ऐसी वाणी बोलिये
ऐसी वाणी बोलिये
ऐसी वाणी बोलिये

एक राजकुमार था । वह ब‹डा ही घमंडी और उदंड था । लोग उसके दुर्व्यवहार से बहुत परेशान थे । राजा उसे बहुत समझाता लेकिन उस पर कुछ असर ही नहीं होता था । राजा एक दिन एक संत के पास उसे ले गया और उनके चरणों में प्रणाम कर अपनी परेशानी बतायी । संतश्री ने कहा : “घबराओ नहीं, सब ठीक हो जायेगा ।”
संतश्री ने कहा : “राजकुमार ! सामने जो पौधा है, उसकी कुछ पत्तियाँ तो‹डकर लाओ ।”
राजकुमार पत्तियाँ तो‹ड लाया । संत बोले : “इन्हें खा लो ।”
राजकुमार ने ज्यों ही पत्तियाँ मुँह में डालीं त्यों ही क‹डवाहट के कारण तुरंत थूक दिया और आवेश में आकर उस पौधे को उखा‹डकर फेंक दिया ।
संत ने पूछा : “क्यों, क्या हुआ ?”
राजकुमार ने कहा : “दूसरों को क‹डवाहट देनेवाले का यही हाल होना चाहिए ।”
संत बोले : “राजकुमार ! तुम भी तो लोगों को क‹डवे वचन बोलते हो । अगर वे भी तुम्हारे दुर्व्यवहार से क्षुब्ध होकर वही करें जो तुमने इस पौधे के साथ किया तो क्या परिणाम होगा ? देखो बेटा ! मीठी और हितभरी वाणी दूसरों को आनंद, शांति और प्रेम का दान करती है और स्वयं आनंद, शांति और प्रेम को खींचकर लाती है । मुख से ऐसा शब्द कभी मत निकालो जो किसीका दिल दुखाये और अहित करे ।”
राजकुमार को अपनी भूल का एहसास हुआ । संत की सीख मानकर उस दिन से उसने अपना व्यवहार बदल दिया ।
सीख : ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोय । औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होय ।।

 

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