
गीता प्रसाद
गीता के सातवें अध्याय का माहात्म्य
विश्व में तत्त्व को जानने वाले विरले ही होते हैं।
परमात्मा हमारे साथ होते हुए भी दुःखी क्यों?
स्वयं को गुणातीत जानकर मुक्त बनो
तत्त्ववेत्ता की प्राप्ति दुर्लभ है
कामनापूर्ति हेतु भी भगवान की शरण ही जाओ
खण्ड से नहीं, अखण्ड से प्रीति करें.....
अव्यक्त तत्त्व का अनुसंधान करो
परमात्म-प्राप्ति में बाधकः इच्छा और द्वेष
प्रयाणकाल में भी ज्ञान हो जाय तो मुक्ति
नन्द के लाल ! कुर्बान तेरी सूरत पर
श्री
वेदव्यास ने
महाभारत में
गीता का वर्णन
करने के
उपरान्त कहा
हैः
गीता
सुगीता
कर्तव्या
किमन्यैः
शास्त्रविस्तरैः।
या
स्वयं
पद्मनाभस्य
मुखपद्माद्विनिः
सुता।।
'गीता
सुगीता करने
योग्य है
अर्थात् श्री
गीता को भली
प्रकार पढ़कर
अर्थ और भाव
सहित अंतःकरण
में धारण कर
लेना मुख्य
कर्तव्य है,
जो कि स्वयं
श्री पद्मनाभ
विष्णु भगवान
के मुखारविन्द
से निकली हुई
है, फिर अन्य
शास्त्रों के
विस्तार से
क्या प्रयोजन
है?'
गीता
सर्वशास्त्रमयी
है। गीता में
सारे शास्त्रों
का सार भार
हुआ है। इसे
सारे
शास्त्रों का
खजाना कहें तो
भी अत्युक्ति
न होगी। गीता
का भलीभाँति ज्ञान
हो जाने पर सब
शास्त्रों का
तात्त्विक ज्ञान
अपने आप हो
सकता है। उसके
लिए अलग से परिश्रम
करने की
आवश्यकता
नहीं रहती।
वराहपुराण
में गीता का
महिमा का बयान
करते-करते भगवान
ने स्वयं कहा
हैः
गीताश्रयेऽहं
तिष्ठामि
गीता मे
चोत्तमं गृहम्।
गीताज्ञानमुपाश्रित्य
त्रींल्लोकान्पालयाम्यहम्।।
'मैं गीता के आश्रय में रहता हूँ। गीता मेरा श्रेष्ठ घर है। गीता के ज्ञान का सहारा लेकर ही मैं तीनों लोकों का पालन करता हूँ।'
श्रीमद्
भगवदगीता
केवल किसी
विशेष धर्म या
जाति या
व्यक्ति के
लिए ही नहीं,
वरन्
मानवमात्र के
लिए उपयोगी व
हितकारी है।
चाहे किसी भी
देश, वेश,
समुदाय, संप्रदाय,
जाति, वर्ण व
आश्रम का
व्यक्ति
क्यों न हो,
यदि वह इसका
थोड़ा-सा भी
नियमित
पठन-पाठन करें
तो उसे अनेक अनेक
आश्चर्यजनक
लाभ मिलने
लगते हैं।
गीता का
परम लक्ष्य है
मानवमात्र का
कल्याण करना।
किसी भी
स्थिति में
इन्सान को
चाहिए कि वह
ईश्वर-प्राप्ति
से वंचित न रह
जाए क्योंकि ईश्वर
की प्राप्ति
ही मनुष्य
जीवन का परम
उद्देश्य है
लेकिन भ्रमवश
मनुष्य भौतिक
सुख-सुविधाओं
के वशीभूत होकर
नाना प्रकार
से अपनी
इन्द्रियों
को तृप्त करने
के प्रयासों
में उलझ जाता
है और सिवाय दुःखों
के उसे अन्य
कुछ नहीं
मिलता। भगवद्
गीता इसी
भ्रम-भेद को
मिटाकर एक
अत्यधिक सरल,
सहज व
सर्वोच्च
दिव्य
ज्ञानयुक्त
पथ का प्रदर्शन
करती है। गीता
के अमृतवचनों
का आचमन करने
से मनुष्य को
भोग व मोक्ष
दोनों की ही
प्राप्ति
होती है।
कनाडा के
प्राइम
मिनिस्टर मि.
पीअर ट्रुडो
ने जब गीता
पढ़ी तो वे
दंग रहे गये।
मि. पीअर. ट्रुडो
ने कहाः
"मैंने बाइबिल पढ़ी, एंजिल पढ़ा, और भी कई धर्मग्रन्थ पढ़े। सब ग्रन्थ अपनी-अपनी जगह पर ठीक हैं लेकिन हिन्दुओं का यह श्रीमद् भगवद गीता रूपी ग्रन्थ तो अदभुत है ! इसमें किसी भी मत-मजहब, पंथ, संप्रदाय की निंदा स्तुति नहीं है बल्कि इसमें तो मनुष्यमात्र के विकास की बात है। शरीर स्वस्थ, मन प्रसन्न और बुद्धि में समत्व योग का, ब्रह्मज्ञान का प्रकाश जगानेवाला ग्रन्थ भगवद् गीता है... गीता केवल हिन्दुओं का ही धर्मग्रन्थ नहीं है, मानवमात्र का धर्मग्रन्थ है। Geeta is not the Bible of Hindus, but it is the Bible of humanity."
गीता में
ऐसा उत्तम और
सर्वव्यापी
ज्ञान है कि
उसके रचयिता
को हजारों
वर्ष बीत गये
हैं किन्तु उसके
बाद दूसरा ऐसा
एक भी ग्रन्थ
आज तक नहीं लिखा
गया है। 18
अध्याय एवं 700
श्लोकों में
रचित तथा भक्ति,
ज्ञान, योग
एवं
निष्कामता
आदि से भरपूर
यह गीता
ग्रन्थ विश्व
में एकमात्र
ऐसा ग्रन्थ है
जिसकी जयंती
मनायी जाती
है।
गीता
मानव में से
महेश्वर का
निर्माण करने
की शक्ति रखती
है। गीता
मृत्यु के
पश्चात नहीं,
वरन् जीते-जी
मुक्ति का
अनुभव कराने
का सामर्थ्य
रखती है। जहाँ
हाथी चिंघाड़
रहे हों, घोड़े
हिनहिना रहे
हों,
रणभेरियाँ भज
रही हों, अनेकों
योद्धा दूसरे
पक्ष के लिए
प्रतिशोध की
आग में जल रहे
हों ऐसी जगह
पर भगवान श्रीकृष्ण
ने गीता की
शीतल धारा
बहायी है।
भगवान श्रीकृष्ण
ने गीता के
माध्यम से
अरण्य की विद्या
को रण के
मैदान में ला
दिया। शांत
गिरि-गुफाओं
के ध्यानयोग
को युद्ध के
कोलाहल भरे
वातावरण में
भी समझा दिया।
उनकी कितनी
करूणा है ! गीता
भगवान
श्रीकृष्ण के
श्रीमुख से
निकला हुआ वह
परम अमृत है
जिसको पाने के
लिए देवता भी
लालायित रहते
हैं।
.....और गीता
की जरूरत केवल
अर्जुन को हो
थी ऐसी बात
नहीं है। हम
सब भी युद्ध
के मैदान में
ही हैं।
अर्जुन ने तो
थोड़े ही दिन
युद्ध किया
किन्तु हमारा
त सारा जीवन
काम, क्रोध,
लोभ, मोह, भय,
शोक,
मेरा-तेरारूपी
युद्ध के बीच
ही है। अतः
अर्जुन को
गीता की जितनी
जरूरत थी,
शायद उससे भी
ज्यादा आज के
मानव को उसकी
जरूरत है।
श्रीमद्
भगवद् गीता के
ज्ञानामृत के
पान से मनुष्य
के जीवन में
साहस, सरलता,
स्नेह, शांति
और धर्म आदि
दैवी गुण सहज
में ही विकसित
हो उठते हैं।
अधर्म, अन्याय
एवं शोषण
मुकाबला करने
का सामर्थ्य आ
जाता है। भोग
एवं मोक्ष दोनों
ही प्रदान
करने वाला,
निर्भयता आदि
दैवी गुणों को
विकसित
करनेवाला यह
गीता ग्रन्थ
पूरे विश्व
में अद्वितिय
है।
हमें
अत्यन्त
प्रसन्नता है
कि पूज्यपाद
संत श्री
आसाराम जी
महाराज के
पावन
मुखारविन्द
से निःसृत
श्रीमद् भगवद्
गीता के
सातवें
अध्याय की
सरल, सहज एवं
स्पष्ट
व्याख्या को 'गीता
प्रसाद' के रूप
में आपके
समक्ष
प्रस्तुत कर
रहे हैं....
श्री
योग वेदान्त
सेवा समिति,
अमदावाद
आश्रम।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
गीता के सातवें अध्याय का माहात्म्य
भगवान शिव
कहते हैं – पार्वती ! अब
मैं सातवें
अध्याय का
माहात्म्य
बतलाता हूँ,
जिसे सुनकर
कानों में
अमृत-राशि भर
जाती है।
पाटलिपुत्र
नामक एक
दुर्गम नगर
है, जिसका गोपुर
(द्वार) बहुत
ही ऊँचा है।
उस नगर में
शंकुकर्ण
नामक एक ब्राह्मण
रहता था, उसने
वैश्य-वृत्ति
का आश्रय लेकर
बहुत धन
कमाया, किंतु
न तो कभी
पितरों का तर्पण
किया और न
देवताओं का
पूजन ही। वह
धनोपार्जन
में तत्पर
होकर राजाओं
को ही भोज
दिया करता था।
एक समय की
बात है। एक
समय की बात
है। उस ब्राह्मण
ने अपना चौथा
विवाह करने के
लिए पुत्रों
और बन्धुओं के
साथ यात्रा
की। मार्ग में
आधी रात के
समय जब वह सो
रहा था, तब एक सर्प
ने कहीं से
आकर उसकी बाँह
में काट लिया।
उसके काटते ही
ऐसी अवस्था हो
गई कि मणि,
मंत्र और औषधि
आदि से भी
उसके शरीर की
रक्षा असाध्य जान
पड़ी।
तत्पश्चात
कुछ ही क्षणों
में उसके
प्राण पखेरु
उड़ गये और वह
प्रेत बना।
फिर बहुत समय
के बाद वह
प्रेत
सर्पयोनि में
उत्पन्न हुआ।
उसका वित्त धन
की वासना में बँधा
था। उसने
पूर्व
वृत्तान्त को
स्मरण करके
सोचाः
'मैंने घर के बाहर करोड़ों की संख्या में अपना जो धन गाड़ रखा है उससे इन पुत्रों को वंचित करके स्वयं ही उसकी रक्षा करूँगा।'
साँप की
योनि से
पीड़ित होकर
पिता ने एक
दिन स्वप्न
में अपने
पुत्रों के
समक्ष आकर
अपना मनोभाव
बताया। तब
उसके पुत्रों
ने सवेरे उठकर
बड़े विस्मय
के साथ
एक-दूसरे से
स्वप्न की
बातें कही।
उनमें से
मंझला पुत्र
कुदाल हाथ में
लिए घर से
निकला और जहाँ
उसके पिता सर्पयोनि
धारण करके
रहते थे, उस
स्थान पर गया।
यद्यपि उसे धन
के स्थान का
ठीक-ठीक पता
नहीं था तो भी
उसने चिह्नों
से उसका ठीक
निश्चय कर लिया
और लोभबुद्धि
से वहाँ
पहुँचकर
बाँबी को खोदना
आरम्भ किया।
तब उस बाँबी
से बड़ा भयानक
साँप प्रकट
हुआ और बोलाः
'ओ मूढ़ ! तू कौन है? किसलिए आया है? यह बिल क्यों खोद रहा है? किसने तुझे भेजा है? ये सारी बातें मेरे सामने बता।'
पुत्रः "मैं
आपका पुत्र
हूँ। मेरा नाम
शिव है। मैं
रात्रि में
देखे हुए
स्वप्न से
विस्मित होकर
यहाँ का
सुवर्ण लेने
के कौतूहल से
आया हूँ।"
पुत्र की यह वाणी सुनकर वह साँप हँसता हुआ उच्च स्वर से इस प्रकार स्पष्ट वचन बोलाः "यदि तू मेरा पुत्र है तो मुझे शीघ्र ही बन्धन से मुक्त कर। मैं अपने पूर्वजन्म के गाड़े हुए धन के ही लिए सर्पयोनि में उत्पन्न हुआ हूँ।"
पुत्रः "पिता जी! आपकी मुक्ति कैसे होगी? इसका उपाय मुझे बताईये, क्योंकि मैं इस रात में सब लोगों को छोड़कर आपके पास आया हूँ।"
पिताः "बेटा ! गीता के अमृतमय सप्तम अध्याय को छोड़कर मुझे मुक्त करने में तीर्थ, दान, तप और यज्ञ भी सर्वथा समर्थ नहीं हैं। केवल गीता का सातवाँ अध्याय ही प्राणियों के जरा मृत्यु आदि दुःखों को दूर करने वाला है। पुत्र ! मेरे श्राद्ध के दिन गीता के सप्तम अध्याय का पाठ करने वाले ब्राह्मण को श्रद्धापूर्वक भोजन कराओ। इससे निःसन्देह मेरी मुक्ति हो जायेगी। वत्स ! अपनी शक्ति के अनुसार पूर्ण श्रद्धा के साथ निर्व्यसी और वेदविद्या में प्रवीण अन्य ब्राह्मणों को भी भोजन कराना।"
सर्पयोनि
में पड़े हुए
पिता के ये
वचन सुनकर सभी
पुत्रों ने
उसकी
आज्ञानुसार
तथा उससे भी अधिक
किया। तब
शंकुकर्ण ने
अपने
सर्पशरीर को त्यागकर
दिव्य देह
धारण किया और
सारा धन पुत्रों
के अधीन कर
दिया। पिता ने
करोड़ों की
संख्या में जो
धन उनमें बाँट
दिया था, उससे
वे पुत्र बहुत
प्रसन्न हुए।
उनकी बुद्धि
धर्म में लगी
हुई थी, इसलिए
उन्होंने
बावली, कुआँ,
पोखरा, यज्ञ
तथा देवमंदिर के
लिए उस धन का
उपयोग किया और
अन्नशाला भी
बनवायी।
तत्पश्चात
सातवें
अध्याय का सदा
जप करते हुए
उन्होंने
मोक्ष
प्राप्त
किया।
हे पार्वती ! यह तुम्हें सातवें अध्याय का माहात्म्य बतलाया, जिसके श्रवणमात्र से मानव सब पातकों से मुक्त हो जाता है।"
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
नारायण.....
नारायण.....
नारायण....
श्रीमद्
भगवद् गीता के
सातवें
अध्याय के पहले
एवं दूसरे
श्लोक में
भगवान श्री
कृष्ण कहते हैं-
मय्यासक्तमनाः
पार्थ योगं
युंजन्मदाश्रयः।
असंशयं
समग्रं मां
यथा
ज्ञास्यसि
तच्छृणु।।
'हे पार्थ ! मुझमें अनन्य प्रेम से आसक्त हुए मन वाला और अनन्य भाव से मेरे परायण होकर, योग में लगा हुआ मुझको संपूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्यादि गुणों से युक्त सबका आत्मरूप जिस प्रकार संशयरहित जानेगा उसको सुन।'
ज्ञानं
तेऽहं
सविज्ञानमिदं
वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा
नेह
भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यवशिष्यते।।
"मैं तेरे लिए इस विज्ञानसहित तत्त्वज्ञान को संपूर्णता से कहूँगा कि जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रहता है।"
मय्यासक्तमनाः
अर्थात्
मुझमें आसक्त
हुए मनवाला।
यहाँ
ध्यान देने
योग्य बात है
कि 'मुझमें' यानि
भगवान के 'मैं' का ठीक
अर्थ समझा
जाये। अगर
भगवान के 'मैं' का सही
अर्थ नहीं
समझा और हममें
आसक्ति है तो
हम भगवान के
किसी रूप को 'भगवान'
समझेंगे। यदि
हममें द्वेष
है तो हम
कहेंगे कि 'भगवान
कितने
अहंकारी हैं?' इस
प्रकार अगर
हमारे चित्त
में राग होगा
तो हम श्री
कृष्ण की
आकृति को
पकड़ेंगे और
अगर द्वेष
होगा तो श्री
कृष्ण को
अहंकारी
समझेंगे।
श्री
कृष्ण कह रहे
हैं 'मुझमें
आसक्त...' जब तक
श्री कृष्ण का
'मैं' समझ में
नहीं आता अथवा
जब तक श्री
कृष्ण के 'मैं' की तरफ
नज़र नहीं है
तब तक श्री
कृष्ण के इशारे
को हम ठीक से
नहीं समझ
सकते। सच पूछो
तो श्री कृष्ण
का 'मैं' वास्तव
में सबका 'मैं' है।
श्रीकृष्ण
ने गीता ने
कही नहीं वरन्
श्री कृष्ण
द्वारा गीता
गूँज गयी। हम
जो कुछ करते
हैं। इस
प्रकार करने
वाले
परिच्छिन्न
को मौजूद रखकर
कुछ कहें।
श्री कृष्ण के
जीवन में
अत्यन्त सहजता
है,
स्वाभाविकता
है। तभी तो वे
कहते सकते
हैं-
'मय्यासक्तमना.....बनो'
'आसक्ति.....
प्रीति....' शब्द तो
छोटे हैं,
बेचारे हैं।
अर्थ हमें लगाना
पड़ता है। जो
हमारी बोलचाल
की भाषा है
वही
श्रीकृष्ण बोलेंगे..
जो हमारी
बोलचाल की
भाषा है वही
गुरु बोलेंगे।
भाषा तो
बेचारी अधूरी
है। अर्थ भी उसमें
हमारी बुद्धि
के अनुसार
लगता है।
लेकिन हमारी बुद्धि
जब हमारे
व्यक्तित्व
का, हमारे देह
के दायरे का
आकर्षण छोड़
देती है तब हम
कुछ-कुछ समझने
के काबिल हो
पाते हैं और
जब समझने का
काबिल होते
हैं तब यही
समझा जाता है
कि हम जो समझते
हैं, वह कुछ
नहीं। आज तक
हमने जो कुछ
जाना है, जो
कुछ समझा है,
वह कुछ नहीं
है। क्योंकि
जिसको जानने
से सब जाना
जाता है उसे अभी
तक हमने नहीं
जाना। जिसको
पाने से सब
पाया जाता है
उसको नहीं
पाया।
बुद्धि
में जब तक
पकड़ होती है
तब तक कुछ
जानकारियाँ
रखकर हम अपने
को जानकर,
विद्वान या
ज्ञानी मान
लेते हैं। अगर
बुद्धि में
परमात्मा के
लिए प्रेम होता
है,
आकांक्षाएँ
नहीं होती हैं
तो हमने जो
कुछ जाना है
उसकी कीमत कुछ
नहीं लगती
वरन् जिससे
जाना जाता है
उसको समझने के
लिए हमारे पास
समता आती है।
भाषा तो हो
सकती है कि हम 'ईश्वर
से प्रेम करते
हैं' किन्तु
सचमुच में
ईश्वर से
प्रेम है कि
पदार्थों को
सुरक्षित रखने
के लिए हम
ईश्वर का
उपयोग करते
हैं? हमारी
आसक्ति
परमात्मा में
है कि नश्वर
चीजों को पाने
में है? जब तक
नश्वर चीजों
में आसक्ति
होगी, नश्वर
चीजों में
प्रीति होगी
और
मिटनेवालों
का आश्रय होगा
तब तक अमिट
तत्त्व का बोध
नहीं होगा और
जब तक अमिट
तत्त्व का बोध
नहीं होगा तब
तक जन्म-मरण क
चक्र भी नहीं
मिटेगा।
श्री
कृष्ण कहते
हैं- मय्यासक्तमनाः
पार्थ.... यदि
सचमुच ईश्वर
में प्रीति हो
जाती है तो
ईश्वर से हम
नश्वर चीजों
की माँग ही
नहीं करते। ईश्वर
से, संत से यदि
स्नेह हो जाये
तो भगवान का जो
भगवद् तत्त्व
है, संत का जो संत
तत्त्व है, वह
हमारे दिल में
भी उभरने लगता
है।
हमारे चित्त में होता तो है संसार का राग और करते हैं भगवान का भजन... इसीलिए लम्बा समय लग जाता है। हम चाहते हैं उस संसार को जो कभी किसी का नहीं रहा, जो कभी किसी का तारणहार नहीं बना और जो कभी किसी के साथ नहीं चला। हम मुख मोड़ लेते हैं उस परमात्मा से जो सदा-सर्वदा-सर्वत्र सबका आत्मा बनकर बैठा है। इसीलिए भगवान कहते हैं- 'यदि तुम्हारा चित्त मुझमें आसक्त हो जाये तो मैं तुम्हें वह आत्मतत्त्व का रहस्य सुना देता हूँ।'
जब तक
ईश्वर में
प्रीति नहीं
होती तब तक वह
रहस्य समझ में
नहीं आता।
श्री वशिष्ठ
जी महाराज कहते
हैं- 'हे राम
जी!
तृष्णावान के
हृदय में संत
के वचन नहीं
ठहरते।
तृष्णावान से तो
वृक्ष भी भय
पाते हैं'
इच्छा-वासना-तृष्णा
आदमी की
बुद्धि को दबा
देती है।
दो प्रकार के लोग होते हैं- एक तो वे जो चाहते हैं कि 'हम कुछ ऐसा पा लें जिसे पाने के बाद कुछ पाना शेष न रहे।' दूसरे वे लोग होते हैं जो चाहते हैं कि 'हम जो चाहें वह हमें मिलता रहे।' अपनी चाह के अनुसार जो पाना चाहते हैं ऐसे व्यक्तियों की इच्छा कभी पूरी नहीं होती क्योंकि एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा खड़ी होती है और इस प्रकार इच्छा पूरी करते-करते जीवन ही पूरा हो जाता है। दूसरे वे लोग होते हैं जिनमें यह जिज्ञासा होती है किः 'ऐसा कुछ पा लें कि जिसे पाने के बाद और कुछ पाना शेष न रहे।' ऐसे लोग विरले ही होते हैं। ऐसे लोग ठीक से इस बात को समझते हैं किः 'ईश्वर के सिवाय, उस आत्मदेव के सिवाय और जो कुछ भी हमने जाना है उसकी कीमत दो कौड़ी की भी नहीं है। मृत्यु के झटके में वह सब पराया हो जायेगा।'
पाश्चात्य
जगत बाहर के
रहस्यों को
खोजता है। एक-एक
विषय की एक-एक
कुंजी खोजता
है जबकि भारत का
अध्यात्म जगत
सब विषयों की
एक ही कुंजी
खोजता है, सब
दुःखों की एक
ही दवाई खोजता
है, परमात्मस्वरूप
खोजता है।
सब
दुःखों की एक
दवाई
अपने
आपको जानो
भाई।।
श्री
कृष्ण का
इशारा सब
दुःखों की एक
दवाई पर ही है
जबकि
पाश्चात्य
जगत का
विश्लेषण
एक-एक विषय की
कुंजी
खोजते-खोजते
भिन्न-भिन्न
विषयों और
कुंजियों में बँट
गया।
भारत का
आत्मज्ञान एक
ऐसी कुंजी है
जिससे सब विषयों
के ताले खुल
जाते हैं।
संसार की ही
नहीं, जन्म
मृत्यु की
समस्याएँ भी
खत्म हो जाती
हैं। लेकिन इस
परमात्मस्वरूप
के वे ही
अधिकारी हैं
जिनकी प्रीति
भगवान में हो।
भोगों में जिनकी
प्रीति होती
है और मिटने
वाले का आश्रय
लेते हैं ऐसे
लोगों के लिए
परमात्मस्वरूप
अपना आपा होते
हुए भी पराया
हो जाता है और
भोगों में
जिनकी रूचि
नहीं है,
मिटनेवाले को
मिटनेवाला
समझते हैं एवं
अमिट की जिज्ञासा
है वे अपने
परमात्मस्वरूप
को पा लेते हैं।
यह
परमात्मस्वरूप
कहीं दूर नहीं
है। भविष्य
में मिलेगा
ऐसा भी नहीं
है.... साधक लोग इस
आत्मस्वरूप
को पाने के
लिए अपनी
योग्यता बढ़ाते
हैं। जो अपने
जीवन का मूल्य
समझते हैं ऐसे
साधक अपनी
योग्यता एवं
बुद्धि का
विकास करके,
प्राणायाम
आदि करके,
साधन-भजन-जपादि
करके परमात्म-स्वरूप
को पाने के
काबिल भी हो
जाते हैं।
ध्यान
में जब बैठें
तब दो-चार
गहरी-गहरी
लम्बी श्वास
लें। फिर
श्वास एकदम न
छोड़ दें।
श्वास छोड़ने
के साथ मिटने
वाले
पदार्थों की
आकांक्षा
छोड़ते जाएं...
श्वास छोड़ने
के साथ अपने 'स्व' के
अलावा जो कुछ
जानकारी है
उसे छोड़ते
जायें.... यह
भावना भरते जायें
कि 'अब मैं
निखालस
परमात्मा में
स्थिति पाने
वाला हो गया
हूँ। मेरे
जीवन का
लक्ष्य केवल
परमात्मा है।
जिसकी कृपा से
सारा जहाँ है
उसी की कृपा
से मेरा यह
शरीर है, मन है
बुद्धि है।
मैं उसका हूँ....
वह मेरा है...'
ऐसा सोचकर जो
भगवान का
ध्यान, भजन,
चिन्तन करता
है उसकी
प्रीति भगवान
में होने लगती
है और उसे
परमात्मस्वरूप
मिलने लगता
है।
दूसरी
बातः
मिटनेवाले
पदार्थों के
लिए हजार-हजार
परिश्रम किये
फिर भी जीवन
में परेशानियाँ
तो आती ही हैं...
ऐसा सोचकर
थोड़ा समय
अमिट परमात्मा
के लिए अवश्य
लगायें।
किसी
सेठ के पास एक
नौकर गया। सेठ
ने पूछाः "रोज के
कितने रुपये
लेते हो?"
नौकरः "बाबू जी ! वैसे तो
आठ रूपये लेता
हूँ। फिर आप
जो दे दें।"
सेठः "ठीक है,
आठ रुपये
दूँगा। अभी तो
बैठो। फिर जो
काम होगा, वह
बताऊँगा।"
सेठ जी
किसी दूसरे
काम में लग
गये। उस नये
नौकर को काम
बताने का मौका
नहीं मिल
पाया। जब शाम
हुई तब नौकर
ने कहाः "सेठ जी! लाइये
मेरी मजदूरी।"
सेठः "मैंने
काम तो कुछ
दिया ही नहीं,
फिर मजदूरी किस
बात की?"
नौकरः "बाबू जी ! आपने
भले ही कोई
काम नहीं
बताया किन्तु
मैं बैठा तो
आपके लिए ही
रहा।"
सेठ ने
उसे पैसे दे
दिये।
जब
साधारण मनुष्य
के लिए
खाली-खाली
बैठे रहने पर
भी वह मजदूरी
दे देता है तो
परमात्मा के
लिए खाली बैठे
भी रहोगे तो
वह भी तुम्हें
दे ही देगा। 'मन नहीं
लगता.... क्या
करें?' नहीं,
मन नहीं लगे
तब भी बैठकर
जप करो, स्मरण
करो। बैठोगे
तो उसके लिए
ही न? फिर वह
स्वयं ही
चिंता करेगा।
तीसरी
बातः हम जो
कुछ भी करें,
जो कुछ भी लें,
जो कुछ भी दें,
जो कुछ भी
खायें, जहाँ
कहीं भी जायें....
करें भले ही
अनेक कार्य
किन्तु
लक्ष्य हमारा
एक हो। जैसे
शादी के बाद
बहू सास की
पैरचंपी करती
है। ससुर को
नाश्ता बनाकर
देती है।
जेठानी-देवरानी
का कहा कर लेती
है। घर में
साफ-सफाई भी
करती है, रसोई
भी बनाती है,
परन्तु करती
है किसके नाते? पति के
नाते। पति के
साथ संबंध
होने के कारण
ही सास-ससुर,
देवरानी-जेठानी
आदि नाते हैं।
ऐसे ही तुम भी
जगत के सारे
कार्य तो करो
किन्तु करो उस
परम पति
परमात्मा के
नाते ही। यह
हो गयी भगवान
में प्रीति।
अन्यथा
क्या होगा?
एक ईसाई साध्वी (Nun) सदैव ईसा की पूजा-अर्चना किया करती थी। एक बार उसे कहीं दूसरी जगह जाना पड़ा तो वह ईसा का फोटो एवं पूजादि का सामान लेकर गयी। उस दूसरी जगह पर जब वह पूजा करने बैठी और उसने मोमबत्ती जलाई तो उसे हुआ कि 'इस मोमबत्ती का प्रकाश इधर-उधर चला जायेगा। मेरे ईसा को तो मिल नहीं पायेगा।' अतः उसने इधर-उधर पर्दे लगा दिए ताकि केवल ईसा को ही प्रकाश मिले। तो यह आसक्ति, यह प्रीति ईसा में नहीं, वरन् ईसा की प्रतिमा में हुई। अगर ईसा में प्रीति होती तो ईसा तो सब में है तो फिर प्रकाश भी तो सर्वत्र स्थिर ईसा के लिए ही हुआ न !
चित्त
में अगर राग
होता है और हम
भक्ति करते हैं
तब भी गड़बड़
हो जाती है।
चित्त द्वेष
रखकर भक्ति
करते हैं तब
भी गड़बड़ हो
जाती है। भक्ति
के नाम पर भी
लड़ाई और 'मेरा-तेरा' शुरु हो
जाता है
क्योंकि
भगवान के वास्तविक
'मैं' को हम
जानते ही
नहीं। जब तक
अपने 'मैं' को नहीं
खोजा तब तक
ईश्वर के 'मैं' का पता
भी नहीं चलता।
इसीलए श्री
कृष्ण कहते हैं-
मय्यासक्तमनाः
पार्थ योगं
युंजन्मदाश्रयः।
असंशयं
समग्रं मां
यथा
ज्ञास्यसि
तच्छृणु।।
'संशयरहित
होकर मुझे जिस
प्रकार तुम
जानोगे, वह
सुनो।' भगवान
का समग्र
स्वरूप जब तक
समझ में नहीं
आता तब तक
पूर्ण शान्ति
नहीं मिलती।
ईश्वर के किसी
एक रूप को
प्रारम्भ में
भले आप मानो.......
वह आपके चित्त
की वृत्ति को
एक केन्द्र
में स्थिर
करने में
सहायक हो सकता
है लेकिन
ईश्वर केवल
उतना ही नहीं
जितना आपकी इन
आँखों से
प्रतिमा के
रूप में दिखता
है। आपका
ईश्वर तो अनंत
ब्रह्माण्डो
में फैला हुआ
है, सब
मनुष्यों को,
प्राणियों को,
यहाँ तक कि सब
देवी-देवताओं
को भी सत्ता
देने वाला,
सर्वव्यापक,
सर्वशक्तिमान
और सर्वदा
व्याप्त है।
जो
ईश्वर सर्वदा
है वह अभी भी
है। जो
सर्वत्र है वह
यहाँ भी है।
जो सबमें है
वह आपमें भी
है। जो पूरा
है वह आपमें
भी पूरे का
पूरा है।
जैसे, आकाश
सर्वदा,
सर्वत्र,
सबमें और पूर्ण
है। घड़े में
आकाश घड़े की
उपाधि के कारण
घटाकाश दिखता
है और मठ का
आकाश मठ की
उपाधि होते
हुए भी वह
महाकाश से
मिला जुला है।
ऐसे ही आपके
हृदय में,
आपके घट में
जो घटाकाशरूप
परमात्मा है
वही परमात्मा
पूरे-का-पूरा अनंत
ब्रह्माण्डों
में है। ऐसा
समझकर यदि उस परमात्मा
को प्यार करो
तो आप
परमात्मा के
तत्त्व को
जल्दी समझ जाओगे।
चौथी
बातः जो बीत
गया उसकी
चिन्ता
छोड़ो। सुख बीता
या दुःख बीता...
मित्र की बात
बीती या शत्रु
की बात बीती...
जो बीत गया वह
अब आपके हाथ
में नहीं है
और जो आयेगा
वह भी आपके
हाथ में नहीं
है। अतः भूत
और भविष्य की
कल्पना
छोड़कर सदा
वर्त्तमान
में रहो। मजे
की बात तो यह
है कि काल सदा
वर्त्तमान ही होता
है।
वर्त्तमान
में ठहर कर
आगे की कल्पना
करो तो
भविष्यकाल और
पीछे की
कल्पना करो तो
भूतकाल होता
है। आपकी
वृत्तियाँ
आगे और पीछे
होती हैं तो
भूत और भविष्य
होता है। 'भूत और
भविष्य' जिन
कल्पनाओं से
बनता है उस
कल्पना का
आधार है मेरा
परमात्मा।
ऐसा समझकर भी
उस परमात्मा से
प्रीति करो तो
आप 'मय्यासक्तमना' हो सकते
हो।
पाँचवी
बातः मन चाहे
दुकान पर जाये
या मकान पर,
पुत्र पर जाये
या पत्नी पर,
मंदिर में
जाये या होटल
पर... मन चाहे
कहीं भी जाये
किन्तु आप यही
सोचो कि 'मन गया
तो मेरे प्रभु
की सत्ता से न ! मेरी
आत्मा की
सत्ता से न !' – ऐसा
करके भी उसे
आत्मा में ले
आओ। मन के भी
साक्षी हो
जाओ। इस
प्रकार
बार-बार मन को
उठाकर आत्मा
में ले आओ तो
परमात्मा में
प्रीति बढ़ने
लगेगी।
अगर आप
सड़क पर चल
रहे हो तो
आपकी नज़र बस,
कार, साइकिल
आदि पर पड़ती
ही है। अब, बस
दिखे तो सोचो कि
'बस को
चलाने वाले
ड्राइवर को सत्ता
कहाँ से मिल
रही हैं?
परमात्मा से।
अगर मेरे
परमात्मा की
चेतना न होती
तो ड्राइवर
ड्राइविंग
नहीं कर सकता।
अतः मेरे
परमात्मा की
चेतना से ही
बस भागी जा
रही है...' इस
प्रकार
दिखेगी तो बस
लेकिन आपका मन
यदि ईश्वर में
आसक्त है तो
आपको उस समय
भी ईश्वर की स्मृति
हो सकती है।
छठवीं
बातः निर्भय
बनो। अगर 'मय्यासक्तमना' होना
चाहते हो तो
निर्भयता
होनी ही
चाहिए। भय शरीर
को 'मैं' मानने
से होता है और
मन में होता
है जो एक दिन नष्ट
हो जाने वाला
है, उस शरीर को
नश्वर जानकर एवं
जिसकी सत्ता
से शरीर
कार्यरत है,
उस शाश्वत
परमात्मा को
ही 'मैं' मानकर
निर्भय हुआ जा
सकता है।
सातवीं
बातः प्रेमी
की अपनी कोई
माँग नहीं होती
है। प्रेमी
केवल अपने
प्रेमास्पद
का मंगल ही
चाहता है। 'प्रेमास्पद
को हम कैसे
अनुकूल हो
सकते हैं?' यही
सोचता है
प्रेमी या
भक्त। तभी वह 'मय्यासक्तमना' हो पाता
है। जो अपनी
किसी भी माँग
के बिना अपने
इष्ट के लिए
सब कुछ करने
को तैयार होता
है, ऐसा
व्यक्ति
भगवान के
रहस्य को
समझने का भी
अधिकारी हो
जाता है। तभी
भगवान कहते
हैं-
मय्यासक्तमनाः
पार्थ योगं
युंजन्मदाश्रयः।
असंशयं
समग्रं मां
यथा
ज्ञास्यसि
तच्छृणु।।
'हे
पार्थ ! मुझमें
अनन्य प्रेम
से आसक्त हुए
मन वाला और
अनन्य भाव से
मेरे परायण
होकर, योग में
लगा हुआ मुझको
संपूर्ण
विभूति, बल,
ऐश्वर्यादि
गुणों से युक्त
सबका आत्मरूप
जिस प्रकार
संशयरहित
जानेगा उसको
सुन।'
श्रीमद्
भगवद् गीता के
सातवें
अध्याय के दूसरे
श्लोक में आता
हैः
ज्ञानं
तेऽहं
सविज्ञानमिदं
वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा
नेह
भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यवशिष्यते।।
"मैं तेरे लिए इस विज्ञानसहित तत्त्वज्ञान को संपूर्णता से कहूँगा कि जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रहता है।"
उद्दालक ऋषि का पुत्र श्वेतकेतु अठारह पुराणों एवं वेद की ऋचाओं आदि का अध्ययन करके घर वापस आया। तब पिता उसे देखते ही समझ गये कि, 'यह कुछ अक्ल बढ़ाकर आया है। होम-हवनादि की विधि सीखकर, शास्त्र-पुराणों का अध्ययन आदि करके तो आया है किन्तु जिससे सब जाना जाता है उस परम तत्त्व को इसने अभी तक नहीं जाना है। यह तो विनम्रता छोड़कर पढ़ाई का अहंकार साथ लेकर आया है।'
पिता ने पूछाः "श्वेतकेतु ! तुमने तमाम विद्याओं को जाना है परन्तु क्या उस एक को जानते हो जिसके जानने से सब जान लिया जाता है जिसके द्वारा अश्रुत श्रुत हो जाता है, अमत मत हो जाता है, अविज्ञात ज्ञात हो जाता है?"
येनाश्रुतं
श्रुतं
मतमविज्ञातं
विज्ञातमिति।।
(छान्दोग्योपनिषद्
6.1.3)
पिता का
प्रश्न सुनकर
श्वेतकेतु
अवाक् हो गया।
यह तो उसके
गुरु ने
पढ़ाया ही
नहीं था। उसने
कहाः
"पिताजी ! मैं अपने गुरु के आश्रम में सबका प्रिय रहा हूँ। इसलिए जितना गुरुजी जानते थे, वह सब उन्होंने मुझे पढ़ा दिया है किन्तु आप जो पूछ रहे हैं वह मैं नहीं जानता।"
जब तक उस
एक परम तत्त्व
को न जाना तब
तक बुद्धि में,
मन में केवल
कल्पनाएँ,
सूचनाएँ ही
भरी जाती हैं
और मन-बुद्धि
इतने परेशान
हो जाते हैं कि
उनमें और कुछ
रखने की जगह
ही नहीं बचती।
मन बुद्धि को
जहाँ से सत्ता
मिलती है उन
सत्ताधीश को न
जानकर
मन-बुद्धि में
कल्पनाएँ भर
लीं तो यह हुआ
ऐहिक ज्ञान और
मन-बुद्धि को
जहाँ से सत्ता
मिलती है उस
चैतन्य को 'मैं' रूप में
जान लिया तो
यह हो गया
पारमार्थिक
ज्ञान।
श्वेतकेतु
केवल ऐहिक
विद्या ही पढ़कर
आया था। जब वह
विनम्र बना,
अपनी सीखी हुई
विद्या का
अहंकार थोड़ा
मिटा तब वह उस
पारमार्थिक
ज्ञान पाने का
अधिकारी बना
जिसको जानने से
व्यक्ति
मुक्त हो जाता
है। फिर पिता
ने उसे
ब्रह्मज्ञान
का उपदेश
दिया।
कल्पनाएँ
और सूचनाएँ
एकत्रित करके
आदमी अहंकारी
हो जाता है।
सच्चा ज्ञान,
पारमार्थिक
ज्ञान यदि अर्जित
करता है तो
आदमी का
अहंकार गायब
हो जाता है।
फिर वह समझने
लगता है कि जो
कुछ जानकारी
है उसकी कोई
कीमत नहीं है।
सारी
जानकारियाँ
केवल रोटी
कमाने और शरीर
को सुख दिलाने
के लिए ही हैं।
आज का ज्ञान,
विज्ञान, आज
के प्रमाणपत्र
सब दौड़-धूप
करने के बाद
भी बहुत-से-बहुत
शरीर को
रोटी-कपड़ा-मकान
एवं अन्य ऐहिक
सुख में गरकाव
करने के लिए
है। जिस शरीर
को जला देना
है उसी शरीर
को सँभालने के
लिए ही आज का पूरा
विज्ञान है।'
बड़े से
बड़े
वैज्ञानिक को
बुला लाओ,
अधिक-से-अधिक
वैज्ञानिकों
को एकत्रित कर
लो और उनसे
पूछोः
"भगवान के भक्त अथवा सदगुरु के सत् शिष्य को ध्यान के समय जो सुख मिलता है, वह क्या आज तक आपको मिला है? सत् शिष्य को जो शांति मिलती है या आनंद मिलता है वह आपके विज्ञान के सब साधनों को मिलाकर भी मिल सकता है?"
एक बार
सुकरात से किसी
धनी आदमी ने
कहाः
"आप कहें
तो मैं आपके
लिए लाखों
रूपये, लाखों
डॉलर खर्च कर
सकता हूँ। आप
जो चाहे खरीद
सकते हैं। बस
एक बार मेरे
साथ बाजार में
चलिए।"
सुकरात उस धनी व्यक्ति के साथ बाजार में घूमने गये। बड़े-बड़े दुकान देखे। फिर दुकान से बाहर निकलकर सुकरात खूब नाचने लगे। सुकरात को नाचते हुए देखकर उस धनी व्यक्ति को चिन्ता हो गयी कि कहीं वे पागल तो नहीं हो गये? उसने सुकरात से पूछाः "आप क्यों नाच रहे हैं?"
तब सुकरात बोलेः "तुम मेहनत करके डॉलर कमाते हो। डॉलर खर्च करके वस्तुएँ लाते हो और वस्तुएँ लाकर भी सुखी ही तो होना चाहते हो फिर भी तुम्हारे पास सुख नहीं है जो मुझे इन सबके बिना ही मिल रहा है। इसी बात से प्रसन्न होकर मैं नाच रहा हूँ।"
भारत ने
सदैव ऐसे सुख
पर ही नजर रखी
है जिसके लिए
किसी बाह्य
परिस्थिति की
गुलामी करने
की आवश्यकता न
हो, जिसके लिए
किसी का भय न
हो और जिसके
लिए किसी का
शोषण करने की
ज़रूरत न हो। बाहर
के सुख में तो
अनेकों का
शोषण होता है।
सुख छिन न
जाये इसका भय
होता है और
बाह्य परिस्थितियों
की गुलामी भी
करनी पड़ती
है।
भगवान कहते हैं- 'मैं तेरे लिए विज्ञानसहित ज्ञान को पूर्णतया कहूँगा..."
यह
विज्ञानसहित
ज्ञान क्या है? आत्मा
के बारे में
सुनना ज्ञान
है। आत्मा एकरस,
अखंड, चैतन्य,
शुद्ध-बुद्ध,
सच्चिदानंदरूप
है। देव,
मनुष्य, यक्ष,
गंधर्व,
किन्नर सबमें
सत्ता उसी की
है' – यह है
ज्ञान और इसका
अपरोक्ष रूप
से अनुभव करना
- यह है
विज्ञान।
ज्ञान
तो ऐसे भी मिल
सकता है लेकिन
विज्ञान या
तत्त्वज्ञान
की निष्ठा तो
बुद्ध
पुरुषों के
आगे विनम्र
होकर ही पायी
जा सकती है।
संसार को
जानना है तो
संशय करना पड़ेगा
और सत्य को
जानना हो
संशयरहित
होकर श्रद्धापूर्वक
सदगुरु के
वचनों को
स्वीकार करना पड़ेगा।'
आप गये
मन्दिर में।
भगवान की मूर्ति
को प्रणाम
किया। तब आप
यह नहीं सोचते
कि "ये भगवान
तो कुछ बोलते
ही नहीं हैं...
जयपुर से साढ़े
आठ हजार रूपये
में आये हैं.... 'नहीं
नहीं, वहाँ
आपको संदेह
नहीं होता है
वरन् मूर्ति
को भगवान
मानकर ही
प्रणाम करते
हो क्योंकि
मूर्ति में
प्राणप्रतिष्ठा
हो चुकी है।
धर्म में
सन्देह नहीं,
स्वीकार करना
पड़ता है और
स्वीकार
करते-करते आप
एक ऐसी अवस्था
पर आते हो कि
आपकी अपनी
जकड़-पकड़
छूटती जाती है
एवं आपकी
स्वीकृति
श्रद्धा का
रूप ले लेती
है। श्रद्धा
का रूप जब
किसी सदगुरु
के पास पहुँचता
है तो फिर
श्रद्धा के बल
से आप तत्त्वज्ञान
पाने के भी
अधिकारी हो
जाते हो। यही
है ज्ञानसहित
विज्ञान।
सत्य या तत्त्वज्ञान तर्क से सिद्ध नहीं होता लेकिन सारे तर्क जिससे सिद्ध होते हैं, सारे तर्क जिससे उत्पन्न होकर पुनः जिसमें लीन हो जाते हैं वही है सत्यस्वरूप परमात्मा। उस परमात्मा का ज्ञान तभी होता है जब श्रद्धा होती है, स्वीकार करने की क्षमता होती है और परमात्मा में प्रीति होती है। जिन्हें परमात्मा का ज्ञान हो जाता है फिर वे निर्द्वन्द्व, निःशंक, निःशोक हो जाते हैं। उनका जीवन बड़ा अदभुत एवं रहस्यमय हो जाता है। ऐसे महापुरुष की तुलना किससे की जाये? अष्टावक्रजी महाराज कहते हैं- तस्य तुलना केन जायते। जिन्होंने अपनी आत्मा में विश्रान्ति पा ली है जिन्होंने परम तत्त्व के रहस्य को जान लिया है, जिन्होंने ज्ञान सहित विज्ञान को समझ लिया है, उनकी तुलना किससे करोगे? एकमेवाद्वितीयम् का साक्षात्कार किये हुए महापुरुष की तुलना किससे की जा सकती है?
मनु
महाराज
इक्ष्वाकु
राजा से कहते
हैं- राजन ! तुम
केवल एक बार
आत्मपद में
जाग जाओ। फिर
तुम जो जागतिक
आचार करोगे
उसमें
तुम्हें दोष
नहीं लगेगा।
हे इक्ष्वाकु ! इस
राज्य वैभव को
पाकर भी
तुम्हारे
चित्त में
शांति नहीं है
क्योंकि अनेक
में छुपे हुए
एक को तुमने
नहीं जाना।
जिसको पाने से
सब पाया जाता
है उसको तुमने
नहीं पाया।
इसलिए राजन ! तुम
उसको पा लो
जिसको पाने से
सब पा लिया
जाता है,
जिसको जानने
से सब जान
लिया जाता है।
उस आत्मदेव को
जान लो। फिर
तुम्हें भीतर
कर्त्तापन
नहीं लगेगा।
तुम राज्य तो
करोगे लेकिन
समझोगे कि
बुद्धि मूर्खों
पर अनुशासन कर
रही है और
सज्जनों को सहयोग
दे रही है।
मैं कुछ नहीं
करता.... हे राजन ! ऐसा
ज्ञानवान जिस
ईंट पर पैर
रखता है वह
ईंट भी प्रणाम
करने योग्य हो
जाती है। ऐसा
ज्ञानवान जिस
वस्तु को छूता
है वह वस्तु प्रसाद
बन जाती है।
ऐसा ज्ञानवान
व्यक्ति जिस
पर नजर डालता
है वह व्यक्ति
भी निष्पाप
होने लगता है।
जो
ज्ञान
विज्ञान से
तृप्त हो जाता
है, जो ज्ञान
विज्ञान का
अनुभव कर लेता
है वह फिर
शास्त्र और
शास्त्र के
अर्थ का
उल्लंघन करके
भी अगर विचरता
है तो भी उसको
पाप-पुण्य सता
नहीं सकते
क्योंकि उसको
अपने निज स्वरूप
का बोध हो
चुका है। अब
वह देह,
इन्द्रियाँ, प्राण,
शरीरादि को
कर्त्ता-भोक्ता
देखता है और अपने
को उनसे असंग
देखता है।'
सच पूछो
तो आत्मा
निःसंग है
लेकिन हम
आत्मा को नहीं
जानते हैं और
देह में हमारी
आसक्ति तथा संसार
में प्रीति
होती है
इसीलिए
बुद्धि हमको
संसार में
फँसा देती है,
अहंकार हमें
उलझा देता है और
इच्छाएँ-वासनाएँ
हमको घसीटती
जाती हैं। जब
आत्मपद का रस
आने लगता है
तब संसार का
रस फीका होने
लगता है। फिर
आप खाते-पीते,
चलते-बोलते
दिखोगे सही लेकिन
वैसे ही, जैसे
नट अपना
स्वाँग
दिखाता है।
भीतर से नट
अपने को ज्यों-का-त्यों
जानता है
किन्तु बाहर
कभी राजा तो कभी
भिखारी और कभी
अमलदार का
स्वाँग करता
दिखता है। ऐसे
ही भगवान में
प्रीति होने
से भगवान के
समग्र स्वरूप
को जो जान
लेता है वह
अपने भीतर
ज्ञान
विज्ञान से
तृप्त हो जाता
है किन्तु
बाहर जैसा
अन्न मिलता है
खा लेता है, जैसा
वस्त्र मिलता
है पहन लेता
है, जहाँ जगह
मिलती है सो
लेता है।
हमारी
आसक्ति संसार
में होती है,
संसार के संबंधों
में होती है।
संबंध हमारी
इच्छा के अनुकूल
होते हैं तो
हम सुखी होते
हैं, प्रतिकूल
होते हैं तो
हम दुःखी होते
हैं। किन्तु सुख
दुःख दोनों
आकर चले जाते
हैं। जो चले
जाने वाली
चीजें हैं,
उनमें न बहना
यह ज्ञान है
और चले जाने
वाली वस्तुओं
में,
परिस्थितियों
बह जाना यह
अज्ञान है।
दुःख
में दुःखी और
सुख में सुखी
होने वाला मन लोहे
जैसा है।
सुख-दुःख में
समान रहने वाला
मन हीरे जैसा
है। दुःख सुख
का जो खिलवाड़
मात्र समझता
है वह है
शहंशाह। जैसे
लोहा, सोना, हीरा
सब होते हैं
राजा के ही
नियंत्रण में,
वैसे ही शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, सुख-दुःखादि
होते हैं
ब्रह्मवेत्ता
के नियंत्रण
में। जो
भगवान के
समग्र स्वरूप
को जान लेता है,
वह
ब्रह्मवेत्ता
हो जाता है और
भगवान के समग्र
स्वरूप को वही
जान सकता है
जिसकी भगवान में
आसक्ति होती
है, जो 'मय्यासक्तमनाः' होता
है।
यहाँ
आसक्ति का
तात्पर्य
पति-पत्नी के
बीच होने वाली
आसक्ति नहीं
है। शब्द तो
आसक्ति है,
लेकिन हमारी
दृष्टि की
आसक्ति नहीं वरन्
श्री कृष्ण की
दृष्टि की
आसक्ति।
एक
दर्जी गया रोम
में पोप को
देखने के लिए।
जब देखकर वापस
आया तब अपने
मित्र से
बोलाः
"मैं रोम
देश में पोप
के दर्शन करके
आया।"
मित्रः "अच्छा.....
पोप कैसे लगे?"
दर्जीः "पतले से
हैं। लम्बी सी
कमीज है। उसकी
चौड़ाई 36 इंच
है। कमीज की
सिलाई में
कटिंग ऐसी ऐसी
है।"
मित्रः "भाई ! पोप के दर्शन किये कि कमीज के?"
ऐसे ही
श्रीकृष्ण के
वचन कमीज जैसे
दिखते हैं।
श्रीकृष्ण के
वचनों में
श्री कृष्ण
छुपे हुए हैं।
दृष्टि बदलती
है तो सृष्टि
बदल जाती है
और भगवान में
प्रीति हो
जाती है तो
दृष्टि बदलना
सुगम हो जाता
है। वासना मैं
प्रीति होती
है तो दृष्टि
नहीं बदलती।
भौतिक
विज्ञान
सृष्टि को
बदलने की
कोशिश करता है
और वेदान्त
दृष्टि को
बदलने की।
सृष्टि कितनी
भी बदल जाये
फिर भी पूर्ण
सुखद नहीं हो
सकती जबकि
दृष्टि जरा-सी
बदल जाये तो
आप परम सुखी
हो सकते हो।
जिसको जानने
से सब जाना
जाता है, वह
परमात्मसुख
वेदान्त से
मिलता है। इस
परमात्म-स्वरूप
को पाकर आप भी
सदा के लिए
मुक्त हो सकते
हो और यह
परमात्मस्वरूप
आपके पास ही
है। फिर भी आप
हजारों-हजारों
दूसरी
कुंजियाँ
खोजते हो सुख-सुविधा
पाने के लिए
लेकिन सदा के
लिए मुक्त कर
देने वाली जो
कुंजी है
आत्मज्ञान उसको
ही नहीं
खोजते।'
एक रोचक
कथा हैः
कोई
सैलानी
समुद्र में
सैर करने गया।
नाव पर सैलानी
ने नाविक से
पूछाः "तू
इंग्लिश
जानता है?"
नाविकः "भैया !
इंग्लिश क्या
होता है?"
सैलानीः
"इंग्लिश
नहीं जानता? तेरी 25
प्रतिशत जिंदगी
बरबाद हो गयी।
अच्छा... यह तो
बता कि अभी
मुख्यमंत्री
कौन है?"
नाविकः "नहीं,
मैं नहीं
जानता।"
सैलानीः
"राजनीति
की बात नहीं
जानता? तेरी 25
प्रतिशत
जिंदगी और भी
बेकार हो गयी।
अच्छा...... लाइट
हाउस में
कौन-सी फिल्म
आयी है, यह बता
दे।"
नाविकः "लाइट
हाउस-वाइट
हाउस वगैरह हम
नहीं जानते।
फिल्में
देखकर चरित्र और
जिंदगी बरबाद
करने वालों
में से हम
नहीं हैं।"
सैलानीः
"अरे ! इतना भी
नहीं जानते? तेरी 25
प्रतिशत
जिंदगी और
बेकार हो गयी।"
इतने
में आया आँधी
तूफान। नाव
डगमगाने लगी।
तब नाविक ने
पूछाः
"साहब ! आप
तैरना जानते हो?"
सैलानीः
"मैं और
तो सब जानता
हूँ, केवल
तैरना नहीं
जानता।"
नाविकः "मेरे
पास तो 25
प्रतिशत
जिंदगी बाकी
है। मैं तैरना
जानता हूँ अतः
किनारे लग
जाऊँगा लेकिन
आपकी तो सौ
प्रतिशत
जिंदगी डूब
जायगी।"
ऐसे ही
जिसने बाकी सब
तो जाना
किन्तु
संसार-सागर को
तरना नहीं जाना
उसका तो पूरा
जीवन ही डूब
गया।
भगवान
कहते हैं-
ज्ञानं
तेऽहं
सविज्ञानमिदं
वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा
नेह
भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यवशिष्यते।।
"मैं
तेरे लिए इस
विज्ञानसहित
तत्त्वज्ञान
को संपूर्णता
से कहूँगा कि
जिसको जानकर
संसार में फिर
और कुछ भी
जानने योग्य
शेष नहीं बचता।"'
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
विश्व में तत्त्व को जानने वाले विरले ही होते हैं।
मनुष्याणां
सहस्रेषु
कश्चिद्यतति
सिद्धये।
यततामपि
सिद्धानां
कश्चिन्मां
वेत्ति तत्त्वतः।।
"हजारों
मनुष्यों में
कोई ही मनुष्य
मेरी प्राप्ति
के लिए यत्न
करता है और उन
यत्न करने वाले
योगियों में
भी कोई ही
पुरुष मेरे
परायण हुआ
मुझको तत्त्व
से जानता है।"
(गीताः
7.3)
चौरासी
लाख योनियों
में मानव योनि
सर्वश्रेष्ठ
है। मानवों
में भी वह
श्रेष्ठ है
जिसे अपने
मानव जीवन की
गरिमा का पता
चलता है। बहुत
जन्मों के
पुण्य-पाप जब
साम्यावस्था
में होते हैं
तब मनुष्य-तन
मिलता है।
देवता ज्ञान
के अधिकारी
नहीं हैं
क्योंकि वे
भोगप्रधान
स्वभाववाले
होते हैं।
दैत्य ज्ञान
के अधिकारी नहीं
हैं क्योंकि
वे
क्रूरताप्रधान
स्वभाव वाले
होते हैं।
मनुष्य ज्ञान
का अधिकारी
होता है
क्योंकि
मनुष्य केवल
भोगों का
भोक्ता ही नहीं,
वरन् सत्कर्म
का कर्त्ता भी
बन सकता है।
किन्तु
मनुष्य देह
धारण करके भी
जो भगवान के
साथ संबंध
नहीं जोड़
सकता वह
मनुष्य के रूप
में पशु ही
है।
इस
प्रकार
लाखों-लाखों
प्राणियों
में, पशुओं में
मनुष्य
प्राणी
श्रेष्ठ है
क्योंकि
मनुष्य देह
तभी मिलती है
जब परमात्मा
की कृपा होती
है। अनंत
जन्मों के
संस्कार मनुष्य
के पास मौजूद
हैं। शुभ
संस्कार भी
मौजूद हैं,
अशुभ संस्कार
भी मौजूद हैं।
चिड़िया
आज से सौ साल
पहले जिस
प्रकार का
घोंसला बनाती
थी उसी प्रकार
का आज भी
बनाती है। बाज
जैसे आकाश में
उड़कर अपना
शिकार खोजता
था, वैसे ही आज
भी खोजता है।
बिल्ली,
कुत्ता, चूहा,
गिलहरी आदि
जिस प्रकार 500
वर्ष पहले
जीते थे वैसे
ही आज भी जीते
हैं क्योंकि
इन सब पर
प्रकृति का
पूरा
नियंत्रण है।
ये सब पशु
पक्षी आदि न
गाली देते हैं
न मुकद्दमा
लड़ते हैं,
फिर भी वैसे
के वैसे हैं
जबकि मनुष्य
झूठ भी बोलता
है, चोरी भी
करता है, गाली
भी देता है,
मुकद्दमा भी
लड़ता है फिर
भी मनुष्य
अन्य सब प्राणियों
से श्रेष्ठ
माना जाता है
क्योंकि वह
निरन्तर
विकास करता
रहता है। मानव
पर ईश्वर की
यह असीम
अनुकंपा है कि
मनुष्य
प्रकृति के
ऊपर भी अपना
प्रभाव डालने
की योग्यता
रखता है। अपनी
योग्यता से
प्रकृति की
प्रतिकूलताओं
को दूर कर
सकता है।
प्रकृति
के, सृष्टि के
नियम में
बारिश आयी तो मनुष्य
ने छाता बना
लिया, ठंड आयी
तो स्वेटर-शॉल
बना लिए,
गर्मी आयी तो
पंखे की खोज
कर ली, आग लगी
तो अग्निशामक
यंत्रों की
व्यवस्था कर
ली..... इस प्रकार मनुष्य
प्रकृति की
प्रतिकूलताओं
को अपने पुरुषार्थ
से रोक लेता
है और अपना
अनुकूल जीवन जी
लेता है।
ऐसे
हजारों
पुरुषार्थी
मनुष्यों में
से भी कोई
विरला ही
सिद्धि के लिए
अर्थात्
अंतःकरण की
शुद्धि के लिए
यत्न करता है
और ऐसे यत्न
करने वाले
हजारों में भी
कोई विरला ही
भगवान का
तत्त्व से
जानने का यत्न
करता है।
सब
मनुष्य भगवान
को जानने का
यत्न क्यों
नहीं कर पाते? मानव का
स्वभाव है जिस
चीज का अभाव
हो उस चीज की
प्राप्ति का
यत्न करना और
जो मौजूद हो
उसकी ओर न
देखना। जो
परमात्मा सदा
मौजूद है उसकी
ओर न देखना।
जो परमात्मा
सदा मौजूद है
उसकी तरफ मन
झुकता नहीं है
और जो संसार
लामौजूद है,
जो कि था नहीं
और बाद में रहेगा
नहीं, उसके
पीछे मन भागता
है। मन की इस
चाल के कारण
ही मानव जल्दी
ईश-प्राप्ति
के लिए यत्न
नहीं करता है।'
दूसरी
बातः माया का
यह बड़ा अटपटा
खेल है कि
संयोगजन्य जो भी
सुख है वे आते
तो भगवान की
सत्ता से हैं
किन्तु
मनुष्य
उन्हें
अज्ञानता से विषयों
में से आते
हुए मान लेता
है और
संयोगजन्य
विषय-सुख में
ही उलझकर रह
जाता है।
आँखें और रूप
के, जिह्वा और
स्वाद के, कान
और शब्द के,
नाक और गंध के,
त्वचा और
स्पर्श के
संयोग में
मनुष्य इतना
उलझ जाता है
कि वास्तविक
ज्ञान पाने की
इच्छा ही नहीं
होती, इसीलिए तत्त्वज्ञान
पाना या
परमात्मा को
पाना कठिन लगता
है।
अगर परमात्म प्राप्ति इतनी सुलभ है तो फिर विश्व में परमात्मा को पाये हुए लोग ज्यादा होने चाहिए। करोड़ों मनुष्य परमात्मा को पाये हुए होने चाहिए और कोई विरला ही परमात्म-प्राप्ति से वंचित रहना चाहिए किन्तु होता है बिल्कुल विपरीत। तभी तो भगवान कहते हैं- 'हजारों यत्न करने वालों में कोई विरला ही मुझे तत्त्व से जानता है।'
हजारों
मनुष्यों में
से कोई विरला
ही सिद्धि के
लिए यत्न करता
है और सिद्धि
मिलने पर वहीं
रुक जाता है,
वहीं संतुष्ट हो
जाता है।
सिद्धि मिलने
पर अर्थात्
अंतःकरण की
शुद्धि होने
पर मनुष्य में
तत्त्वज्ञान
की जिज्ञासा
हो सकती है
किन्तु
मनुष्य
अन्तःकरण की
शुद्धि में ही
रुक जाता है,
अन्तःकरण की
शुद्धि में
होने वाले
छोटे-मोटे
लाभों से ही
संतुष्ट हो
जाता है।
अंतःकरण से
पार होकर तत्त्वज्ञान
की ओर अभिमुख
होने के लिए
उत्सुक नहीं
बनता, तत्त्व
को पाने का
अधिकारी नहीं हो
पाता।
स्वल्पपुण्यवतां
राजन्
विश्वासो नैव
जायते।
अतः
यत्न करके जब
बुद्धि शुद्ध
हो और शुद्ध
बुद्धि में
मैं कौन हूँ
यह प्रश्न उठे
एवं बुद्ध
पुरुषों का
संग हो तभी
मनुष्य
तत्त्व को
पाने का
अधिकारी हो
सकता है।
तत्त्व को
पाये बिना
सारे विश्व का
राज्य मिल
जाये तब भी
व्यर्थ है और
जिसके पास
भोजन के लिए
रोटी का
टुकड़ा न हो,
पहनने को
कपड़ा न हो और
रहने को
झोंपड़ा भी न
हो फिर भी यदि
वह तत्त्व को
जानता है तो
ऐसा पुरुष
विश्वात्मा
होता है। ऐसे
ब्रह्मवेत्ताओं
की तो भगवान
राम लक्ष्मण
भी पैरचंपी
करते हैं।
जिसको
पाये बिना
मनुष्य कंगाल
है, जिसको
पाये बिना
मनुष्य का
जन्म व्यर्थ
है, जिसको
जाने बिना सब
कुछ जाना हुआ
तुच्छ है,
जिससे मिले
बिना सबसे मिलना
व्यर्थ है ऐसा
परमात्मा सदा,
सर्वत्र तथा सबसे
मिला हुआ है
और आज तक उसका
पता नहीं... यह
परम आश्चर्य
है ! मछली
शायद पानी से
बाहर रह जाये
किन्तु मनुष्य
तो परमात्मा
से एक क्षण के
लिए भी दूर
नहीं हो सकता
है। मछली को
तो पानी के
बाहर रहने पर
पानी के
छटपटाहट होती
हैं किन्तु
मनुष्य को
परमात्मा के
लिए छटपटाहट
नहीं होती।
क्यों? मनुष्य
एक क्षण के
लिए भी
परमात्मा से
अलग नहीं होता
इसीलिए शायद
उसे परमात्मा
के लिए छटपटाहट
नहीं होती
होगी! अगर एक
बार भी उसे
परमात्म-प्राप्ति
की तीव्र
छटपटाहट हो
जाये तो फिर
वह उसे जाने
बिना रह भी
नहीं सकता।'
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
भूमिरापोऽनलो
वायुः खं मनो
बुद्धिरेव च।
अहंकार
इतीयं मे
भिन्ना
प्रकृतिरष्टधा।।
अपरेयमितस्त्वन्यां
प्रकृतिं विद्धि
मे पराम्।
जीवभूतां
महाबाहो
ययेदं
धार्यते
जगत्।।
"पृथ्वी,
जल, तेज, वायु
तथा आकाश और
मन, बुद्धि एवं
अहंकार.... ऐसे
यह आठ प्रकार
से विभक्त हुई
मेरी प्रकृति
है। यह आठ
प्रकार के
भेदों वाली तो
अपरा है
अर्थात् मेरी
जड़ प्रकृति
है और हे महाबाहो
! इससे
दूसरी को मेरी
जीवरूपा परा
अर्थात् चेतन
प्रकृति जान
कि जिससे यह
संपूर्ण जगत
धारण किया
जाता है।"
(गीताः 7.4,5)
भगवान
श्रीकृष्ण
यहाँ अपनी दो
प्रकार की प्रकृति
का वर्णन करते
हैं- परा और
अपरा। वे प्रकृति
को लेकर
सृष्टि की
रचना करते
हैं। जिस प्रकृति
को लेकर रचना
करते हैं वह
है उनकी अपरा
प्रकृति एवं
जो उनका ही
अंशरूप जीव है
उसे भगवान परा
प्रकृति कहते
हैं। अपरा
प्रकृति
निकृष्ट, जड़
और परिवर्तनशील
है तथा परा
प्रकृति
श्रेष्ठ, चेतन
और अपरिवर्तनशील
है। भगवान की
परा प्रकृति
द्वारा ही यह
संपूर्ण जगत
धारण किया
जाता है।
प्रवृत्ति
और रचना – यह
अपरा प्रकृति
है, अष्टधा
प्रकृति है,
जिसमें कि
पंचमहाभूत
एवं मन,
बुद्धि तथा
अहंकार इन आठ
चीजों को
समावेश होता
है। भगवान का
ही अंश जीव
परा प्रकृति
है। अपरा
प्रकृति जीव
को परमात्मा
से एक रूप
करने वाली है।
जैसे,
सुबह नींद में
से उठकर सबसे
पहले मैं हूँ
ऐसी स्मृति
उत्पन्न होती
है, यह परा
प्रकृति है
फिर वृत्ति
उत्पन्न होती
है कि मैं
अमुक जगह पर
हूँ.... मैं सोया
था... मैं अभी
जागा हूँ....
मुझे यहाँ
जाना है... मुझे
यह करना है....
मुझे यह पाना
है.... आदि आदि
वृत्तिरूप
अहंकार अपरा प्रकृति
है।
जो जीवभूता
प्रकृति है,
जो
अपरिवर्तनशील
एवं चेतन है
वही भगवान की
परा प्रकृति
है। जीव की
बाल्यावस्था
बदल जाती है,
किशोरावस्था
भी बदल जाती है,
जवानी भी बदल
जाती है,
बुढ़ापा भी
बदल जाता है
एवं मौत के
बाद नया शरीर
प्राप्त हो
जाता.... कई बार
ऐसे शरीर
बदलते रहते
हैं। मन,
बुद्धि
अहंकार भी
बदलता रहता है
किन्तु इन
सबको देखने
वाला कोई है
जो हर अवस्था
में, हर प्रकृति
में अबदल रहता
है। जो अबदल
रहता है वही
सबका
जीवात्मा
होकर बैठा है।
उसका असली
स्वरूप
परमात्मा से
अभिन्न है
लेकिन
अज्ञानवश वह इस
अष्टधा
प्रकृति से
बने शरीर को
मैं एवं उसके
संबंधों को
मेरा मानता है
इसीलिए जन्म-मरण
के चक्र में
फँसा रहता है।
जैसे
विचार दो
प्रकार के
होते हैं-
अच्छे एवं
बुरे। उसी
प्रकार
प्रकृति के भी
दो प्रकार
हैं- अपरा एवं
परा। आप जब
भोग चाहते हो,
संसार के ऐश –
आराम एवं मजे
चाहते हो तो
अपरा प्रकृति
में उलझ जाते
हो। जब आप
संसार के
ऐश-आराम एवं
मौज मस्ती को
नश्वर समझकर
सच्चा सुख
चाहते हो तो परा
प्रकृति आपकी
मदद करती है।
जब परा
प्रकृति मदद
करती है तो
परमेश्वर का
सुख मिलता है,
परमेश्वर का
ज्ञान मिलता
है तथा
परमेश्वर का
अनुभव हो जाता
है। फिर वह
जीवात्मा
समझता है कि,
मैं परमेश्वर
से जुदा नहीं
था, परमेश्वर
मुझसे जुदा
नहीं था। आज
तक जिसको
खोजता-फिरता
था, वही तो
मेरा आत्मा
था।
बंदगी
का था कसूर
बंदा मुझे बना
दिया।
मैं
खुद से था
बेखबर तभी तो
सिर झुका
दिया।।
वे थे
न मुझसे दूर न
मैं उनसे दूर
था।
आता न
था नजर तो नजर का
कसूर था।।
पहले हमारी नजर ऐसी थी की अपरा प्रकृति की चीजों में हम उलझ रहे थे... लगता था कि, 'यह मिले तो सुखी हो जाऊँ, यह भोगूँ तो सुखी हो जाऊँ...' ऐसा करते-करते सुख के पीछे ही मर रहे थे। किन्तु जब पता चला अपने स्वरूप का तो लगा कि 'अरे ! मैं स्वयं ही सुख का सागर हूँ.... सुख के लिए कहाँ-कहाँ भटक रहा था?'
अपरा
प्रकृति में
रहकर कोई पूरा
सुखी हो जाये या
उसकी सभी
समस्याओं का
सदा के लिए
समाधान हो
जाये यह संभव
ही नहीं है।
सभी समस्याएँ
तो तभी हल हो
सकती हैं कि
जब उनसे अपने
पृथकत्व को जान
लिया जाये।
दर्शनशास्त्र
की एक बड़ी
सूक्ष्म बात
है कि जो 'इदं' है वह 'अहं' नहीं
हो सकता।
जैसे यह
किताब है तो
इसका
तात्पर्य यह
है कि मैं
किताब नहीं
हूँ। इसी
प्रकार यह
रूमाल है... तो
मैं रूमाल
नहीं। यह हाथ......
तो मैं हाथ
नहीं। यह सिर...
तो मैं सिर
नहीं। मेरा
पेट दुःखता
है.... तो मैं पेट
नहीं। मेरा
हृदय दुःखी
है... तो मैं हृदय
नहीं। मेरा मन
चंचल है.... तो
मैं मन नहीं।
मेरी बुद्धि
ने बढ़िया
निर्णय दिया....
तो मैं बुद्धि
नहीं। इससे
यही सिद्ध
होता है कि आप
इन सबसे पृथक
हो।
यदि इस
पृथकत्व को
नहीं जाना और
अष्टधा प्रकृति
के शरीर को
मैं और मेरा
मानते रहे तो
चाहे कितनी भी
उपलब्धियाँ
हो जायें फिर
भी मन में और
पाने की, और
जानने की
इच्छा बनी
रहेगी एवं
मिली हुई
चीजें छूट न जायें
इस बात का भय
बना रहेगा।
पृथकत्व को
यदि ठीक से
जान लिया तो
फिर आपका
अनुभव एवं
श्रीकृष्ण का
अनुभव एक हो
जायगा।
एक होती
अविद्या तथा
दूसरी होती है
विद्या।
अविद्या
अविद्यमान
वस्तुओं में
सत्यबुद्धि
करवा कर जीव
को भटकाती है।
अपरा प्रकृति
के खिलौनों में
जीव उलझ जाता
है। जैसे बालक
मिट्टी के आम, सेवफल
आदि से रस
लेने की कोशिश
करता है एवं
छीन लिए जाने
पर रोता भी है
किन्तु यदि माँ
नकली खिलौने
की जगह असली
आम बालक के
होठों पर रख
देती है तो वह
अपने आप नकली
आम को छोड़
देता है। नकली
खिलौना रस
नहीं देता
किन्तु तब तक
अच्छा लगता है
जब तक नकली को
नकली नहीं
जाना। नकली को
नकली तभी जान
सकते हैं जब
असली का स्वाद
मिलता है।
जब असली
का स्वाद आता
है, परा
प्रकृति को
जरा सा प्रसाद
मिलता है, अपने
सहज
स्वाभाविक
आत्मस्वरूप
की स्मृति आ
जाती है तो
बाहर की तू.. तू..
मैं.. मैं... यह
भोगना है... यह पाना
है.. ये सब फीके
हो जाते हैं।
असली को अगर ठीक
से जान लिया
तो नकली को
आकर्षण से
पिण्ड छूट
जाता है। असली
सुख (ईश्वरीय
सुख) को पा लें
तो नकली
(विकारी सुख)
का प्रभाव
समाप्त हो
जाता है। फिर
जीवात्मा विकारी
सुख में रहता
हुआ भले दिखे
किन्तु वह
होता अपने आप
में ही है।
उठत
बैठत वही
उटाने।
कहत
कबीर हम उसी
ठिकाने।
वास्तव
में देखा जाये
तो जीवमात्र
का शुद्ध स्वरूप
परमात्मा ही
है लेकिन
निकृष्ट
(अपरा)
प्रकृति के
साथ तादात्म्य
करके जीव अपना
स्वरूप भूल
जाता है।
भूल्या
जभी आपनूँ तभी
हुआ खराब।
जो जीव
अपरा प्रकृति
में उलझे हुए
हैं वे नहीं
जानते लेकिन
परा का आश्रय
लेकर जो
परब्रह्म में
जगे हैं ऐसे
महापुरुष
जानते हैं कि
सारी प्रकृति
उसी परमात्मा
का विस्तार
है। ऐसे
भगवत्प्राप्त
महापुरुषों
का संग एवं
साधन-भजन
ईश्वरप्राप्ति
में बड़ी मदद
करते हैं।
जीव अगर
साधन भजन छोड़
दे तो शरीर तो
बना है पंचमहाभूत
एवं मन,
बुद्धि तथा
अहंकार इस
निकृष्ट
प्रकृति से।
अतः वह जीव को
निकृष्ट की
तरफ, विषय-विकारों
की तरफ ही
घसीटकर ले
जायेगा।
लेकिन ज्ञान
के द्वारा,
पुण्य के
द्वारा, समझ
के द्वारा निकृष्ट
शरीर में होते
हुए भी
श्रेष्ठ
आत्मा का
अनुभव किया जा
सकता है।
असत्-जड़-दुःखरूप
शरीर में होते
हुए भी
सत्-चित्-आनन्दस्वरूप
ईश्वर का
अनुभव किया जा
सकता है।
मरणधर्मा मानव
शरीर में अमर
आत्मा का
दीदार किया जा
सकता है।
ये परा
और अपरा दोनों
प्रकृति में
सत्ता भगवान
की, चेतना
भगवान की,
आनंद भगवान
का, माधुर्य भगवान
का है। यही
कारण है कि
आपको आनंद एवं
माधुर्य का
अनुभव होता
है। आप भगवान
के साथ उठते हो,
भगवान के साथ
बैठते हो, भगवान
के साथ सोते
हो, भगवान के
साथ खाते-पीते
हो लेकिन यह
भगवान है ऐसा
पता नहीं है।
यही निकृष्ट
प्रकृति का,
अपरा प्रकृति
का स्वभाव है।
जीवभूतां
महाबाहो..... जो
चैतन्य तो जीव
बना देती है,
वह मेरी परा
प्रकृति है।
वही परा
प्रकृति
सम्पूर्ण जगत
को धारण करती
है। अन्यथा वह
जीवात्मा
वास्तव में तो
परमात्मा का
अभिन्न अंग
है। जीवात्मा
सो परमात्मा। भगवान
श्री कृष्ण ने
भी कहा हैः
ममैवांशो
जीवलोके
जीवभूतः
सनातनः
जीवभाव
पैदा कराने
वाली जो
प्रकृति है,
उसे जीवभूता
कहते हैं और
देह को 'मैं' मानकर
भोग में रूचि
पैदा करती है
वह अपरा
प्रकृति है।
भगवान को
जानकर भगवान
में मिल जाऊँ,
यह परा
प्रकृति का
स्वभाव है
जबकि धन कमा
लूँ... ऐसा बन
जाऊँ... वैसा बन
जाऊँ... यह अपरा
प्रकृति का
स्वभाव है।
जीवन
में कभी अपरा
प्रकृति का
जोर लगता है
तो कभी परा
प्रकृति का।
हम जब सत्संग
में होते हैं
तो लगता है कि
यह परमात्मा वाला
रास्ता ठीक
है, लेकिन जब
संसार में
जाते हैं तो
लगता है कि यह
भी तो करना
चाहिए। यह अपरा
प्रकृति का
प्रभाव है।
इस अपरा
प्रकृति से
बचने के लिए
कोई नियम ले लेना
चाहिए कि इतना
जप तो करना ही
है। अपरा प्रकृति
को मिटाने के
लिए कर्मयोग
करो। दूसरों
को सुख देने
के लिए करो।
भोगों की इच्छा
कर्मयोग करने
से मिटती है
और परमात्मा को
जानने की
इच्छा,
जिज्ञासा
ज्ञानयोग से
पूरी होती है।
इस प्रकार
ज्ञानयोग एवं
कर्मयोग का आश्रय
लेकर अपरा
प्रकृति के
प्रभाव से
अपने को छुड़ा
लो एवं परा
प्रकृति को
सहयोग दो।
एक
कल्पति
दृष्टांत
देता हूँ-
दो भाई
नर्मदा
किनारे नहाने
के लिए गये।
बड़ा भाई
नहाकर निकल
गया। छोटा भाई
नहाने के लिए 2-4
कदम आगे चला
गया। इतने में
मगर ने उसका
पैर पकड़
लिया। पानी
में मगर का
जोर ज्यादा
होता है। वह
छोटे भाई को
घसीटने लगा।।
यह देखकर बड़ा
भाई पानी में
गया एवं छोटे
भाई का हाथ
पकड़कर उसे किनारे
की ओर खींचने
लगा। अब छोटा
भाई किधर जायेगा? मगर की
ओर जायेगा कि
बड़े भाई की
ओर? जिधर वह
स्वयं जोर
लगायेगा उधर
की तरफ उसे सहयोग
मिलेगा। ऐसे
ही बड़ा भाई
है परा
प्रकृति एवं
मगर है अपरा
प्रकृति। जीव
है बीच में।
वह कभी सत्संग
की तरफ, योग की
तरफ खिंचता है
और कभी भोग
उसे अपनी ओर
खींचते हैं।
अब जीव स्वयं
जिस ओर
पुरुषार्थ
करता है, वहीं
से उसे सहयोग मिलता
है।
भगवान
कहते हैं- भिन्ना
प्रकृतिरष्टधा।
जैसे दूध और
दूध की सफेदी,
तेल और तेल की
चिकनाहट
अभिन्न है,
वैसा ही परमात्मा
और परमात्मा
की प्रकृति
अभिन्न है।
जैसे आकाश में
बादल एवं
बादलों में
आकाश है किन्तु
बादलों के
मिटने से आकाश
नहीं मिटता,
वह तो अपनी
महिमा में
स्थित रहता
है। ऐसे ही
भगवान की
प्रकृति
बदलती रहती
है, फिर भी
भगवान का कुछ
बनता-बिगड़ता
नहीं है।
प्रकृति
भगवान की
सत्ता के बिना
कार्य नहीं कर
सकती और प्रकृति
के बिना भगवान
की सत्ता का
खेल दिख नहीं
सकता। जैसे
पावर हाउस से
आने वाले
तारों में विद्यतु
होती है लेकिन
विद्युत
दिखती नहीं
है। वह तो
बल्ब आदि
साधनों
द्वारा ही
दिखती है किन्तु
बल्ब आदि के
टूट जाने से
पावर हाउस का
कुछ बनता
बिगड़ता नहीं
है। ऐसे ही
भगवान की
सत्ता सबमें
ओत-प्रोत है,
लेकिन दिखती
और कार्य करती
है प्रकृति
द्वारा। फिर
भी प्रकृति के
बनने बिगड़ने
से भगवान का
कुछ
बनता-बिगड़ता नहीं
है।
प्रकृति
अर्थात्
स्वभाव। जैसे
पुरुष एवं पुरुष
की शक्ति
अभिन्न है,
वैसे ही
परमात्मा और
परमात्मा की
माया अभिन्न
है। यह अष्टधा
प्रकृति
परमात्म-चेतना
से अभिन्न है।
किन्तु जैसे
प्रकाश में
परिवर्तन
होने से सूर्य
में परिवर्तन
नहीं होता,
वैसे ही अष्टधा
प्रकृति में
परिवर्तन
होने से
परमात्मा में,
आत्मा में कोई
परिवर्तन
नहीं होता।
लेकिन
होता क्या है
कि इस अष्टधा
प्रकृति से
बने शरीर में,
मन में
आनेवाले
सुख-दुःख,
चिन्ता-भय, मान-अपमान
आदि के साथ
मानव जुड़
जाता है एवं
सुखी-दुःखी
होता रहता है।
सुख-दुःख को,
चिन्ता-भय को,
मान-अपमान को
अष्टधा
प्रकृति में
होनेवाला
मानकर एवं
उससे अपने को
पृथक जानकर
मुक्त हो
जाना, यही
मानव की सबसे
बड़ी उपलब्धि
है। यह ऐसी
उपलब्धि जहाँ
जगत के सारे
सुख-दुःख
तुच्छ हो जाते
हैं। इस
उपलब्धि को
पाना आसान भी
है किन्तु
पाने की
जिज्ञासा है
तो बताने वाले
नहीं हैं तो
उपलब्धि के
महत्व का पता
नहीं चलता।
जैसे
तरंग पानी से
भिन्न नहीं,
पानी तरंग से
भिन्न नहीं,
ऐसे ही सचमुच
में जीवात्मा
परमात्मा से
भिन्न नहीं
है। जो जीवात्मा
यह नहीं
जानता, वह
संसार में उलझ
जाता है एवं
जो जान लेता
है, वह
परमात्मा में
टिक जाता है।
वाणी से उसका
वर्णन करना
संभव नहीं। वह
तो अनुभव की
चीज है। जो एक
बार भी परमात्मा
से अपनी
अभिन्नता जान
लेता है, वह
मुक्तात्मा
हो जाता है
किन्तु उसके
लिए तड़प होनी
चाहिए। जितनी
तड़प तीव्र,
उतना काम
जल्दी। अन्यथा,
उसके सिवा जो
भी काम बना, सब
निकम्मा है।
नरसिंह
मेहता के ये
वचन फिर से
याद करने जैसे
हैं-
ज्यां
लगी आत्मा
तत्त्व
चीन्यो नहीं
त्यां लगी
साधना सर्व
झूठी।
अतः
अपने
परमात्म-स्वभाव
को जानने की
तड़प जगाओ।
कुछ समय
पवित्र एकांत
वातावरण में
रहा करो। वर्ष
में कुछ महीन
प्रभु-प्राप्ति
के लिए, सतत
अभ्यास के लिए
निकालना
बुद्धिमानी
है और पूरी
जिन्दगी
संसार में खपा
देना योग्य
नहीं है। प्रभु
करे कि प्रभु
का अनुभव अपना
अनुभव हो जाये।
ऐसे दिन
कब आयेंगे कि
परमात्म-प्राप्ति
के लिए हमारे
हृदय में तड़प
जाग जाय....!
ॐ......ॐ.....
शांति...
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
परमात्मा हमारे साथ होते हुए भी दुःखी क्यों?
श्रीमद
भगवद गीता के
सातवें
अध्याय के छठे
एवं सातवें श्लोग
में आता हैः
एतद्योनीनि
भूतानि
सर्वाणीत्युपधारय।
अहं
कृत्स्नस्य
जगतः प्रभवः
प्रलयस्तथा।।
मत्तः
परतरं
नान्यत्किंचिदस्ति
धनंजय।
मयि
सर्वमिदं
प्रोतं
सूत्रे
मणिगणा इव।।
'हे
अर्जुन तू ऐसा
समझ कि
संपूर्ण भूत
इन दोनों
प्रकृतियों
(परा-अपरा) से
उत्पन्न होने
वाले हैं और
मैं संपूर्ण
जगत की
उत्पत्ति तथा
प्रलयरूप हूँ
अर्थात्
संपूर्ण जगत
का मूल कारण हूँ।
हे
धनंजय ! मुझसे
भिन्न दूसरा
कोई भी परम
कारण नहीं है।
यह सम्पूर्ण
जगत सूत्र में
मणियों के
सदृश मुझमें
गुँथा हुआ है।'
(गीताः
7.6,7)
भगवान
की दो
प्रकृतियाँ
है परा और
अपरा।
परा
प्रकृति
जीवरूपा है
तथा अपरा
प्रकृति पंचमहाभूतरूपा
है।
हमारे
शरीर में भी
दो
प्रकृतियाँ
हैं- एक स्थूल,
दूसरी
सूक्ष्म।
हमारे स्थूल
शरीर को चलाने
वाली है
सूक्ष्म
प्रकृति। इन
स्थूल एवं
सूक्ष्म
दोनों को सत्ता
देने वाला जो
चैतन्य है,
वही वास्तव
में हमारा
स्वरूप है।
किन्तु इस
तत्त्व को न
जानने के कारण
एवं देह को
मैं मानने के
कारण ही हम मानने
लगते हैं कि 'भगवान
कुछ और हैं,
कहीं और हैं
एवं हम कहीं
और हैं।' जब अपरा
प्रकृति के
साथ हम
तादात्म्य कर
लेते हैं तो
अपने को खो
देते हैं। एवं
अपरा प्रकृति
के रोग, अपरा
प्रकृति के
बनने-बिगड़ने
आदि
परिवर्तनों को
अपने में
आरोपित कर
देते हैं।
परा और
अपरा – चैतन्य
की इन दो
प्रकार की
शक्तियों से
ही सारे जगत
की उत्पत्ति
और प्रलय होता
है। ये दोनों
प्रकृतियाँ
परमात्मा की
ही हैं। तभी
तो श्री कृष्ण
कहते हैं- "मैं
संपूर्ण जगत
की उत्पत्ति
तथा प्रलयरूप
हूँ।" इसी
प्रकार अगर
साधक अभ्यास
करे कि 'स्थूल,
सूक्ष्म और
कारण इन तीनों
देहों को सत्ता
देने वाला मैं
साक्षी
दृष्टा हूँ' तो वह
भी वहीं पहुँच
सकता है जहाँ
श्री कृष्ण हैं।
श्रीकृष्ण इस रूप में उपदेश नहीं देते कि 'मैं भगवान हूँ और तुम कोई ओर हो।' नहीं नहीं, ऐसी भ्रांति में न पड़ जाओ इसीलिए दूसरे श्लोक में कहते हैं कि 'हे धनंजय ! मेरे सिवाय दूसरा कुछ नहीं है। जैसे, सूत्र में मणियाँ पिरोई होती हैं ऐसे ही सारे जगत में ओत-प्रोत हूँ।'
जिन
शक्तियों से
यह सम्पूर्ण
जगत
दृष्टिगोचर
हो रहा है वे शक्तियाँ
भी उसी चैतन्य
तत्त्व
परमात्मा की
हैं और वे
परमात्मा से
अभिन्न हैं।
शक्ति कभी
शक्तिमान से
भिन्न नहीं हो
सकती। जैसे
पुरुष की
कार्यशक्ति
पुरुष से अलग
नहीं हो सकती
ऐसे ही जहाँ
चैतन्य है
वहाँ उसकी
शक्तियाँ हैं
और जहाँ
शक्तियाँ है
वहाँ चैतन्य
की चेतना भी
होती है।
शक्ति जिससे
प्रगट होती
है, जिसके आधार
से टिकती है
और जिसमें लीन
होती है वहाँ तक
जो पहुँच पाता
है वह अपने
चैतन्य
तत्त्व तक,
श्रीकृष्ण-तत्त्व
तक पहुँचने
में भी सफल हो जाता
है।
आपकी
सत्ता के आधार
पर शरीर होता
है, शरीर की
सत्ता के आधार
पर आप नहीं
होते। आपसे
अनेकों शरीर
उत्पन्न
हो-होकर मिट
गये लेकिन
शरीरों से आप
कभी नहीं हुए।
फिर भी शरीर
के साथ अपनापन
मान लेते हो,
शरीर के साथ
तादात्म्य
करते हो तो
अपने-आपको भूल
जाते हो। फिर
शरीर की
उत्पत्ति को
अपनी
उत्पत्ति मान
लेते हो। शरीर
के
काले-गोरेपन
को अपना काला-गोरापन
मान लेते हो।
शरीर के
मोटेपन को
अपना मोटापन
मान लेते हो।
शरीर के सुख
दुःख को अपना
सुख-दुःख मान
लेते हो और
शरीर की
मृत्यु को अपनी
मृत्यु मान
लेते हो।
क्यों?
क्योंकि अपने
को, अपने
वास्तविक
स्वरूप को जानते
नहीं हो और
अपनी ही
स्फुरणा से जो
उत्पन्न हुआ है
उसके साथ जुड़
जाते हो।
यह शरीर
पंचभौतिक है।
यह परा-अपरा
प्रकृति से चलता
है और
परा-अपरा
प्रकृति में
परिवर्तन होता
रहता है।
किन्तु इन
सारे
परिवर्तनों
को जो देखने
वाला है वह
अपरिवर्तनशील
है, वही आत्मा है
और जो आत्मा
है वही
परब्रह्म
परमात्मा है।
श्रीकृष्ण
कहते हैं- मत्तः
परतरं
नान्यत्। 'मेरे
अलावा मेरे से
अलग और कुछ भी
नहीं है।' श्रीकृष्ण
यह बात भी
तत्त्व को
लक्ष्य में रखकर
कह रहे हैं।
जैसे गुलाब,
गेंदा,
नारंगी, सेवफल
आदि सभी
वस्तुएँ
अलग-अलग दिखती
हैं। उनके नाम
अलग, उनके गुण
अलग, उनके रंग
अलग, उनके
आकार अलग, उनके
स्वाद भी अलग....
किन्तु
तत्त्व से
देखा जाये तो
सब एक ही हैं
क्योंकि सबका
निर्माण हुआ है
पृथ्वी, जल,
तेज, वायु और
आकाश इन
पाँचमहाभूतों
से ही। इस
प्रकार
तत्त्वरूप से
तो सब पाँच भूत
ही हैं।
पंचमहाभूतों
का सार है महात्तत्त्व।
महात्तत्त्व
का सार है
प्रकृति और
प्रकृति का सार
है परब्रह्म
परमात्मा।
अतः देखा जाये
तो कोई भी
वस्तु
श्रीकृष्ण
तत्त्व से
भिन्न नहीं है।
जब
फूल-पत्ते,
फलादि भी
श्रीकृष्णतत्त्व
से भिन्न नहीं
हैं तो आप
श्रीकृष्णतत्त्व
से अलग कैसे
हो सकते हो? किन्तु
आप अपने को
श्रीकृष्णतत्त्व
से अलग मान
बैठे हो
क्योंकि आप
प्रकृति की
बहने वाली वस्तुओं
को सदैव एक
जैसा देखने की
आदत रखते हो।
तभी लगता है
कि अरे !
श्रीकृष्ण तो
भगवान हैं,
आनन्दस्वरूप
हैं लेकिन मैं
दुःखी हूँ....
मेरा यह हो
गया... वह हो गया...
वास्तव में
आपका कुछ नहीं
हुआ। जो कुछ
भी हुआ वह
परिवर्तनशील
प्रकृति का
हुआ। परा-अपरा
प्रकृति में
ही सब
परिवर्तन
होते रहते
हैं। उन
परिवर्तनों
को सत्ता देने
वाला
अपरिवर्तनीय
चैतन्य है। जो
श्रीकृष्ण की
आत्मा है वही
आपकी आत्मा है।
शरीर
चाहे श्रीराम
का हो या
श्रीकृष्ण का,
बुद्ध का हो
या कबीर का,
चाहे आपका हो...
शरीर तो
परिवर्तनशील
ही दिखेगा
लेकिन इस शरीर
की परिवर्तनशील
अवस्था को
देखने वाला जो
अपरिवर्तनशील
आत्मा है वह
आत्मा मैं हूँ
– ऐसा जो
चिन्तन करता
है वह देर
सबेर
आत्मज्ञान को
प्राप्त करके
मुक्त हो जाता
है। किन्तु बदलने
वाली देह के
लिए
साधन-सामग्रियों
को जुटाकर,
देह की
सुविधाओं को
बढ़ाकर, देह
के द्वारा रस
लेकर जो रसीला
होना चाहता है
उसके जीवन में
गहरा रस नहीं
मिलेगा और
रसस्वरूप
परमात्मा को
पाने में भी
सफल नहीं हो
सकेगा।
ईश्वर-प्राप्ति में सबसे बड़ी रुकावट यही है कि हम कुछ बदलकर, कुछ बनाकर, कुछ पाकर और कुछ छोड़कर सुखी होना चाहते हैं। अगर कुछ पाकर सुखी होते हो तो जो पहले नहीं मिला था, वह अभी मिला है और जो मिला है वह सदा आपका रहेगा नहीं। कुछ छोड़कर यदि सुखी होते हो तो आप जो छोड़ोगे वह आप नहीं होगे। जो आपसे अलग होगा उसी को आप छोड़ोगे। इस प्रकार आपसे जो दूर होगा उसी को आप पाओगे। तो क्या चैतन्य परमात्मा आपसे अलग है जो आप उसे पाने का प्रयास करोगे?
हम कुछ
बदलाहट करके
पाना चाहते
हैं जबकि बदलाहट
करके अपने
आपको कभी नहीं
पाया जाता और
खोया नहीं
जाता। अगर
अपने आपको
छोड़कर कुछ भी
पाओगे या
खोओगे तो वह
पाने और खोने
की सिर्फ कल्पना
ही होगी। सब
इधर पाँच
भूतों के
अन्दर ही होगा।
कुछ पाओगे तो
पाँच भूतों का
ही पाओगे और कुछ
खोओगे तो वह
भी पाँच भूतों
का ही खोओगे।
एक तृण
का भी नाश
नहीं होता और
एक तृण भी नया
नहीं बन सकता।
बनता बिगड़ता
दिखता जरूर है
किन्तु
वास्तव में न
कुछ बनता है, न
बिगड़ता है
वरन्
परिवर्तित
होता है।
जैसे, कुम्हार
मिट्टी से
घड़े बनाता
है, मिट्टी को
नहीं बनाता।
इसी प्रकार
पृथ्वी, जल,
तेज, वायु,
आकाश ये किसी
के बनाये हुए
नहीं हैं वरन्
उस चैतन्य की
ही दो
शक्तियाँ हैं
परा और अपरा।
परा और अपरा
शक्तियों से
ही सब बनता और
रूपान्तरित
होता दिखता
है, कुछ भी
नष्ट नहीं
होता। किन्तु
इस रूपान्तरण
के बीच भी जो
अरूपांतरित
रहने वाला
तत्त्व है,
उसे अगर जान
लिया जाये तो
व्यक्ति
समस्त
व्यवहार करते
हुए भी उनसे
अलिप्तत नहीं
रह सकता है।
भगवान
कहते हैं- 'हे
अर्जुन ! तू ऐसा
समझ कि
संपूर्ण भूत
इन दोनों
प्रकृतियों
से ही उत्पन्न
होनेवाले हैं
तथा मैं संपूर्ण
जगत का प्रभाव
(उत्पत्ति)
तथा प्रलयरूप
हूँ अर्थात्
संपूर्ण जगत
का मूल कारण
हूँ।' जैसे,
लहरों की
उत्पत्ति एवं
विनाश का कारण
सागर है। सागर
से ही तरंगे
उठती हैं एवं
सागर में ही
पुनः लीन हो
जाती हैं। ऐसे
ही आपका यह
पाँचभौतिक
शरीर
पंचमहाभूतरूपी
सागर में
उत्पन्न होता
है और फिर उसी
में लीन हो
जाता है। नानक
जी ने कहा हैः
जो
जाहू ते उपजा
लीन ताहि में
जान।
जैसा
स्वप्ना रैन
का तैसा यह
संसार।।
रात्रि
के स्वप्न में
आप परिवार,
मकान-दुकान सब
बना लेते हो।
मकान दुकान
जड़ है और
पुत्र-परिवार
चेतन हैं, फिर
भी दोनों बने
तो आपके ही
शुद्ध चैतन्य
से ही हैं। परा-अपरा
प्रकृति से दो
दिखते हैं
लेकिन दोनों की
सत्ता तो एक
ही है। शरीर
में ही
बाल-नाखून आदि
कुछ जड़
हिस्सा है,
बाकी चेतन हिस्सा
है लेकिन जब
शुद्ध चैतन्य
का संबंध टूट
जाता है तो
बाकी दिखने
वाला चेतन
हिस्सा,
हाथ-पैरादि भी
जड़ हो जाता
है। जब तक
आपकी चेतना का
संबंध शरीर के
साथ रहता है,
तब तक आप अपने
को चेतन मानते
हो और संबंध
टूट जाने पर
जड़ मान लेते हो।
हकीकत में तो
जड़ और चेतन
दो नहीं हैं
एक ही तत्त्व
के रूपान्तरण
हैं |
सागर का
पानी
वाष्पीभूत
होकर बादल
बनता है एवं
पुनः बरसकर
कहीं गंगा तो
कहीं यमुना,
कहीं गोदावरी
तो कहीं
नर्मदा के रूप
में पूजा जाता
है। फिर उन
नदियों का जल
पुनः सागर में
ही मिल जाता
है। जैसे,
नदियाँ सागर
से ही उत्पन्न
होकर पुनः उसी
में लीन हो
जाती हैं ऐसे
ही पाँच भूत
का
उत्पत्तिस्थान
भी परमात्मा
से है और लीन
भी उसी में
होना है तो अब
भी तो हम उसी
में हैं। बस
जरूरत है उसे
जान लेने की।
यह सारा
संसार केवल
रूपांतरण ही
तो है। घास से
मांस और मांस
से घास बन
जाता है। आप
शाक भाजी खाते
हो तो वह क्या
है? घास ही
तो है। और
रोटी? रोटी भी
तो घास में से
ही बनती है।
गेहूँ घास से
ही तो होता
है। अरे बाबा ! अगर आप
घास न खाओ तो
आपका शरीर
दुर्बल हो
जाएगा और
बुद्धि भी
सहयोग नहीं
देगी। आप जो
यह घास खाते
हो उससे तीन
चीजें बनती
हैं- पहला
स्थूल भाग जो
मल-मूत्र के
द्वारा शरीर
से बाहर निकल जाता
है। दूसरे भाग
से रस-रक्तादि
बनता है और सूक्ष्म
भाग से मन
बुद्धि का
सिंचन होता
है। इस प्रकार
घास से ही
मांस बनता है।
घास से ही
मन-बुद्धि
बनती है। घास
से ही नेता, जनता,
स्त्री, पुरुष
और अन्य
प्राणियों की
उत्पत्ति
होती है। इस
प्रकार सब
दिखता
भिन्न-भिन्न है
किन्तु है सब
पाँच
महाभूतों का
ही मिश्रण।
इन पाँच
भूतों को
सत्ता देती है
प्रकृति और यह
प्रकृति ही
परा और अपरा
दो शक्ति के
रूप में कार्य
करती है।
स्थूल रूप में
कार्य करती है
वह है अपरा
प्रकृति और
सूक्ष्म रूप
में कार्य
करती है वह है
परा प्रकृति।
जैसे, गाड़ी
का ढाँचा भी
लोहे का होता
है तथा इंजन
भी लोहे का ही
होता है। एक
लोहा दूसरे
लोहे को चलाता
है। केवल
गाड़ी का
ढाँचा हो तो
गाड़ी नहीं चल
सकती और केवल
इंजन हो तो भी
गाड़ी नहीं चल
सकती। इसी
प्रकार जब
स्थूल जगत एवं
सूक्ष्म जगत
का साथ होता
है एवं
परमात्मा की
सत्ता होती है
तभी इसमें
सारे
कार्य-व्यवहार
दिखते हैं
लेकिन फिर
दोनों जगत
पुनः उसी
परमात्मा में
लीन हो जाते
हैं।
एक बार
किसी भक्त ने
भक्ति की।
उसकी दृढ़
भावना थी कि
भगवान साकार
रूप में दर्शन
दें और मैं उनसे
बातचीत कर
सकूँ। भक्ति
करते-करते
उसके समक्ष एक
बार भगवान
साकार रूप
लेकर आ गये और
बोलेः
"वरं
ब्रूयात्।' वर
माँग।
भक्तः "वरदान
क्या माँगूँ? मुझे तो
असली तत्त्व
का ज्ञान दे
दो। जो सबसे बढ़िया
हो वह दे दो।"
भगवानः "बढ़िया
से बढ़िया है
आत्मज्ञान।
मेरे दर्शन का
परम फल भी यही
है कि जीव
अपने स्वरूप
का ज्ञान,
आत्मज्ञान पा
ले।
मम
दरसन फल परम
अनूपा।
जीव
पावहि निज सहज
सरूपा।।
मेरे
दर्शन का यही
अनुपम फल है
कि जीव अपने
सहज स्वरूप को
पा ले।"
भक्तः "मेरा
सहज स्वरूप
क्या है?"
भगवानः "मेरा
सहज स्वरूप
है, वही
तुम्हारा है।"
भक्तः "भगवान
भगवान ! आप तो
सृष्टि की
उत्पत्ति कर
लेते हो, पालन
करते हो और
प्रलय करते
हो। हम तो कुछ
नहीं कर सकते
तो आप और हम एक
कैसे हुए?"
भगवानः "तुम्हारा
यह साधारण
शरीर और मेरा
यह मायाविशिष्ट
स्वरूप इन
दोनों को छोड़
दो। बाकी जो
तुम चैतन्य हो
वही मैं हूँ
और जिसकी
सत्ता से मेरी
आँखें देखती
हैं उसी की
सत्ता से ही
तुम्हारी
आँखें भी देखती
हैं।"
भक्तः "भगवान ! आप तो
सर्वशक्तिमान
हैं और हममें
तो कोई शक्ति
नहीं है। फिर
आप और हम एक
कैसे? आप तो
सृष्टि बना
सकते हैं लेकि
हम नहीं बना सकते?"
भगवानः "अच्छा ! आज के बाद जाग्रत की सृष्टि का संकल्प मैं करूँगा तब जाग्रत की सृष्टि बनेगी और स्वप्न की सृष्टि तुम बनाओगे।"
तब से इस
जीव को स्वप्न
आने लगे। जैसे
स्वप्न में सब
बनाकर भी आप
उससे अलग रहते
हो वैसे ही जाग्रत
में सब देखते
हुए भी आप
सबसे अलग,
सबसे न्यारे
हो। जैसे
स्वप्न से
उठने पर पता
चलता है कि 'सब आपका
खिलवाड़ ही था' ऐसे ही
यह जगत भी
वास्तव में
आपके चैतन्य
का ही
रूपान्तरण
है। यह अगर
समझ में आ
जाये तो महाराज
! ऑफिसर
के रूप में
मैं ही आदेश
दे रहा हूँ और
कार्यकर्ता
के रूप में
मैं ही आदेश
मान रहा हूँ।
धनवानों में
भी मैं ही हूँ
और सत्तावानों
में भी मैं ही
हूँ....' इस
प्रकार का
अनुभव हो
जायेगा। अगर
यह अनुभव हो
गया तो
ब्रह्मलोक तक
के जीवों में
भी जो उच्च पद
हैं उन सब
पदों का भोग
ब्रह्मवेत्ता
एक ही साथ भोग
लेते हैं।
आपका शरीर सब
भोग एक साथ
नहीं भोग सकता
लेकिन सबके
शरीर में आप
ही हो। यह अनुभव
हो जाए तो सब
भोग आप ही तो
भोग रहे हो।
ऐसी अभेद
दृष्टि आ जाये
तो आपके ऊपर
क्रुद्ध होने
वाले व्यक्ति
का क्रोध भी
प्रेम में
परिणत हो जाए
ऐसी शक्ति है
ज्ञान में।
हरि
बाबा नामक एक
उच्च कोटि के
संत हो गये
हैं। किसी ने
उनसे पूछाः
"बाबा ! आप ऐसे
महान् संत कैसे
बने?"
हरिबाबाः "एक बार बचपन में मैं गिल्ली-डंडा खेल रहा था। उस समय हमारे पास एक साधु बाबा आये। उनके पास एक झोले में भिक्षा थी। भिक्षा की सुगन्ध से आकर्षित होकर एक कुत्ता उनके पीछे पूँछ हिलाता आ रहा था। बाबा उस झोले को एक ओर टाँग कर हमारे साथ खेलने लगे किन्तु कुत्ता झोली की ओर देखकर पूँछ हिलाये जा रहा था। तब बाबा ने कुत्ते कहा कहाः "आज तो भिक्षा थोड़ी ही मिली है। तू किसी ओर जगह से माँगकर खा ले।"
फिर भी
कुत्ता खड़ा
रहा। तब पुनः
बाबा ने कहाः
"जा, यहाँ
क्यों खड़ा है? क्यों
पूँछ हिला रहा
है?"
तीन-चार
बार बाबा ने
कुत्ते से कहा
किन्तु
कुत्ता गया
नहीं। तब बाबा
आ गये अपने
बाबापने में
और बोलेः
"जा,
उल्टे पैर लौट
जा।"
तब वह
कुत्ता उलटे
पैर लौटने
लगा। यह देखकर
हम लोग दंग रह
गये। मैंने
बाबा से पूछाः
"बाबा ! यह क्या
कुत्ता उलटे
पैर लौट रहा
है? आपके
पास ऐसा
कौन-सा मंत्र
है कि वह ऐसे
चल रहा है?"
बाबाः "हमारे
गुरुदेव ने
हमें तो यही
मंत्र दिया है
कि सब में
एक... एक में
सब....।"
इसी बात
को श्री कृष्ण
इस रूप में
कहते हैं-
एतद्योनीनि
भूतानि
सर्वाणीत्युपधारय।
अहं
कृत्स्नस्य
जगतः प्रभवः
प्रलयस्तथा।।
'संपूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों (परा-अपरा) से ही उत्पत्ति वाले हैं और मैं संपूर्ण जगत का प्रभव तथा प्रलय रूप हूँ अर्थात् संपूर्ण जगत का मूल कारण हूँ।'
मत्तः
परतरं
नान्यत्किंचिदस्ति
धनंजय।
मयि
सर्वमिदं
प्रोतं
सूत्रे
मणिगणा इव।।
'हे
धनंजय ! मेरे
सिवाय
किंचित्
मात्र भी
दूसरी वस्तु नहीं
है। यह
संपूर्ण जगत
सूत्र में
मणियों के सदृश
मुझमें गुँथा
हुआ है।"
(गीताः7.6,7)
इन
दोनों
श्लोकों से यह
स्पष्ट होता
है कि परमात्मा
सर्वत्र, सदा,
सबमें पूर्ण
है। परमात्मा
पूर्ण होते
हुए भी, सदा
होते हुए भी,
हमारे साथ
होते हुए भी
पता न चलने के
कारण हम सुख
से बिछुड़े
हुए हैं।
मान लो,
हम कभी जंगल
में भटक जाएँ
और कोई राजा आकर
हमारा हाथ
पकड़कर हमें
मार्ग बताने
लगे किन्तु जब
तक हम उस राजा
को नहीं जानते
तब तक उसकी
मुलाकात का
गौरव हमें
नहीं होता।
ऐसे ही जब हम
संसाररूपी
जंगल में उलझ
जाते हैं और
प्रभु से
प्रार्थना
करते हैं कि 'हे
प्रभु ! अब तू
ही हमें सही
मार्ग बता। तब
वह प्रभु हमें
प्रेरित करके
सही मार्ग पर
लगाता है
किन्तु उसका
पता न होने के
कारण हम उसके
सान्निध्य के
गौरव का अनुभव
नहीं कर पाते।
अगर तत्त्व से
एक बार भी
उसको जान लें
तो फिर
बिछुड़ने का दुर्भाग्य
नहीं होता है।
मन का
स्वभाव है कि
अगर उसको एक
बार भी परमात्मा
का रस मिल
जाये तो फिर
वह संसार का
रस छोड़ देगा
और अगर संसार
का रस छोड़ दे
तो फिर परमात्मा
का रस आने
लगेगा। हम
चाहते हैं कि
जगत का रस, जगत
के
पद-प्रतिष्ठा
का रस बना रहे
और आत्मा का
रस भी जान
लें।
एक कथा
हैः एक बार
चींटियों की
जमातें
इकट्ठी हुईं।
एक जमात वाली
चींटी दूसरी
जमात की चींटी
से कहने लगीः "हम तो
बड़े मजे से
शक्कर के
पहाड़ पर जीते
हैं। चलो
शक्कर पर... खाओ
शक्कर.... रहो
शक्कर पर..." तब नमक
के पहाड़ पर
रहने वाली
चींटी ने कहाः
"शक्कर
कहाँ है? यहाँ नमक
ही नमक है।"
तब
शक्कर के
पहाड़ वाली
चींटी बोलीः
"चलो
हमारे साथ।"
ऐसा
कहकर वह शक्कर
वाली चींटी उस
नमक वाली चींटी
को अपने साथ
शक्कर के
पहाड़ पर ले
गयी। तब नमकवाली
चींटी बोलीः
"तुम को
बड़ी बड़ाई
हाँक रही थी
कि बड़ी मिठास
है, बड़ी
मधुरता है....
यहाँ तो कोई
मधुरता नहीं
है।"
शक्कर
वाली चींटी
नें ध्यान से
देखा तो नमक
के पहाड़वाली
चींटी के मुँह
में नमक की
छोटी-सी डली
देखी। तब वह
बोलीः
"अरे ! मुँह में तो नमक की डली रखी हुई है, फिर शक्कर की मिठास कहाँ से मिलेगी।?"
ऐसे ही
हमारे चित्त
में वासना,
अहंकार,
ममतादिरूपी
नमक की डली
भरी हुई है तो
फिर
परमात्मरूपी
शक्कर का रस
कैसे मिले?
परमात्मरसरूपी
शक्कर की
मिठास का
अनुभव तो तभी
हो सकता है जब
संसाररूपी
नमक की डली के
आकर्षण और
वासना को छोड़
दिया जाये।
किन्तु होता क्या
है? "हे
सिनेमा ! तू सुख
दे... हे फेन्टा ! तू सुख
दे... हे टी.वी. ! तू सुख
दे.... हे रेडियो ! तू सुख
दे..." अरे ! सबको
सुख का दान
करने वाले आप
भिखारी हुए जा
रहे हो? आपमें
तो इतना सुख
है, इतना
प्रेम है,
इतनी शक्ति
है, इतना
आनन्द है कि
आप संसार को
भी आनंद दे सकते
हो और
परमात्मा को
भी खुश कर
सकते हो। आप संसार
से सुख लेने
के लिए आये हो
यह गलती निकाल
दो, बस। आप कुछ
करके, कुछ
खाकर, कुछ
पहनकर, कहीं
जाकर, कुछ पाकर
सुखी होगे यह
भ्रांति
निकाल दो और
जहाँ हो वहीं
अपने
आत्मस्वरूप
में जाग जाओ,
बस। अगर आपने
इतना कर लिया
तो समझो कि सब
कुछ कर लिया... सब
कुछ पा लिया।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
रसोऽहमप्सु
कौन्तेय
प्रभास्मि
शशिसूर्ययोः।
प्रणवः
सर्ववेदेषु
शब्दः खे
पौरुषं
नृषु।।
पुण्यो
गन्धः
पृथिव्यां च
तेजश्चास्मि
विभावसौ।
जीवनं
सर्वभूतेषु
तपश्चास्मि
तपस्विषु।।
"हे
अर्जुन ! जल में
मैं रस हूँ।
चंद्रमा और
सूर्य में
प्रकाश मैं
हूँ। संपूर्ण
वेदों में मैं
प्रणव (ॐ) हूँ।
आकाश में शब्द
और पुरुषों
में पुरुषत्व
मैं हूँ।
पृथ्वी
में पवित्र
गंध और अग्नि
में मैं तेज हूँ।
संपूर्ण
भूतों में मैं
जीवन हूँ
अर्थात् जिससे
वे जीते हैं
वह तत्त्व मैं
हूँ तथा
तपस्वियों
में तप मैं
हूँ।"
(गीताः
7.8,9)
जल में जो
रस वह रस
परमात्मा है।
वैज्ञानिक दृष्टि
से जल का
विश्लेषण
करोगे तो
हाइड्रोजन और
ऑक्सीजन – ये
दो गैस
मिलेगी। इन दो
गैसों को
मिलाने से रस
उत्पन्न नहीं
होता किन्तु
विज्ञान बाहर
की आँखों से
देखना चाहता
है और विज्ञान
की आँख से जो
दिखेगा वह
दृश्य दिखेगा।
दृश्य के भीतर
जो अदृश्य रस
है वह विज्ञान
की आँख से
नहीं दिखता।
भीतर का रस तो
वे ही देख पाते
हैं जो भीतर
में, गहराई
में जाते हैं।
जैसे, दो
मित्र परस्पर
मिले। एक का
हाथ दूसरे के
हाथ में आया....
बड़ा आनन्द
आया... बड़ा रस
मिला। अगर आप
मित्र के हाथ
को लेबोरेटरी
में ले जाओ तो
त्वचा, मांस,
रक्त, अस्थि
के सिवा उसमें
कुछ नहीं
मिलेगा। फिर
भी जब मित्र
का हाथ आपके
हाथ में आया
तो रस मिला।
तो कहना पड़ेगा
कि रस भीतर
होता है, बाहर
नहीं। जो
वास्तविक में
रस है वह
इन्द्रियों
का विषय नहीं
है।
भौतिक विज्ञान तो इन्द्रियों को जैसा दिखता है वैसा निर्णय करता है और वेदान्त तथा योगदर्शन यानी आध्यात्मिक विज्ञान तो इन्द्रियाँ जिससे देखती हैं वह मन, मन को जो सत्ता देता है वह चित्त और चित्त को जो चेतना देता है उसके तरफ विचारता है। भगवान कहते हैं- जल में रस मैं हूँ तो जल में रस आया कहाँ से? कैसे आया? परमात्मा से ही आया। रस कब आता है? जब भीतर रस होता है तब। अगर किसी की जिह्वा में सूखा रोग हो गया हो तो उसे रसगुल्ला आदि किसी भी पदार्थ का रस नहीं आयेगा। जिह्वा को रस कब आता है? जब वह अपने रस से रसीली होती है और जिह्वा का वह रस आता है जल में छुपे हुए अत्यंत सूक्ष्म रस के प्रभाव के ही कारण। इसीलिए भगवान कहते हैं- "जल में रस मैं हूँ।"
प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। 'सूर्य-चन्द्र में तेज मैं हूँ।' ऐसा कहने का तात्पर्य क्या है? आँखों से हमें प्रकाश दिखता है तो वास्तव में हम प्रकाश को नहीं देखते किन्तु प्रकाश जिन वस्तुओं पर पड़ता है उन वस्तुओं को देखते हैं। प्रकाश वस्तुओं पर पड़ता है तो रूपान्तरित होता है और वह रूपान्तरण हमें दिखता है, वास्तविक प्रकाश नहीं दिखता। सूर्य और चन्द्र का जो वास्तविक प्रकाश है वही आपका-हमारा वास्तविक प्रकाश है और श्रीकृष्ण इसी प्रकाश की ओर संकेत करते हुए कह रहे हैं कि 'सूर्य-चन्द्र में तेज मैं हूँ।'
प्रणवः
सर्ववेदषु। 'सब
वेदों में
ॐकार मैं हूँ।' वेद
का कोई अंत
नहीं है। वेद
यानी ज्ञान।
ज्ञान का कोई
अन्त नहीं
होता और जिसका
अंत हो जाये
वह ज्ञान नहीं
होता। वेद की
चार संहिताएँ
हैं 1121 या 1127
उपनिषद हैं।
इन सब
उपनिषदों का
सार कठवल्ली
है और कठवल्ली
आदि सबका सार
बीज रूप में 'ॐ' है।
'अ'कार + 'उ'कार + 'म'कार = ॐकार।
कोई भी
व्यंजन 'अ'कार के
बिना नहीं
बोला जा सकता।
यह 'अ'कार सृष्टि
का स्थूल
(विश्व), 'उ' कार
तेजस और 'म' कार
प्राज्ञ एवं ॐ
की
अर्धमात्रा 'ँ' है
वह है चैतन्य
सूर्य का
द्योतक।
अभी तो
रशिया के
वैज्ञानिक
चकित हो गये
कि कोई भी
आदमी भीतर कोई
एक शब्द सोचे
और बाहर दूसरा
शब्द बोले तो
दोनों अलग-अलग
उनके
कम्पयूटर में
आ जाते हैं
लेकिन 'ॐ'कार एक
विलक्षण शब्द
है। भीतर अगर 'ॐ' कार
एवं बाहर
दूसरा शब्द हो
या बाहर 'ॐ' कार और
भीतर दूसरा
कोई शब्द हो
फिर भी दोनों
जगह 'ॐ'कार ही आ
जाता है। यह 'ॐ'कार
शब्द अन्य सब
शब्दों से
बिल्कुल अलग
पड़ता है और
ऋषियों ने
इसकी आकृति भी
बिल्कुल
निराली बना दी
है।
ऐसा कोई
भी मन्त्र
नहीं है
जिसमें ॐ का
उपयोग न किया
गया हो। जिसमें
ॐ का उपयोग
नहीं है वह
बीजमन्त्र से
रहित होता है।
यह ॐकार सबका
बीज है, सबका
मूल है। नवजात
शिशु जब रोता
है तब उसकी 'ऊँवां...ऊँवां...'
आवाज में ॐकार
की ध्वनि ही
होती है। मरीज
भी बिस्तर पर
कराहता है
उसकी ॐऽऽऽऽऽ...ॐऽऽऽऽ
आवाज में ॐकार
की ही ध्वनि
होती है। इससे
सिद्ध होता है
कि आपका जो
चैतन्य आत्मा
है उसकी
वास्तविक
ध्वनि ॐ है।
विभिन्न
पद्धतियों से
ॐकार के
द्वारा अपनी साधना
को संपन्न
किया जा सकता
है।
आज्ञाचक्र पर
अथवा नाभि
केन्द्र पर ॐ
की आकृति का
ध्यान करके
अथवा हृदय में
उसकी भावना
करते हुए
ध्यान करके हम
अपनी सुषुप्त
शक्तियों को
विकसित कर
सकते हैं।
वैखरी
वाणी द्वारा ॐ
का उच्चारण
करते हुए
मध्यमा में
पहुँच जाओ। मध्यमा
से पश्यन्ती
में जाओ और
पश्यन्ती से अगर
परा वाणी में
पहुँच जाओ तो
अत्यंत
सूक्ष्म अवस्था
को परम मौन को
उपलब्ध हो
सकते हो। वह
परम मौन की जो
अवस्था है उस
अवस्था को
पाये हुए
व्यक्ति के
आगे इस लोक का
तो क्या,
त्रिलोकी का
राज्य भी
तुच्छ हो जाता
है।
भगवान
शंकर ने भैरव
विज्ञान में
कहा हैः
''हे उमा ! इस
ॐ को जो जानता
है वह मेरे को
जान लेता है।
इस ॐ को जो समझ
लेता है वह
मुझे समझ लेता
है। इस ॐ को जो
पा लेता है वह
मुझे पा लेता
है।"
भगवान
श्री कृष्ण
आगे कहते हैं शब्दः खे। अर्थात्
आकाश में शब्द
मैं हूँ।
शब्द में
बड़ी शक्ति
है। शब्द का
नाश नहीं होता।
मैंने यहाँ
शब्द कहे और
रेडियो
स्टेशन के यंत्र
हों तो मेरे
द्वारा यहाँ
कहे गये शब्द
हजारों मील
दूर तक सुनायी
पड़ते हैं। इस
प्रकार
शब्दों का नाश
नहीं हुआ। वाणी
से निकले हुए
शब्द नष्ट
नहीं होते
वरन् आकाश में
गूँजते रहते
हैं। इसीलिए
भगवान कहते हैं-
शब्दः
खे। आकाश
में जो शब्द
है वह मैं
हूँ।
पौरूषं
नृषु। भगवान कहते
हैं कि पुरुषों
में पुरुषत्व
मैं हूँ।
पुरुष कौन है? जो
पुरुषार्थ
करे वह पुरुष।
पुरुषार्थ
क्या है? पुरुषस्य
अर्थः इति
पुरुषार्थः। जो
परब्रह्म
परमात्मा
पुरुष है उसको
पाने के लिए
जो प्रयत्न है
उसको
पुरुषार्थ
बोलते हैं।
भगवान कहते
हैं कि ऐसा
पुरुषार्थ
करने वालों
पुरुषों में
पौरूष मैं
हूँ।
पुरुष वह
है जो
पुरुषार्थ
करके 'है' उसको
ठीक से समझ
ले। जो सदा
मौजूद है और
जिसको पाने के
बाद कुछ पाना
नहीं, जिसको
जानने के बाद
कुछ जानना
नहीं, जिसमें
स्थिर रहने के
बाद बड़े भारी
दुःख भी चलित
न कर सके ऐसे
तत्त्व को पाना
पुरुषार्थ
है।
लोग
समझते हैं कि
जिसके पास धन
नहीं है, उसके
लिए धन पाना
पुरुषार्थ
है। जिसके पास
बाह्य पढ़ाई-लिखाई
नहीं उसके लिए
पढ़ाई-लिखाई
पुरुषार्थ है।
जिसके पास यश
नहीं उसके लिए
यश पाना पुरुषार्थ
है। इस प्रकार
जो नहीं है
उसको लाना,
उसको पाना
पुरुषार्थ
मान लिया जाता
है। जगत की
जितनी भी चीजे
हैं वे पहले
नहीं थीं, बाद
में नहीं
रहेंगी और अभी
भी नहीं के
तरफ जा रही हैं।
जो नहीं की
तरफ जा रही
हैं उन नश्वर
वस्तुओं,
नश्वर सत्ता,
नश्वर पद को
पाने का जो
यत्न करता है
उसको तो
शास्त्रीय
भाषा में
अज्ञानी कहते
हैं और जो
शाश्वत
तत्त्व को जानकर
निहाल होने को
तत्पर है उसको
बोलते हैं
पुरुष। भगवान
कहते हैं कि
ऐसे पुरुषों
का पुरुष्त्व
मैं हूँ।
इस
प्रकार गीता
के सातवें
अध्याय के
आठवें श्लोक
में भगवान
कहते हैं कि
जल में रस,
चन्द्रमा और
सूर्य में
प्रकाश,
संपूर्ण
वेदों में ॐकार,
आकाश में शब्द
एवं पुरुषों
में पुरुष्तव
मैं हूँ।
नौवें
श्लोक में
भगवान आगे
कहते हैं-
पुण्यो
गंधः
पृथिव्यां च। 'पृथ्वी
में पवित्र
गंध मैं हूँ।'
पृथ्वी
में पवित्र
गंध भी वह
चैतन्य सत्ता
है। यहाँ
ध्यान देने
योग्य बात यह
है कि भगवान ने
पवित्र गंध
कहा है। सुगंध
नहीं कहा
क्योंकि सुगन्ध
पवित्र गंध हो
यह जरूरी
नहीं। कई ऐसी
सुगंधें हैं
जो कामवासना
को भड़काती
हैं। पेरिस
आदि में इस
प्रकार की खोज
करके इत्र
(परफ्यूम्स)
बनाये जाते
हैं। जिनसे
मनुष्य की काम
वासना
उद्दीप्त हो,
मनुष्य संसार
के कीचड़ में
फँसे। इसीलिए
श्रीकृष्ण ने
सुगन्ध नहीं, वरन्
'पवित्र
गंध' कहा है।
तेजश्चास्मि
विभावसौ। 'अग्नि
में तेज मैं
हूँ।' तेज रूप
तन्मात्रा से
उत्पन्न होकर
उसी में लीन
हो जाता है।
अग्नि में से
अगर तेज निकाल
दिया जाये तो
अग्नि बचे ही
नहीं। यहाँ
भगवान कहते
हैं कि 'अग्नि
में तेज मैं
हूँ।'
जीवनं
सर्वभूतेष।
संपूर्ण
भूतों में
जीवन मैं हूँ।
प्राणी में उसको
जिलाने वाली
जो
जीवनी-शक्ति
है वह अगर न रहे
तो वह प्राणी
फिर प्राणी
नहीं रहेगा।
फिर तो वह
केवल शव रह
जायेगा। अतः
समस्त
प्राणियों
में अपनी
चेतना का
अस्त्तित्व
बताते हुए भगवान
कहते हैं कि
संपूर्ण
भूतों में मैं
उनका जीवन
हूँ।
अंत में
भगवान कहते
हैं- तपश्चास्मि
तपस्विषु। तपस्वियों
में मैं तप
हूँ।
सुख-दुःख,
शीत-उष्ण,
मान-अपमान आदि
द्वन्द्वों
को सहन करने
को तप कहते
हैं। किन्तु
वास्तविक तप
तो है
परमात्म-प्राप्ति
में। चाहे
कितनी भी
विघ्न-बाधाएँ
आयें, उनकी
परवाह न करते
हुए अपने
लक्ष्य में
डटे रहना।
यही
तपस्वियों का
तप है और इसी
से वे तपस्वी
कहलाते हैं।
इसी तप के लिए
भगवान संकेत
करते हुए कहते
हैं कि
तपस्वियों का
तप मैं हूँ।
इस प्रकार
उपरोक्त
दोनों ही
श्लोकों में
भगवान कहते
हैं कि जल में
रस,
सूर्य-चन्द्र
में प्रभा,
वेदों में
प्रणव, आकाश
में शब्द,
पुरुषों में
पुरुषत्व,
पृथ्वी में
गंध, अग्नि
में तेज,
संपूर्ण
भूतों में
उनका जीवन तथा
तपस्वियों
में तप मैं
हूँ। भगवान ने
जिज्ञासुओं
के लिए अपनी
सर्वव्यापकता
का बोध कराया
है ताकि
जिज्ञासु
जहाँ-जहाँ नजर
जाये, वहाँ
भगवान की
सत्ता मानकर
अपने
वास्तविक
स्वरूप का
अनुभव करने में
कामयाब हो
सके, वास्तविक
कृष्ण तत्त्व
का ज्ञान पा सके।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
बीजं
मां
सर्वभूतानां
विद्धि पार्थ
सनातनम्।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि
तेजस्तेजस्विनामहम्।।
'हे
अर्जुन ! तू
संपूर्ण
भूतों का
सनातन बीज
यानी कारण मुझे
ही जान। मैं
बुद्धिमानों
की बुद्धि और
तेजस्वियों
का तेज हूँ।'
(गीताः
7.10)
सब भूतों
में जो सनातन
बीज है वह मैं
हूँ। बीज में
से पौधा और
पौधे में से
वृक्ष बन जाता
है। वृक्ष में
पुनः बीज
उत्पन्न होता
है। जैसे, बीज
में से वृक्ष
और वृक्ष में
बीज होता है
वैसे ही हम
गहरी नींद में
सो जाते हैं तो
बीजरूप हो
जाते हैं।
सुषुप्ति
अवस्था बीजावस्था
है।
स्वप्नावस्था
पौधावस्था है
और जाग्रतावस्था
वृक्षावस्था
है।
इस
प्रकार
अवस्थाएँ
बदलती हैं-
जाग्रत..... स्वप्न.......
और
सुषुप्ति....।
इनमें जो
बीजरूप
दृष्टा है वह सनातन
है और भगवान
श्रीकृष्ण
कहते हैं- वही
बीज मैं हूँ।
बीजं
मां
सर्वभूतानां.....
जैसे
श्रीकृष्ण
सनातन हैं
वैसे ही आप भी
सनातन हो इस
बात को जान
लो।
आगे
भगवान
श्रीकृष्ण
कहते हैं-
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि।
बुद्धिमानों
में बुद्धि
मैं हूँ। बुद्धि
यानी कौन-सी
बुद्धि? वकील की
बुद्धि? नहीं...
श्रीकृष्ण इस
बुद्धि की बात
नहीं कर रहे
हैं।
श्रीकृष्ण
बुद्धिमान की
बात कर रहे हैं,
विद्वान की
नहीं।
विद्वान तो आप
किसी मूर्ख
व्यक्ति को भी
बना सकते हैं।
तेजोहीन,
बलहीन व्यक्ति
भी विद्वान हो
सकता है।
किन्तु
विद्वान होना एक
बात है और
बुद्धिमान
होना दूसरी
बात है। यह
जरूरी नहीं कि
बुद्धिमान
व्यक्ति
पढ़ा-लिखा हो
और विद्वान
व्यक्ति
बुद्धिमान
हो। कई लोग विद्वान
होते हुए भी
मूर्ख होते
हैं और कई लोग
अविद्वान
होते हुए भी
बुद्धिमान
होते हैं।
श्रीरामकृष्ण
परमहंस, रमण
महर्षि वगैरह
बुद्धिमान थे,
विद्वान नहीं
थे और जो लोग
बी.ए., एम. ए.,
पी.एच.डी करके,
दारू पीकर
सड़कों पर
लड़खड़ा रहे
हें वे लोग
विद्वान हो
सकते हैं
लेकिन बुद्धिमान
नहीं।
जगत में
जितने भी दुःख
हैं वे सब
बुद्धि की कमजोरी
से आते हैं।
जहाँ-जहाँ
अशांति, भय
कलह देखो
वहाँ-वहाँ समझ
लेना कि
बुद्धि की कमी
है। बुद्धि के
दोष से ही
दुःख होता है।
केवल सूचनाएँ
एकत्रित कर लेना
भी बुद्धिमता
नहीं है।
एक
राजकुमार था।
वह नितांत
बुद्धु था। 8-9
साल का हो गया
था फिर भी
निरा मूर्ख।
वजीरों ने राजा
से कहाः
"राजन !
जहाँ
बुद्धिमान
लड़के पढ़ते
हैं उस काशी
विश्वविद्यालय
में राजकुमार
के निवास की
व्यवस्था की
जाये तो वह
विद्वान हो
सकता है।"
वजीरों
की सलाह से
ऐसा ही किया
गया और वह
राजकुमार
पढ़-लिखकर
विद्वान हो
गया। न्याय,
वैशेषिक,
ज्योतिष आदि
शास्त्र
पढ़ने के बाद
उसने पिता को
पत्र लिखाः "अब
मैं पढ़ लिखकर
बुद्धिमान हो
गया हूँ।"
पिता
पत्र पढ़कर
खुश हो गये और
उसे अपने पास
बुला लिया।
नगर के
अच्छे-अच्छे
बुद्धिमान
सज्जनों को
आमंत्रित
करके
राजकुमार का
स्वागत समारोह
रखा। उन
सज्जनों में
से एक बुजुर्ग
सज्जन ने
राजकुमार से
पूछाः
"राजकुमार
!
सुना है आप
बड़े
बुद्धिमान हो
गये हो। अच्छी
बात है... अब यह
बताओ कि
क्या-क्या पढ़
कर आये हो?"
राजकुमारः
"न्यायशास्त्र,
वैशेषिक
दर्शन वगैरह
का अध्ययन
किया है।
ज्योतिषशास्त्र
का भी अध्ययन
किया है एवं
भविष्यवक्ता
भी हो गया
हूँ।"
बातों-बातों
में उस
बुजुर्ग ने
अपने हाथ की
अँगूठी निकाल
कर मुट्ठी में
रख ली और
राजकुमार से
कहाः
"अच्छा ! आप
भविष्यवक्ता
हो, ज्योतिष
भी जानते हो
तो बताओ कि
मेरे हाथ में
क्या है?"
राजकुमार
ने अपना गणित
लगाया एवं
कहाः
"आपके
हाथ में कुछ
गोल-गोल है और
उसके बीच में
सुराख है।"
बुजुर्गः
"ठीक
है, आपने जो
कहा वह सच है।
अब यह भी बताओ
कि जिसके बीच
में सुराख है
वह गोल-गोल
चीज क्या है?"
राजकुमारः
"यह
बात मैं
ज्योतिष के
आधार पर तो
नहीं बता सकता
किन्तु अपनी
अक्ल के आधार
पर कहता हूँ
कि वह पहिया
होगा।"
अब हाथ
में पहिया
कहाँ से आता?
....तो यह
हुई विद्वता न
कि
बुद्धिमता।
जिस बुद्धि से
आपके चित्त
में
विश्रान्ति
नहीं आयी, जिस
बुद्धि से
आपके भीतर का
रस नहीं मिल
पाया वह बुद्धि
नहीं, विद्या
नहीं, केवल
सूचनाएँ हैं। बुद्धि
तो राग द्वेष
से अप्रभावित
रहती है। सुख-दुःख
से अप्रभावित
रहती है, मान-अपमान
से अप्रभावित
रहती है।
बुद्धिमान वह है
जो आने वाले
प्रसंगों को
पचा ले,
सुख-दुःख को
पचा ले,
निंदा-स्तुति
को पचा ले,
काम-क्रोध को पचा
ले, अहंकार को
पचा ले।
ऐसे एक
बुद्धिमान हो
गये हैं
महाराष्ट्र
में। उनका नाम
था श्री एकनाथ
जी महाराज।
यह जरूरी
नहीं है कि
किसी संत
पुरुष को सभी
लोग आदर से ही
देखें। जहाँ
आदर से देखने
वाले होते हैं
वहाँ अनादर से
सोचने वाले भी
होते हैं। कुछ
लोगों ने सोचाः
'एकनाथ
जी महाराज को
क्रोध नहीं
आता है। वे
अक्रोधी है।
चलो, उनको
क्रोधित करके
उनकी बेइज्जती
करें' उन लोगों
ने 200 रुपये का
इनाम घोषित
कियाः 'जो एकनाथ
जी महाराज को
क्रोधित करके
आयेगा उसे 200
रुपये इनाम
में मिलेंगे।'
पैठन
जैसी जगह पर
उस जमाने के 200
रूपये ! अभी के दस
हजार से भी
ज्यादा ! कोई
ब्राह्मण
कुमार 200 रुपये
कमाने के लिए
यह कार्य करने
को तैयार हो
गया। काम तो
कठिन था, किन्तु
200 रूपये की
लालच ने उसे
यह कार्य करने
के लिए
प्रेरित
किया।
सुबह का
समय था। एकनाथ
जी महाराज
अपने घर में परमात्म-तत्त्व
का चिन्तन
करते-करते
आत्मारामी
होकर मस्ती से
बैठे थे। उसी
समय उस ब्राह्मण
युवक ने बिना
नहाये-धोये
एकनाथ जी
महाराज के घर
में प्रवेश किया
और एकनाथ जी
महाराज की गोद
में बैठ गया।
एकनाथ जी
उसके सिर पर
हाथ घुमाया और
कहाः
"भैया ! तुम
बड़े प्रेमी
हो ! मेरे प्रति
तुम्हारा
कितना स्नेह
है कि दो मिनट
भी बाहर न रुक
सके !
जल्दी-जल्दी आ
गये। इस ढंग
से तो मेरा
कोई शिष्य भी
आज तक मेरी
गोद में नहीं
बैठा।"
जिसने
अपने मन को
जीत लिया, मन
के विकारों को
जान लिया वह
दूसरे के मन
की चालबाजी को
भी जान लेता
है। एकनाथ जी
उसके मन के
भावों को समझ
गये थे कि वह
उन्हें
क्रोधित और
दुःखी करने
आया है। अगर
वे क्रोधित और
दुःखी हो जाते
तो उसकी जीत
हो जाती। अतः
वे दुःखी नहीं
हुए।
एकनाथ जी
महाराज पूजा
से उठे एवं
गिरिजाबाई से
कहाः
"देवी ! घर
में ब्राह्मण
अतिथि आया है।
उसे भोजन परोसो।"
ब्राह्मणः
"मैं
भोजन तो
करूँगा
किन्तु अकेले
नहीं, आपके साथ
करूँगा।"
एकनाथ
जीः "ठीक है।
हम साथ में ही
भोजन करेंगे।"
गिरिजाबाई
दोनों को भोजन
परोसने लगीं।
ज्यों ही
गिरिजाबाई
झुककर घी
परोसने लगीं
त्यों-ही वह
ब्राह्मण
गिरिजाबाई की
पीठ पर बैठ
गया।
अपनी
पत्नी की पीठ
पर यदि कोई
युवान लड़का
बैठ जाय तो
क्रोध आना
स्वाभाविक है
किन्तु एकनाथ जी
ने कहाः
"गिरिजा !
देखना कहीं यह
ब्राह्मण
पुत्र नीचे न
गिर पड़े।"
गिरिजाबाई भी बुद्धिमती थीं। वे बोलीः "नाथ ! आप निश्चिंत रहें। मुझे तो अपने बेटे हरि को पीठ पर बैठा-बैठाकर काम करने का अभ्यास हो गया है। इसे मैं नीचे नहीं गिरने दूँगी। यह भी तो मेरे बेटे हरि जैसा ही है।"
इतना
सुनते ही वह
ब्राह्मण
कुमार नीचे
उतर गया एवं
एकनाथ जी के
चरणों में
गिरकर क्षमा
माँगने लगा।
कोई हमें
क्रोधी, लोभी,
अभिमानी
बनाने को आये और
हम तदनुसार बन
जाएँ यह हमारी
बुद्धिमानी नहीं
है। कोई भी
व्यक्ति चाहे
जो चाबी लेकर
आये और उसी को
लगाकर हमारा
ताला खोलने लग
जाय यह हमारी
बुद्धिमानी
नहीं है।
बुद्धिमानी
तो वह है कि
उत्पन्न किये
गये प्रतिकूल
प्रसंग में भी
आप तटस्थ रहो।
अगर तटस्थ रह
जाते हो तो
आपकी
बुद्धिमत्ता
है। अन्यथा
केवल सूचनाएँ
है, मान्यताएँ
हैं,
बुद्धिमत्ता
नहीं है। बुद्धिमान
तो एकनाथजी
जैसे होते हैं
जो विषम
परिस्थिति
में भी चलित
नहीं होते।
भगवान श्री
कृष्ण कहते
हैं- बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि।
'बुद्धिमानों
की बुद्धि मैं
हूँ।'
आगे
भगवान कहते
हैं-
तेजस्तेजस्विनामहम्।
'तेजस्वियों
का तेज मैं
हूँ।'
तेज से
तात्पर्य
शरीर के तेज
से नहीं
किन्तु आत्म
तेज से है।
कोई व्यक्ति
जवारे का रस
या आँवले का
रस पिये, छाया
में रहे अथवा
वह
स्विटजरलैण्ड
का हो तो वह शरीर
से तो ज्यादा
चमकता हुआ
दिखेगा लेकिन
श्री कृष्ण इस
तेज की बात
नहीं कर रहे
हैं अपितु उस
तेज की बात कर
रहे हैं जो
जीवनमुक्त
महापुरुषों
का तेज है।
फिर उनका शरीर
भले काला हो
या गोरा....
किन्तु उनके
होने मात्र से
हमारा चित्त
ऊँची यात्रा
करने लगता है।
हमारा मन काम
से हटकर राम
में लगने लगता
है।
तेज तो
रावण, कंस,
सीजर, हिटलर
आदि के पास भी
था किन्तु
कैसा तेज था?बाहर
से दिखने वाला
तेज था। ऐसे
लोगों के निकट
बैठने से वे
तेजस्वी
दिखेंगे एवं
आप सिकुड़े हुए
दिखोगे किन्तु
मन में तो ऐसा
ही होगा कि 'ये
नाराज न हो
जाएँ?' आप अंदर
से सिकुड़ते
रहेंगे एवं
चापलूसी के रास्ते
खोजते
रहेंगे। इस
प्रकार आपकी
स्वाभाविकता
चली जाएगी एवं
कृत्रिमता
आती जायेंगी।
श्री
कृष्ण उस तेज
की बात कर रहे
हैं जिसकी वजह
से आपका मन
कृत्रिम जीवन (Artificial Life) छोड़ कर
नैसर्गिकता
की तरफ आने
लगे, सिकुड़ान
छोड़कर सहजता
के तरफ आने
लगे, अहंकार
छोड़ कर आत्मा
की तरफ आने
लगे। ऐसा तेज
श्रीराम के पास
है, श्री
कृष्ण के पास
है, मेरे
गुरुदेव पूज्य
श्री
लीलाशाहजी
बापू के पास,
कबीर जी,
नानकजी जैसों
के पास है।
ऐसे महापुरुषों
के निकट आते
ही आपके जीवन
में सहजता,
स्वाभाविकता
आने लगती है।
जहाँ सहजता
हो, स्वाभाविकता
हो,
नैसर्गिकता
हो, सरलता हो,
ऐहिक पदार्थों
की गुलामी के
बिना सच्चा
सुख मिलता हो
वहीं
परमात्मा का
तेज होता है।
इसीलिए मैं
बार-बार कहता
रहता हूँ किः
"सम्राट
के साथ राज्य
करना भी बुरा
है... न जाने कब
रूला दे? फकीरों
के साथ रहना
भी अच्छा है... न
जाने कब मिला
दे?"
रमण
महर्षि के पास
दो तरह के
व्यक्ति आते
थेः एक तो वे
जिन्हें
तत्त्वज्ञान
की जिज्ञासा थी
और दूसरे वे
जो उन्हें
भगवान मानते
थे। जिनकी
बुद्धि तीक्ष्ण
होती है एवं जिन्हें
तीव्र तड़प
होती है वे
तत्त्वज्ञान की
बात को सुनकर
तत्त्व का
साक्षात्कार
कर लेते हैं
लेकिन जिनकी
जिज्ञासा मंद
होती है एवं बुद्धि
की तीव्रता कम
होती है ऐसे
व्यक्तियों
को ब्रह्म की
भावना करनी
पड़ती है।
रमण
महर्षि कहते
थेः "यदि तुम
ईश्वर के
दर्शन करना
चाहते हो तो
ईश्वर के
दर्शन करने
वाला कौन है? उसे
जान लो।
तुम्हारे में
और ईश्वर में
क्या फर्क है? उसे
जान लो।"
इस
प्रकार के वचन
सुनकर कुछ लोग
तो तत्त्व के अन्वेषण
में लग जाते
थे। बाकी के
कुछ लोग कहते
किः तत्त्व
क्या है...
आत्मा क्या
है.... मैं कौन हूँ....
इस झंझट में
क्यों पड़ना?
हमारे लिए तो
आप ही भगवान
हैं।
श्रीकृष्ण थे,
श्रीराम थे यह
तो हमने सुना
है किन्तु अभी
वही साक्षात
हमारे सामने
हैं। हम खुली
आँख उनके दर्शन
कर रहे हैं,
फिर आँखें बंद
करके क्या देखना....
क्या सोचना?"
तुम
तसल्ली न दो,
सिर्फ
बैठे रहो।
महफिल
का रंग बदल
जायगा,
गिरता
हुआ दिल भी
सँभल
जायेगा।।
रमण
महर्षि के पास
बाहर का कोई
सरकारी पद
नहीं था, कोई
धनबल या
बाहुबल नहीं
था किन्तु
भीतर का बल
आध्यात्मिक
बल,
आध्यात्मिक
तेज इतना था कि
उनके चरणों
में लोगों को बड़ी
शांति मिलती
थी। मोरारजी
भाई देसाई कहते
थेः
"मैं
प्राइम
मिनिस्टर बना,
उस समय भी
मुझे वह सुख
नहीं मिला जो
रमण महर्षि के
चरणों में
चुपचाप बैठने
से मिला है।"
इस
प्रकार भगवान
श्रीकृष्ण
कहते हैं कि
बुद्धिमानों
की बुद्धि एवं
तेजस्वियों
का तेज मैं
हूँ।
एकनाथ जी
महाराज की जो
समता है, वह
ईश्वर है। रमण
महर्षि की,
लीलाशाहजी
बापू की जो
समता है, वह
ईश्वर है और
आपके अन्दर भी
जिस समय समता
आये, समझ लेना
कि उस समय वह
साक्षात्
ईश्वर ज्यों-का-त्यों
प्रगट हुआ है।
यह जरूरी
नहीं कि केवल
महात्माओं
में ही समता होती
है। ईश्वर तो
कभी-कभी
दुरात्माओं
में भी उसी
रूप में प्रगट
हो सकता है।
रजोगुणी,
तमोगुणी में
प्रगट हो जाता
है।
सत्त्वगुणी
में भी प्रगट
हो जाता हैं
और गुणातीत
में तो प्रगट
रहता ही है। गुणातीत
में सदैव
प्रगट रहता
है, बाकी में
कभी-कभी प्रगट
होता है। जो
कभी-कभी प्रगट
होता है, उसे एक
बार भी ठीक से
जान लो कि 'वही है' तो
बेड़ा पार हो
जाता है।
कभी कोई
दुर्घटना हो
जाये, बड़े
दुःख का प्रसंग
आ जाये, फिर भी
यदि आपके
चित्त में
दुःख नहीं होता
तो समझ लो कि
उस समय
बुद्धिमत्ता
विद्यमान है। बड़े
सुख का, खुशी
का प्रसंग आ
जाये, फिर भी
आपके चित्त
में हर्ष नहीं
होता हो तो
समझ लो कि उस
समय ईश्वरीय
अवस्था है।
राजा
रणजीतसिंह के
जीवन की एक
घटना हैः
एक बार
रणजीतसिंह
वेश बदलकर
कहीं जा रहे
थे। इतने में
एक पत्थर कहीं
से आकर उनके
सिर में लगा
और रक्त बहने
लगा। कुछ
सिपाही सेवा
में लग गये
एवं कुछ
सिपाही चारों
ओर अपराधी को
खोजने के लिए
दौड़े।
थोड़ी ही
देर में
सिपाही एक
बुढ़िया को
पकड़कर ले आये
एवं राजा के
सामने पेश
करते हुए बोलेः
"आपके
सिर पर कातिल
चोट करने वाली
यही बुढ़िया है।
बताइये राजन ! अब
इसे क्या सजा
दी जाय?"
यह सुनकर
बुढ़िया
काँपने लगी और
बोलीः
"अन्नदाता
!
मैंने जान
बूझकर पत्थर
नहीं मारा था।
मैं और मेरा
बेटा दोनों
भूखे थे। मैं
पत्थर के
द्वारा वृक्ष
पर से बेलफल
तोड़कर हम
दोनों की भूख
मिटाना चाहती
थी। मैंने फल
तोड़ने के लिए
पत्थर फेंका
था, किन्तु
गलती से आपको
लग गया, क्षमा
करें, राजन !"
तब रणजीत
सिंह सिपाही
से बोलेः
"इस
वृद्धा को एक हजार
रुपये दे दिये
जाएँ एवं साल
भर के लिए अन्न-वस्त्र
की व्यवस्था
कर दी जाए।"
वजीर ने
आश्चर्यचकित
होकर पूछाः "यह
आप क्या कर
रहे हैं, राजन !
पत्थर मारने
वाली को हजार
रुपये एवं
अन्न-वस्त्र
दिला रहे हैं।"
रणजीत
सिंहः "जब एक
वृक्ष को
पत्थर लगता है
तो वह भी इन्हें
फल देकर
तृप्ति
प्रदान करता
है तो मैं तो
मनुष्य हूँ...
बुद्धिमान
हूँ.... मैं इसे
सजा कैसे दे
सकता हूँ?"
नरसिंह
मेहता ने ठीक
ही कहा हैः
वैष्णव
जन तो तेने
कहिए जे पीड़
पराई जाणे रे...
परदुःखे
उपकार करे
तोये मन
अभिमान न आणे
रे....
अर्थात् 'सच्चा
वैष्णव तो वही
है जो दूसरों
के कष्टों को
जानता है एवं
उन्हें
मिटाने के लिए
परोपकार करता
है फिर भी मन
में अभिमान
नहीं आने
देता।'
संसार तो
रणमैदान है।
कभी पत्थर की
चोट सहनी पड़ेगी
तो कभी अपमान
की चोट सहनी
पड़ेगी। कभी मान्यता
के अनुकूल बात
होगी तो कभी
मान्यता के प्रतिकूल
बात होगी।
लेकिन चोट का
भी सही अर्थ
लगाओगे तो
धन्यवाद देने
लगोगे और
धन्यवाद देते-देते
आप स्वयं
धन्यवादस्वरूप
हो जाओगे।
किसी
महात्मा की
परीक्षा करने
के लिए एक
युवक अपने कोट
की जेब में एक
कबूतर ले आया।
उसने महात्मा
से पूछाः
"बाबाजी ! आप
बताइये कि
मेरे कोट में
क्या है?"
बाबाजीः "कबूतर
है।"
युवकः "अच्छा,
यह बताइये कि
कबूतर जिन्दा
है या मरा हुआ?"
बाबाजीः "कबूतर
जिन्दा है कि
मरा हुआ यह
मुख्य बात
नहीं है। मैं
अगर जिन्दा
बोलूँगा तो
तुम उसकी गर्दन
दबा दोगे और
मैं अगर मरा
हुआ बोलूँगा
तो तुम उसे
जिन्दा
ज्यों-का-त्यों
निकालोगे। अब
मैं इसे मरा
हुआ बोलता हूँ
ताकि तुम इसे
जिन्दा निकाल
दो और उसके
प्राण बच
जायें। मैं
झूठा पड़
जाऊँगा तो कोई
हर्ज नहीं है।"
यह है
बुद्धिमत्ता।
'औरों के
हित में हमारी
बात झूठी हो
जाए तो कोई हर्ज
नहीं है। बहुत
लोगों के लाभ
में हमारी ऐहिक
देह का लाभ
चला जाये तो
कोई हर्ज नहीं
है' – ऐसा सोचना
एवं तदनुसार
करना
बुद्धिमत्ता
है।
श्रीकृष्ण
इसी
बुद्धिमत्ता
की ओर संकेत
करते हुए कहते
हैं- बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि।
बुद्धिमानों
की बुद्धि मैं
हूँ।
श्री
कृष्ण ने
युधिष्ठिर से 'नरो वा
कुंजरो वा' कहलवाया।
हथियार न
उठाने की शपथ
ले लेने के
बावजूद
हथियार उठाया,
क्यों?
उन्होंने
सोचा कि अब
अगर हथियार
नहीं उठेगा तो
अधर्मियों की
विजय हो
जायेगी।
अधर्मी लोग जीत
जायेंगे तो
हिंसा बढ़
जायेगी।
इसीलिए अपनी
बात झूठी भी
हो जाती है तो
कोई बात नहीं
किन्तु अधिक
लोगों का भला
होना चाहिए।
यह
श्रीकृष्ण
की
बुद्धिमत्ता है।
जैसे,
पुत्र चाहे
कैसा भी हो,
माता-पिता
सदैव उसका हित
ही चाहते हैं।
ऐसे ही हम
चाहे जैसी अवस्था
में हों, चाहे
जैसी
मान्यताओं
में जीते हों,
परमात्मा
सदैव हमारा
हित ही चाहते
हैं।
हम भी
परमात्मा के
जितने करीब
होते हैं उतने
ही हमारे
द्वारा बहुजनहिताय
कार्य होते
हैं। जब बहुजनहिताय
प्रवृत्ति
होने लगे, बहुजनहिताय
विचार होने
लगें तो समझ
लेना चाहिए कि
बुद्धि ईश्वराभिमुख
है। अपनी देह
के लिए, अपने
कुटुम्ब के
लिए ही जीवन
एवं विचार हो
तो समझ लेना
कि बुद्धि
पशुता की तरफ
है। लोग अपने
बेटे-बेटी के
विवाह में
लाखों रुपये
खर्च कर देते हैं
किन्तु भूखे
पड़ोसी या
किसी गरीब के
लिए 200-500 रुपये
भी खर्च करते
हैं तो उसका बयान
किये बिना
नहीं रहते कि 'हमने
इतना किया....
उतना किया....' यह
बुद्धिमानी
नहीं वरन्
बुद्धि का
दिवाला है।
एक आदमी
जल्दी-जल्दी 'हेअर
कटिंग सैलून' में
गया और नाई से
बोलाः
"जल्दी
करो। मुझे
ट्रेन पकड़ना
है। जल्दी से
मेरे बाल काट
दो।"
नाईः "अच्छा...
बैठो।"
व्यक्तिः
"कुर्सी
पर तो नहीं
बैठूँगा,
जल्दी है।"
नाईः "अच्छा...
टोपी तो
उतारो।"
व्यक्तिः
"टोपी
भी नहीं
उतारूँगा और
कुर्सी पर भी
नहीं
बैठूँगा। मैं
जल्दी में हूँ
मेरे बाल काट
दो।"
नाईः "हजूर ! बाल
काटने के लिए
ही मैंने मशीन
हाथ में ली है।
पर आप टोपी तो
उतारो !"
व्यक्तिः
"मुझे
बहुत जल्दी
है।.... और टोपी
तुम्हारे आगे
कैसे उतारूँ?
मुझे हजारों
लोग जानते हैं
और मैं
तुम्हारे आगे
टोपी उतारूँ
यह कैसे हो
सकता है?"
ऐसे ही
संत के आगे,
भगवान के
वचनों के आगे
आप अपनी
बुद्धिरूपी
टोपी नहीं
उतारोगे,
बुद्धि में जो
भरा है उसे
नहीं
निकालोगे और
फिर भी बुद्धि
को शुद्ध करना
चाहोगे तो यह
कैसे संभव
होगा? हमारी
मान्यता तो
हमारे पास ही
रहे और ज्ञान हमारे
अन्दर आ जाये –
यह काम
मुश्किल है।
सच पूछो
तो, हम बुद्धि
में इतनी
बेवकूफियाँ
भरे हुए होते
हैं कि हमारी
बुद्धि में
तत्त्वज्ञान
का रस प्रवेश
ही नहीं कर
पाता। अन्यथा,
भगवान तो सदैव
हमारे भीतर
अन्तर्यामी
रूप से प्रकाश
करते रहते हैं
एवं बाहर भी
संत के द्वारा
बुलवाते रहते
हैं किन्तु ..... स्वल्पपुण्यवतां
राजन्
विश्वासो नैव
जायते। जिसके
पुण्य कम होते
हैं, पाप
ज्यादा होते
हैं ऐसे आदमी
को
शास्त्र-वचन
पर, संत-वचन पर
विश्वास ही
नहीं होता।
सत्संग में
बैठने की रुचि
ही नहीं होती।
जप ध्यान करने
की रूचि ही
नहीं होती।
महाराज ! तन
में शक्ति हो
तो उसे सेवा
में लगा दो।
मन है उसे
दूसरे को
प्रसन्न करने
में लगा दो
क्योंकि
दूसरे के रूप
में भी वही
परमात्मा है।
दो पैसे हैं
तो दूसरों के
आँसू पोंछने
में लगा दो। बुद्धि
है तो दूसरे
की भ्रमणा
हटाने में लगा
दो। यही
बुद्धिमानी
है।
जिस
बुद्धि से
आपको
परमात्मा का
पता न चले, जिस
बुद्धि से
आपको
आत्मविश्रान्ति
न मिले, जिस
बुद्धि से आपको
शत्रु के भीतर
छुपा हुआ
ईश्वर न दिखे,
जिस बुद्धि से
आपको मृत्यु
में परमात्मा
की चेतना न
दिखे वह
बुद्धि
व्यावहारिक
बुद्धि है। ऐसी
व्यावहारिक
बुद्धि के तरफ
श्रीकृष्ण
इशारा नहीं
करते, वरन्
श्रीकृष्ण का
इशारा पारमार्थिक
बुद्धि की तरफ
है।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि।
जो बुद्धिमान
की बुद्धि है,
जो ऋतम्भरा
प्रज्ञा है,
वह मैं हूँ।
कई लोग
सूचना को ही
ज्ञान मानने
की भूल कर बैठते
हैं। सूचना
ज्ञान नहीं
है, ज्ञान का
आभास मात्र
है। ज्ञान तो
भीतर की हृदय
की चीज है।
बाहर की पढ़ाई-लिखाई,
पद-प्रतिष्ठा,
धन-सत्ता,
रूप-सौन्दर्य
आदि से ज्ञान
का कोई मतलब
नहीं है।
आत्मज्ञान के
लिए इन सबकी
कोई जरूरत
नहीं है। लोग
जन्मते हैं
अज्ञानी, फिर
जीवनभर
खोपड़ी में
सूचनाएँ भरते
रहते हैं और
अपने को
ज्ञानी समझ
लेते हैं।
किन्तु दुःख
की बात है कि
वे अपने को
ज्ञानी मानकर
अज्ञानी रहकर
ही मर जाते
हैं। उनको
आत्मतत्त्व
का ज्ञान नहीं
होता। फिर वे
चाहे कितने भी
धनवान क्यों न
हों किन्तु
शास्त्र की
नजर से उन्हें
कंगाल ही कहा
जाता है।
धनवान होते
हुए भी वे
महाकंगाल हैं
क्योंकि सुख
के लिए उनकी
बुद्धि बाहर
भटकती है और
उन्हें अन्य
जन्मों में ले
जाती है। ऐसे
लोग विद्वान
होते हुए भी
आध्यात्मिक
दृष्टि से बुद्धु
ही माने जाते
हैं।
बुद्ध और
बुद्धू दोनों
बाहर से
दिखेंगे तो एक
जैसे। बुद्धू
बहुत शोरगुल
करता हुआ
दिखेगा और
बुद्ध शांत दिखेंगे,
आलसी दिखेंगे
लेकिन बाहर से
आलसी दिखने
वाले बुद्ध
भीतर से बड़ी
ऊँचाई पर
स्थित होते
हैं।
एक बार
भगवान बुद्ध
अपने शिष्य
आनंद के साथ
कहीं जा रहे
थे। मार्ग में
एक कुएँ पर
जाकर दोनों
खड़े हो गये।
उस कुएँ पर एक
आदमी पानी भर
रहा था। बहुत
शोरगुल हो रहा
था, किन्तु
उसकी बाल्टी
में इतने
छिद्र थे कि
उसके हाथ में
आते-आते बाल्टी
खाली हो जाती
थी। काफी देर
तक बुद्ध एवं
आनंद यह दृश्य
देखते रहे।
फिर दोनों आगे
बढ़ चले।
चलते-चलते
बुद्ध ने कहाः
"देखा उस
आदमी को? मुझे
प्यास लगी थी
इसलिए मैं
वहाँ नहीं
रूका था वरन्
तुझे बताने के
लिए रूका था
कि संसारियों
का ऐसा ही हाल
है। उनके जीवन
में देखो तो
बड़ा शोरगुल
दिखाई देता
है, बड़ी
प्रवृत्ति
दिखाई देती
है। जीवन की बाल्टी
आत्मरस से
उठती तो है
किन्तु ऊपर
आते-आते खाली
हो जाती है।
लगता है कि
कुछ पा रहे
हैं किन्तु अंत
समय तक जीवन
की बाल्टी खाली
की खाली रह
जाती है। हे
आनंद ! आज कल के
लोग ऐसी
बुद्धि वाले
हैं। बाहर की
विद्या
भर-भरकर अपने
को विद्वान,
बुद्धिमान
मान लेते हैं
किन्तु
आत्मज्ञान से
उनकी बाल्टी नहीं
भर पाती है और
वे
रीते-के-रीते
रह जाते हैं।"
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
बलं
बलवतां चाहं
कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरुद्धो
भूतेषु
कामोऽस्मि
भरतर्षभ।।
"हे
भरतश्रेष्ठ !
बलवानों का,
आसक्ति और
कामनाओं से
रहित बल अर्थात्
सामर्थ्य मैं
हूँ और सब
भूतों में
धर्म के
अनुकूल
अर्थात्
शास्त्र के अनुकूल
काम मैं हूँ।
(गीताः
7.11)
बलं
बलवतां
चाहम्। मैं
बलवानों का बल
हूँ। भगवान
अपने को
बलवानों का बल
को कहते हैं
किन्तु कैसा
बल? कामरागविवर्जितम्...
कामनाओं
एवं आसक्ति से
रहित बल।
संसार
में जितना भी
बल है, वह सब
परमेश्वर का ही
बल है और बल के
बिना तो कोई कार्य
संभव ही नहीं
है। किन्तु वह
परमेश्वरीय बल
नजर नहीं आता।
क्यों? क्योंकि
काम और राग से
हमारा चित्त
आक्रान्त हो
जाता है। काम
और राग हमारे
ऊपर चढ़ बैठते
हैं। इसीलिए
श्रीकृष्ण
ऐसे बल की ओर
संकेत करते
हैं जो काम और
राग (आसक्ति)
से रहित हैं।
'काम' क्या है? अप्राप्त
की प्राप्ति
के लिए इच्छा।
राग क्या है? जो
प्राप्त है वह
बना रहे एवं
आगे और भी
मिले। यदि
परमात्मा के
बल को समझना
चाहते हो तो
इन दोनों
बातों को केवल
थोड़ी देर के
लिए भी हटा दो।
फिर
परमात्म-बल का
अहसास करना
आसान हो जाएगा।
किन्तु
हम करते क्या
हैं? काम एवं
राग के कारण
हमने अपने
आपको संसार
में उलझा दिया
है। एक मकान
में रहते हैं,
दूसरा मकान चाह
रहे हैं। एक
दुकान है,
दूसरी दुकान
खोलने का
विचार कर रहे
हैं। इस
प्रकार 'खपे...खपे....'
(चाहिए, चाहिए....)
में ही जीवन
खपा रहे हैं
और परमात्म-बल
को पहचानने की
फुर्सत ही
नहीं मिल रही।
चाह ने ही
हमारे बल को
बिखेर दिया
है, बाँट दिया
है। चाह से
नहीं वरन्
त्याग से
परमात्मा का बल
प्रगट होता
है।
मंकी नाम
के एक महात्मा
थे। उन्होंने
सोचा कि खेती
करें।
उन्होंने दो
बछड़े खरीद
लिए। दोनों को
रस्सी से एक
साथ जोड़ दिया
ताकि दोनों
कहीं भाग न
जाएं। एक जगह
एक ऊँट बैठा
था। वे दोनों
बछड़े
चलते-फिरते
ऊँट की दोनों
ओर से निकले।
दोनों को बँधी
हुई रस्सी जब
ऊँट के ऊपर से
गुजर रही थी
तब ऊँट भड़ककर
उठ खड़ा हुआ।
दोनों बछड़ों
बाँधनेवाली
रस्सी ऊँट के
गले में लटक गई।
ऊँट के दोनों
ओर दोनों
बछड़े लटक गये
और मर गये।
मंकी ऋषि
ने देखा कि
जैसे आदमी के
गले में दोनों
ओर मणि लटकते
हैं, वैसे ही
ऊँट के गले
में मेरे
दोनों बछड़े
मरे हुए लटक
रहे हैं। अब
खेती कैसे
होगी? चलो, खेती
खत्म।
उनका
विवेक-वैराग्य
जाग उठा। वे
प्रभु के रंग
में रंग गये
और उन्हीं के
द्वारा आध्यात्मिकता
अनुभव से
संपन्न जिस
गीता का निर्माण
हुआ वही मंकी
गीता के नाम
से प्रसिद्ध
हुई।
यहाँ एक प्रश्न उठ सकता है कि जब कामना ही नहीं रहेगी तो क्रिया कैसे होगी? और अगर क्रिया ही नहीं होगी तो सब लोग निष्क्रिय और निकम्मे हो जायेंगे। इसी भगवान आगे कहते हैं किः "सब भूतों में धर्म के अनुकूल कर्म मैं हूँ। धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ। हे अर्जुन 'काम' भी मेरा ही स्वरूप है किन्तु वह काम जो शास्त्र और धर्म के अनुकूल है।"
धर्मानुकूल
काम मनुष्य के
आधीन होता है।
परन्तु
आसक्ति,
कामना,
सुख-भोग आदि
के लिए जो काम
होता है उस
काम में
मनुष्य
पराधीन हो जाता
है और उसके वश
में होकर वह न
करने लायक
शास्त्रविरुद्ध
कार्य में
प्रवृत्त हो
जाता है। शास्त्र
तथा धर्म के
विरुद्ध ऐसे
कार्य ही पतन
एवं समस्त
दुःखों के
कारण होते
हैं।
संत ज्ञानेश्वर महाराज ने कहा हैः "धर्मयुक्त काम इन्द्रियों की इच्छा के अनुसार बर्ताव करता है, फिर भी उनको धर्म के विरुद्ध नहीं जाने देता। यह काम जब निषिद्ध कर्मों की पगडण्डी छोड़कर नियमित कर्मों के महामार्ग पर चलता है तब संयम की मशाल उसके पास होती है। यह काम इस तरह से व्यवहार करता है कि धर्म का आचरण पूर्ण होता है और सांसारिक पुरुष मोक्ष पाता है।"
धर्म
अर्थात् मन को
धारण करने
वाली वस्तु
है। हम अपनी
जीभ को बुरी
बात बोलने से
रोक पाते हैं
या नहीं? यदि हम
गंदी बात
बोलने से जीभ
को रोक पाते
हैं तो समझना
चाहिए कि
हमारे अन्दर
धर्म है। इसी
प्रकार अन्य
इन्द्रियों
के विषय में
भी समझना
चाहिए। यदि
हमारा मन
धर्मानुकूल
है तो
इन्द्रियाँ
स्वतः ही धर्मानुकूल
आचरण करेंगी
और
धर्मानुकूल
आचरण से जन्म-मरण
के चक्र से
छूटने की
योग्यता सहज
ही प्राप्त हो
जायगी।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
स्वयं को गुणातीत जानकर मुक्त बनो
ये
चैव सात्विका
भावा
राजसास्तामसाश्च
ये।
मत्त
एवेति
तान्विद्धि न
त्वहं तेषु ते
मयि।।
'और जो भी सत्त्वगुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं और जो रजोगुण से तथा तमोगुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं, उन सबको तू मेरे से ही होने वाले हैं ऐसा जान। परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मुझमें नहीं हैं।'
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः
सर्वमिदं जगत्।
मोहितं
नाभिजानाति
मामेभ्यः
परमव्ययम्।।
'गुणों
के कार्यरूप
(सात्त्विक,
राजस और तामस) इन
तीनों प्रकार
के भावों से
यह सारा संसार
मोहित हो रहा
है इसलिए इन
तीनों गुणों
से परे मुझ
अविनाशी को वह
तत्त्व से
नहीं जानता।'
(गीताः
7.12,13)
भगवान कह
रहे हैं कि
सत्त्व, रज और
तम इन तीन गुणों
के प्रभाव से
प्रभावित
होकर जीव
मुझको तत्त्व
से नहीं जान
पाता है।
छः
प्रकार के
जीवात्मा
होते हैं-
सात्विक-सात्त्विकी।
केवल
सात्त्विकी।
राजस-राजसी।
केवल राजसी।
तामस-तामसी।
केवल तामसी।
सात्त्विक-सात्त्विकीः
जो
निष्काम भाव
से शुभ कर्म
करते हैं
किन्तु अपने
आत्मस्वरूप
को नहीं जानते
वे कहलाते हैं
सात्त्विक-सात्त्विकी।
ऐसे
सात्त्विक-सात्त्विकी
लोग
रजो-तमोगुणी
से तो ऊँचे
हैं लेकिन
अपनी
वास्तविक ऊँचाई
को भूले हुए
हैं। वे गुणों
का फल और
स्वभाव को
अपना ही
स्वभाव मानते
हैं। ऐसे
लोगों को मरने
के बाद स्वर्ग
अनायास ही मिल
जाता है किन्तु
अपने को न
जानने के कारण
स्वर्ग में
पुण्य भोगने
के बाद पुनः
जन्मना-मरना
पड़ता है।
केवल
सात्त्विकीः जैसे
ब्रह्मा,
विष्णु और
महेश। वे अपने
सत्य स्वभाव
को जानते हैं।
वे देह को मैं
नहीं मानते
एवं जगत को
सत्य नहीं मानते।
सत्ता एवं
अस्तित्व
उनको ज्यों का
त्यों दिखता
है। ऐसे
ब्रह्मवेत्ता
एवं ब्रह्मा,
विष्णु और
महेश केवल
सात्त्विकी
हैं, सत्य में
ही टिके हैं।
राजस-राजसीः
जिनमें
राजसी स्वभाव
की प्रधानता
है ऐसे लोग
जन्म-जन्मान्तर
तक घटीयंत्र
की नाई यात्रा
करते रहते हैं।
हर शरीर में
जाकर सुख
भोगने का
अहसास करते हैं
लेकिन मिलता
दुःख ही है।
मिला हुआ सुख
टिकता नहीं है
एवं सुख भोगने
की
इन्द्रियाँ
भी एक जैसी
नहीं रहतीं।
फिर वे बीमार,
वृद्ध होकर मर
जाते हैं। ऐसे
लोग दुःख में
दुःखी होकर,
माया के आधीन
होकर, गुणों
के आधीन होकर
अपने को भूले
रहते हैं एवं
सारे दुःखों
को अपने में
मान बैठते
हैं।
केवल
राजसीः राजस-राजसी
की अपेक्षा तो
केवल राजसी
ठीक हैं क्योंकि
वे प्रवृत्ति
तो करते हैं।
यहाँ का सुख
भी चाहते हैं
एवं भविष्य
में सुख मिले
इसलिए भी प्रवृत्त
होते हैं। ऐसे
लोग अच्छे
कर्म करके अच्छा
कहलाना चाहते
हैं। किन्तु
ये लोग उन राजस-राजसी
की तरह उसी
में ही उलझे
नहीं रहते। वे
विवेक जगा
लेते हैं कि
पाने की इच्छा
का, भोगने की
इच्छा का कभी
अंत नहीं होगा
वरन् शरीर का
अंत हो
जायेगा।
दुनिया
के मजे हर्गिज
कम न होंगे।
चर्चे
यही रहेंगे
अफसोस ! हम न
होंगे।।
अगर
राजसी
व्यक्ति का
ऐसा विवेक जाग
जाये तो फिर
वह कर्म तो
करेगा लेकिन
कर्म करके
कर्म का फल
भोगकर मस्त
नहीं होगा।
अपितु कर्म का
फल ईश्वर को
अर्पण कर
देगा। जो कर्म
के फल को
ईश्वारार्पित
कर देता है
उसके हृदय में
परमात्मा
विवेक जगा
देते हैं किः "इतना
भोगा तो क्या?
इतना सँभाला
तो क्या? अंत में
तो यह शरीर जल
ही जायेगा या
दफना दिया
जायेगा। मेरे
आने से पहले
भी यह दुनिया
चल रही थी,
मेरे जाने के
बाद भी चलती
रहेगी... अभी भी
मैं बड़ा
कर्ता-भोक्ता
हूँ यह मानना
बेवकूफी के
सिवाय और क्या
है? सारी 'मैं-मैं'
नासमझी के
कारण ही होती
है और मैं
बदलती रहती है।
मैं विद्वान
हूँ... मैं
बीमार हूँ...
मैं तन्दरुस्त
हूँ.... इस
प्रकार मैं का
परिवर्तन
चलता ही रहता
है। इस नकली
मैं को मैं
मानने के कारण
असली मैं को
भूल गया। सारी
मैं-मैं जहाँ से
उठती है उस
परमेश्वर को
तो खोज ! इस
प्रकार का
विवेक जगने पर
राजसी
व्यक्ति किसी
सदगुरु की खोज
करता है एवं
उन्हें पाकर
अपने शुद्ध,
बुद्ध,
सात्त्विक
स्वरूप को
जानकर मुक्त
हो जाता है।
राजस-राजसी की
अपेक्षा केवल
राजसी उत्तम
माने जाते
हैं।
तामस-तामसीः
तामस-तामसी
का जीवन होता
है आलस्य,
निद्रा, प्रमाद,
दुराचार,
शराब-कबाब आदि
से ग्रस्त।
मंदिर में
जाने की बात
नहीं, माता
पिता का
सम्मान नहीं।
मेरा तो मेरे
बाप का और
तेरे में भी
मेरा हिस्सा...
ऐसी वृत्ति
उसकी होती है।
वह जगत को ठोस
सत्य मानता
है। ये सब
तामस-तामसी के
लक्षण हैं।
कुछ भी करो पर
मजा लो...
पार्टियाँ, क्लब,
शराब-कबाब....
यही उसकी
जिन्दगी होती
है। ऐसे लोग
थोड़ी देर के
लिए भले सुख
का अहसास कर
लें लेकिन
परिणाम में
घोर दुःख पाते
हैं। ऐसे लोग राग-द्वेष
में इतने उलझ
जाते हैं कि
मार-काट करने
में उनको झिझक
नहीं होती।
ऐसे लोग मरने
के बाद पाषाण
और वृक्षादि
जड़ योनियाँ
पाते हैं।
केवल
तामसीः जो केवल
तामसी हैं वे
कर्मों में
अटक जाते हैं।
वे भूत-भैरव
की उपासना तो
करते हैं
किन्तु उनमें
थोड़ी-बहुत
भगवदवृत्ति
भी रहती है।
ऐसे व्यक्तियों
को दैवयोग से
यदि कोई संत
मिल जाये,
सत्संग मिल
जाये तो उनकी
वृत्ति तमस से
रजस में आ जाती
है एवं रजस से
सत्त्व में भी
आ जाती है। जैसे
वालिया
लुटेरे को मिल
गये देवर्षि
नारदजी तो
वाल्मीकि ऋषि
हो गये।
आम्रपाली
वेश्या को तथा
माँ-बाप एवं
समाज की
अवहेलना करके
भी जो भोगी
जीवन में
सराबोर हो रही
थी उस पटाचारा
को मिल गये
भगवान बुद्ध
तो दोनों ही
महान्
साध्वियाँ बन
गयीं।
इस
प्रकार
तामस-तामसी से
केवल तामसी
ठीक है। राजस-राजसी
से केवल राजसी
ठीक है।
सात्त्विक-सात्त्विकी
से केवल
सात्त्विकी
ठीक है किन्तु
इन तीनों
गुणों में जो
कर्म होते
हैं, भगवान
कहते हैं कि
वे मुझमें
नहीं हैं और
मैं उनमें
नहीं हूँ। न त्वहं
तेषु ते मयि। यहाँ
भगवान का
संकेत इस ओर
है कि जैसे
मैं जानता हूँ
कि वे कर्म
मुझमें नहीं
हैं और उनमें
मैं नहीं हूँ
वैसे ही यदि
यह जीव भी जान
जाये तो उसे
भी अपने
स्वभाव का,
परमात्म
स्वभाव का पता
चल जाये।
ईश्वर को
पाने का
अधिकार सबको
है। तामसी एवं
राजसी स्वभाव
के लोग भी
भगवान को पा
सकते हैं लेकिन
जब जगत का
आकर्षण होता
है, उसमें
सत्यबुद्धि
होती है और
वैसे ही लोगों
का संग बना
रहता है तो
लोग
तामस-तामसी,
राजस-राजसी,
सात्त्विक-सात्त्विकी
बने रहते हैं
एवं माया के
चक्कर में
घूमते रहते
हैं।
मान लो
किसी आदमी को
लोहे की जंजीर
से बाँध दिया
गया हो और फिर
लोहे की जंजीर
हटाकर चाँदी की
जंजीर डाल दी
जाये तो क्या
वह सोचेगा किः
'वाह
!
लोहे की नहीं,
चाँदी की
जंजीर है?' नहीं,
जंजीर तो
जंजीर ही है।
चाहे लोहे की
हो, चाहे
चाँदी की हो
और चाहे सोने
की हो जंजीर
क्यों न हो? ऐसे ही
माया के गुणों
में उलझना तो
उलझना ही है।
फिर चाहे
सात्त्विक
गुणों में
उलझो, चाहे राजसी
गुणों में
उलझो चाहे
तामसी गुणों
में उलझो।
एक बार
अकबर ने बीरबल
से प्रश्न
कियाः "नमक हलाल
कौन है और
नमकहराम कौन
है?"
बीरबल ने
एक कुत्ता एवं
एक जमाई लाकर
खड़ा कर दिया
और बोलेः
"जहाँपनाह ! यह कुत्ता तो है नमकहलाल जो रूखा-सूखा, फेंका हुआ एवं जूठन को खा लेता है फिर भी वफादार रहता है। बिना कहे भी अपना कर्तव्य निभा लेता है और यह जमाई है नमकहराम। कई बार ससुराल के घर की रोटी खाता है और कन्यादान लेता है। फिर भी जब ससुराल आता है तो सास-ससुर के लिए तो मानो मौत आती है। जमाई = जम आई = मौत आई। न जाने कब रूठ जाये? न जाने कब क्या माँग ले? अगर माँगी हुई वस्तु न दी तो बेटी पर कसर निकालेगा। कैसे भी करके जमाई को राजा रखना पड़ता है।"
यह सुनकर
अकबर ने कहाः "सब
जमाईयों को
फाँसी लगा दो।"
बीरबल को
अकबर ने आदेश
दे दिया।
बुद्धिमान बीरबल
ने कारीगरों
को रोजी-रोटी
मिले, कइयों
को कार्य
मिले, इस
उद्देश्य से
एक बड़े मैदान
में काम शुरू
करवा दिया। कई
तरह के फाँसे...
रस्सी के,
सूती, रेशमी,
लोहे, काँसे,
चाँदी आदि
विभिन्न प्रकार
के फाँसे
बनवाने शुरू
कर दिये। एक
फाँसा सोने का
भी तैयार करवा
दिया। फिर
अकबर से कहाः
"जहाँपनाह ! जमाइयों को फाँसी देने के लिए मैदान में सब तैयारियाँ हो गयी हैं। आप केवल उदघाटन करने के लिए चलिए।"
अकबर गया मैदान में। देखा कि कई किस्म के फाँसे तैयार हैं। घूमते-घूमते जब चाँदी के फाँसे देखे तो पूछाः "ये चाँदी के फाँसे किसके लिए हैं?"
बीरबलः "जहाँपनाह ! ये वजीरों के लिए हैं। आम आदमी की श्रेणी के हिसाब से सूत, रेशम, ताँबे आदि के फाँसे बने हैं लेकिन वजीर तो आम आदमी नहीं हैं इसलिए उनके लिए चाँदी के फाँसे हैं।"
अकबर ने
पूछाः "अच्छा,
पास में जो
सोने का लटक
रहा है वह
किसके लिए है?"
बीरबलः "