेषनाग के
फणों की मणियों
के प्रकाश से
दुगना हो रहा
था | वे
आनन्दयुक्त
दिखाई दे रहे
थे | उनका
हृदय
प्रसन्नता से
परिपूर्ण था |
भगवती
लक्ष्मी अपनी
सरल चितवन से
प्रेमपूर्वक
उन्हें
बार-बार निहार
रहीं थीं | चारों ओर
योगीजन भगवान
की सेवा में
खड़े थे | ध्यानस्थ
होने के कारण
उन योगियों की
आँखों के तारे
निश्चल
प्रतीत होते
थे |
देवराज
इन्द्र अपने
विरोधियों को
परास्त करने
के उद्देश्य
से भगवान की
स्तुति कर रहे
थे |
ब्रह्माजी के
मुख से निकले
हुए
वेदान्त-वाक्य
मूर्तिमान
होकर भगवान के
गुणों का गान
कर रहे थे | भगवान
पूर्णतः
संतुष्ट होने
के साथ ही
समस्त योनियों
की ओर से
उदासीन
प्रतीत होते
थे |
जीवों में से
जिन्होंने
योग-साधन के
द्वारा अधिक
पुण्य संचय
किया था, उन
सबको एक ही
साथ वे कृपादृष्टि
से निहार रहे
थे |
भगवान अपने
स्वरूप भूत
अखिल चराचर
जगत को आनन्दपूर्ण
दृष्टि से
आमोदित कर रहे
थे |
शेषनाग की
प्रभा से
उद्भासित और
सर्वत्र व्यापक
दिव्य विग्रह
धारण किये नील
कमल के सदृश श्याम
वर्णवाले
श्रीहरि ऐसे
जान पड़ते थे,
मानो चाँदनी
से घिरा हुआ
आकाश सुशोभित
हो रहा हो | इस प्रकार
भगवान की
झाँकी के
दर्शन करके
यमराज अपनी
विशाल बुद्धि
के द्वारा
उनकी स्तुति करने
लगे |
यमराज
बोलेः सम्पूर्ण
जगत का
निर्माण करने
वाले परमेश्वर
!
आपका
अन्तःकरण
अत्यन्त
निर्मल है | आपके मुख से
ही वेदों का
प्रादुर्भाव
हुआ है |
आप ही
विश्वस्वरूप
और इसके
विधायक
ब्रह्मा हैं | आपको
नमस्कार है | अपने बल और
वेग के कारण
जो अत्यन्त
दुर्धर्ष प्रतीत
होते हैं, ऐसे
दानवेन्द्रों
का अभिमान चूर्ण
करने वाले
भगवान विष्णु
को नमस्कार है | पालन के समय
सत्त्वमय
शरीर धारण
करने वाले, विश्व
के आधारभूत,
सर्वव्यापी
श्रीहरि को
नमस्कार है | समस्त
देहधारियों
की पातक-राशि को
दूर करने वाले
परमात्मा को
प्रणाम है | जिनके
ललाटवर्ती
नेत्र के
तनिक-सा खुलने
पर भी आग की
लपटें निकलने
लगती हैं, उन
रूद्ररूपधारी
आप परमेश्वर
को नमस्कार है | आप
सम्पूर्ण
विश्व के
गुरु, आत्मा
और महेश्वर
हैं, अतः
समस्त
वैश्नवजनों
को संकट से
मुक्त करके उन
पर अनुग्रह
करते हैं | आप माया से
विस्तार को
प्राप्त हुए
अखिल विश्व
में व्याप्त
होकर भी कभी
माया अथवा
उससे उत्पन्न
होने वाले
गुणों से
मोहित नहीं
होते |
माया तथा
मायाजनित
गुणों के बीच
में स्थित होने
पर भी आप पर
उनमें से किसी
का प्रभाव
नहीं पड़ता | आपकी महिमा
का अन्त नहीं
है, क्योंकि
आप असीम हैं
फिर आप वाणी
के विषय कैसे
हो सकते हैं? अतः
मेरा मौन रहना
ही उचित है |
इस
प्रकार
स्तुति करके
यमराज ने हाथ
जोड़कर कहाः 'जगदगुरो
!
आपके आदेश से
इन जीवों को
गुणरहित होने
पर भी मैंने
छोड़ दिया है | अब मेरे
योग्य और जो
कार्य हो, उसे
बताइये |' उनके यों
कहने पर भगवान
मधुसूदन मेघ
के समान गम्भीर
वाणी द्वारा
मानो अमृतरस
से सींचते हुए
बोलेः 'धर्मराज ! तुम
सबके प्रति
समान भाव रखते
हुए लोकों का
पाप से उद्धार
कर रहे हो | तुम पर
देहधारियों
का भार रखकर
मैं निश्चिन्त
हूँ | अतः
तुम अपना काम करो
और अपने लोक
को लौट जाओ |'
यों
कहकर भगवान
अन्तर्धान हो
गये |
यमराज भी अपनी
पुरी को लौट
आये | तब वह
ब्राह्मण
अपनी जाति के
और समस्त
नारकी जीवों
का नरक से उद्धार
करके स्वयं भी
श्रेष्ठ
विमान द्वारा
श्री
विष्णुधाम को
चला गया |
दूसरे
अध्याय में
भगवान
श्रीकृष्ण ने
श्लोक 11 से
श्लोक 30 तक
आत्मतत्त्व
समझाकर
सांख्ययोग का
प्रतिपादन
किया |
बाद में श्लोक
31 से श्लोक 53 तक
समस्त
बुद्धिरूप कर्मयोग
के द्वारा
परमेश्वर को
पाये हुए स्थितप्रज्ञ
सिद्ध पुरुष
के लक्षण,
आचरण और महत्व
का प्रतिपादन
किया | इसमें
कर्मयोग की
महिमा बताते
हुए भगवान ने 47 तथा
48वें श्लोक
में कर्मयोग
का स्वरूप
बताकर अर्जुन
को कर्म करने
को कहा |
49वें श्लोक
में समत्व
बुद्धिरूप
कर्मयोग की अपेक्षा
सकाम कर्म का
स्थान बहुत
नीचा बताया | 50वें श्लोक में
समत्व
बुद्धियुक्त
पुरुष की
प्रशंसा करके
अर्जुन को
कर्मयोग में
जुड़ जाने के
लिए कहा और 51 वे
श्लोक में
बताया कि
समत्व
बुद्धियुक्त
ज्ञानी पुरुष
को परम पद की
प्राप्ति
होती है | यह प्रसंग
सुनकर अर्जुन
ठीक से तय
नहीं कर पाया | इसलिए
भगवान से उसका
और स्पष्टीकरण
कराने तथा
अपना निश्चित
कल्याण जानने
की इच्छा से
अर्जुन पूछता
हैः
।। अथ
तृतीयोऽध्यायः
।।
अर्जुन
उवाच
ज्यायसी
चेत्कर्मणस्ते
मता
बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं
कर्मणि घोरे
मां नियोजयसि
केशव।।1।।
अर्जुन
बोलेः हे
जनार्दन ! यदि आपको
कर्म की
अपेक्षा
ज्ञान
श्रेष्ठ मान्य
है तो फिर हे
केशव ! मुझे भयंकर
कर्म में
क्यों लगाते
हैं?
व्यामिश्रेणेव
वाक्येन
बुद्धिं
मोहयसीव मे।
तदेकं वद
निश्चित्य
येन
श्रेयोऽहमाप्नुयाम्।।2।।
आप
मिले हुए
वचनों से मेरी
बुद्धि को
मानो मोहित कर
रहे हैं | इसलिए उस एक
बात को
निश्चित करके
कहिए जिससे
मैं कल्याण को
प्राप्त हो
जाऊँ |(2)
श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा
निष्ठा पुरा
प्रोक्ता
मयानघ।
ज्ञानयोगेन
सांख्यानां
कर्मयोगेन
योगिनाम्।।3।।
श्री
भगवनान बोलेः
हे निष्पाप ! इस
लोक में दो प्रकार
की निष्ठा
मेरे द्वारा
पहले कही गयी
है |
उनमें से
सांख्ययोगियों
की निष्ठा तो
ज्ञानयोग से
और योगियों की
निष्ठा
कर्मयोग से
होती है |(3)
न
कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं
पुरुषोऽश्नुते।
न च
संन्यसनादेव
सिद्धिं
समधिगच्छति।।4।।
मनुष्य
न तो कर्मों
का आरम्भ किये
बिना निष्कर्मता
को यानि
योगनिष्ठा को
प्राप्त होता
है और न कर्मों
के केवल
त्यागमात्र
से सिद्धि
यानी सांख्यनिष्ठा
को ही प्राप्त
होता है |(4)
न हि
कश्चित्क्षणमपि
जातु
तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते
ह्यवशः कर्म
सर्वः
प्रकृतिजैर्गुणैः।।5।।
निःसंदेह
कोई भी मनुष्य
किसी काल में
क्षणमात्र भी
बिना कर्म
किये नहीं
रहता, क्योंकि
सारा मनुष्य
समुदाय
प्रकृति जनित
गुणों द्वारा
परवश हुआ कर्म
करने के लिए
बाध्य किया
जाता है |
कर्मेन्द्रियाणि
संयम्य य
आस्ते मनसा
स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा
मिथ्याचारः स
उच्यते।।6।।
जो
मूढबुद्धि
मनुष्य समस्त
इन्द्रियों
को हठपूर्वक
ऊपर से रोककर
मन से उन इन्द्रियों
के विषयों का
चिन्तन करता
रहता है, वह
मिथ्याचारी
अर्थात्
दम्भी कहा
जाता है |(6)
यस्त्विन्द्रियाणी
मनसा
नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः
कर्मयोगमसक्तः
स विशिष्यते।।7।।
किन्तु
हे
अर्जुन ! जो पुरुष मन से
इन्द्रियों
को वश में
करके अनासक्त
हुआ समस्त
इन्द्रियों
द्वारा
कर्मयोग का
आचरण करता है,
वही श्रेष्ठ
है |(7)
नियतं
कुरु कर्म
त्वं कर्म
ज्यायो
ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि
च ते न
प्रसिद्धयेदकर्मणः।।8।।
तू
शास्त्रविहित
कर्तव्य कर्म
कर, क्योंकि कर्म
न करने की अपेक्षा
कर्म करना
श्रेष्ठ है
तथा कर्म न
करने से तेरा
शरीर निर्वाह
भी सिद्ध नहीं
होगा |(8)
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र
लोकोऽयं
कर्मबन्धनः।
तदर्थं
कर्म कौन्तेय
मुक्तसङ्गः
समाचर।।9।।
यज्ञ
के निमित्त
किये जाने
कर्मों के
अतिरिक्त
दूसरे कर्मों
में लगा हुआ
ही यह मनुष्य
समुदाय
कर्मों से
बँधता है | इसलिए हे
अर्जुन ! तू आसक्ति
से रहित होकर
उस यज्ञ के
निमित्त ही
भलीभाँति
कर्तव्य कर्म
कर |(9)
सहयज्ञाः
प्रजाः
सृष्ट्वा
पुरोवाच
प्रजापतिः।
अनेन
प्रसविष्यध्वमेष
वोऽस्तिवष्टकामधुक्।।10।।
प्रजापति
ब्रह्मा ने
कल्प के आदि
में यज्ञ सहित
प्रजाओं को
रचकर उनसे कहा
कि तुम लोग इस
यज्ञ के
द्वारा
वृद्धि को
प्राप्त होओ
और यह यज्ञ
तुम लोगों को
इच्छित भोग
प्रदान करने वाला
हो |(10)
देवान्भावयतानेन
ते देवा
भावयन्तु वः।
परस्परं
भावयन्तः
श्रेयः
परमवाप्स्यथ।।11।।
तुम
लोग इस यज्ञ
के द्वारा देवताओं
को उन्नत करो
और वे देवता
तुम लोगों को
उन्नत करें | इस प्रकार
निःस्वार्थभाव
से एक-दूसरे
को उन्नत करते
हुए तुम लोग
परम कल्याण को
प्राप्त हो
जाओगे |(11)
इष्टान्भोगान्हि
वो देवा
दास्यन्ते
यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो
यो भुंक्ते
स्तेन एव
सः।।12।।
यज्ञ
के द्वारा
बढ़ाये हुए
देवता तुम
लोगों को बिना
माँगे ही
इच्छित भोग
निश्चय ही
देते रहेंगे | इस प्रकार
उन देवताओं के
द्वारा दिये
हुए भोगों को
जो पुरुष उनको
बिना दिये
स्वयं भोगता
है, वह चोर ही
है |(12)
यज्ञशिष्टाशिनः
सन्तो
मुच्यन्ते
सर्वकिल्बिषैः।
भुंजते ते
त्वघं पापा ये
पचन्त्यात्मकारणात्।।13।।
यज्ञ
से बचे हुए
अन्न को खाने
वाले श्रेष्ठ
पुरुष सब
पापों से
मुक्त हो जाते
हैं और पापी
लोग अपना
शरीर-पोषण
करने के लिये
ही अन्न पकाते
हैं, वे तो पाप
को ही खाते
हैं |(13)
अन्नाद्
भवन्ति
भूतानि
पर्जन्यादन्नसंभवः।
यज्ञाद्
भवति
पर्जन्यो
यज्ञः
कर्मसमुद्
भवः।।14।।
कर्म
ब्रह्मोद्
भवं विद्धि
ब्रह्माक्षरसमुदभवम्।
तस्मात्सर्वगतं
ब्रह्म
नित्यं यज्ञे
प्रतिष्ठितम्।।15।।